Friday, 1 July 2011

उल्टी दिशा में चलना

यह जो हंसी की जवानी बीतती है
और अचानक बुढ़ापे में परिवर्तित हो जाती है
यह जो प्रेम की अतृप्त पिपासा
दिल की धड़कनों पर निरन्तर
जीवन और मृत्यु के गीत गाती है
यह जो बासन्ती हंसी
पीलेपन के साथ कुम्हलाती है
यह जो उल्लासमय प्रेम, आनन्द, हताशा, दुःख और आंसू
सिवान की घुटन, फुटपाथी-संत्रास
अंधेरा जीती शताबादी
पहर-दर-पहर, तिल-तिल कर बीत जाती है
और हम चौथे पहर के दिए की तरह
अपनी निश्तेज वर्तिका के साथ जलते हैं
जीवन के अंतिम क्षणों में हाथ मलते हैं
शायद इसीलिए कि
समय की विपरीत दिशा में चलते हैं।

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