Friday, 30 September 2011

यादों की गहराइयां

यादों की गहराइयों में
एक दुखती कसमसाती डोलती मछली
भंवर में अजब फंसती
फिर उछलती
दुखद क्षणों के पंख फैलाती
व्यथा की लहरियों में घूमती
चक्कर लगाती
स्वयं की ही कोशिशों से
भंवर से निस्तार पाती
प्राण की गहराइयों में
स्मृतियों का सागर उमड़ता
दर्द की लहरें मचलतीं
जो किनारे बैठ कर चुपचाप
वंशी के सहारे अस्मिता की
मारते मछली
मिटाते भूख मन की
जो कभी मिटती नहीं
सदियों पुरानी चाह
आशा के अपरिमित प्रेम-ज्वार में
जब डूब जाती
बचा रहता फिर कहां अभिमान
डूबता अस्तित्व
केवल बची रहती
मन-व्यथा की अनदिखी पीड़ा
आंख की काली पुतलियों में घुड़ती
घटा बनती
फिर अचानक ही बरसती
याद की अमराइयों में
हृदय की गहराइयों में।

Depths of Memories
In the depth of memories
A troubled wiming and floating fish in pain
caught in a whirlpool strngely
repearing time and again spreading
Its fins in affected moments
swirling in the waves of anguish
and comes out of the vortes
with its own efforts extraordinary

At the bottom of the soul exists
the ocean of memories surges up
Waves of compassion persist

Those who sit on the bank silently
And catch the fish of self identity
With the help of brak in fish-hook
And satisfy their mental appetite
Which never gets satiated
centuries old longing when drowns
In the unlimited hide of love
self vanity then doesn't survive
Even the existence of self disappearas
only remains the unseen pain of the broken heart
which culminates in the eyelids
shaping black clouds and
all
of a sudden rains in the forest of memories, emerge torrentially deep and
deep inside the hear.

Wednesday, 28 September 2011

जल और मछली

जल मछली। जल मछली।
किसिम किसिम की जल मछली
उजली, गोरी, मटमैली, काली।
चुपचाप चुपचाप नदी तट
पानी की सतह पर
उथले उथले गहरे लगाती चक्कर
लहरों के कन्धों पर बैठी चंचल चितवाली
जल मछली। जल मछली।
कोई मछुआरा फैलाता है जाल
कोई लगाए वंशी बैठा मौन तट पर
आंखों में अजनबी कोतूहल भर
नदी हो या विस्तृत सागर अपार
जनरव में डूबे फुटपाथ के आरपार
गांव का पोखर हो या झील रूपहली
जो जितना चतुर है पारखी
उतनी चालाकी से मारता है मछली
जल मछली। जल मछली। जल मछली।

Fishing and Water
Fish in waters, fish in waters
of different and different species of different colours
their waries fair and
grey, dusty, balckish
Noiseless, silent, visible
On the surface of the waterss; near banks of river
wandering in shallow circles
sitting on the shoulders of waves
fickleminded fish in waters.
fish in waters, fish in waters.
Some fisher-men/fish mongers
cast their nets wide, someother sits silent
quiet and motionless
on the riverbanks with fishing-tackles
Their eyes reflect strange curiosity and wonder
no matter whether it is river or ocean
pond or water tanks across the footpath
Be it a village puddle or a lake
in the mountainous region
whosever is cleaver and crafty
in the game of fishing
gets more bounty of his catches.
Fish in water's, fish in waters.

Saturday, 17 September 2011

पहचान

यह काफी नहीं है कि चीख कर चिल्लाना
नाचना सड़कों पर नंगे भागना
यह काफी नहीं है
कि हर शाम
बुद्धिजीवियों की भीड़ बन
बटेर शब्दों के शिकार करना
सस्ते शराब-घरों,
अंधेरी कोठरियों में
उत्तेजना के ज्वालामुखी लुटा
खाली विश्वासों की थाती लिए
खुले हाथ वापस घर लौट आना।
काफी तो घर भी नहीं
जहां एक अदद बूढ़ी आंखें,
दो अदद बीमार आंखें और
तीन अदद  निरीह आंखें
प्रतीक्षा कर रही होती हैं
काफी यह भी तो नहीं
कि अपने अहसास को अपने ही पावों तले ठोकर लगाना
और पराजय के कीर्तिमान स्थापित करने में
समय की बाजी हार जाना
हां सिर्फ यही काफी है कि
पहचानें हम अपने को
चाहे तुम हो या मैं।

Indentification
It's not enough
to scream and dance in nude
on the public roads.
It's not enough
to crowd around like intellectuals
and chase or hunt pleasant's qualis
of words like huntmen of Bater Bird
And in the dark chambers of
cheap tavems or bars squandering
agitations and tensions
and return home with hollow belief and empty hands
is also not enough..
Even that home is not an abode of peace
where a pair of old eyes
two pairs of sick ailing eyes
and three pairs of imploring eyes await
It's also not enough to kick
your own sensitivities and feelings
And set standards of your defeat
to be a loser in the battle against time

Yes, it is enough that we
recognise our self truly
It may be
you or myself.

परिभाषा

जब रास्ते धुंध में डूबे हों
हरीतिमा ओढ़ ले बर्फानी चादर
इस ओर से उस छोर तक कुहासे की पारदर्शी
दीवाल खड़ी हो
हम-तुम चलते रहें
एक-दूसरे से बंधे-बिंधे ऊंची-नीची पहाड़ियों पर!

हमारे हाथ भले ही ठंड से जकड़े हों
पर हमारे जिस्म
दिल की तपिश से गर्म हों -
उस मृगछौने की खाल की तरह
जिसका लबादा पहनकर पर्वतारोही
पर्वत की ऊंचाइयां नापते हैं
हमारे दिल की धड़कनें उसी तरह
तेज और तेज होती रहें
जैसे जैसे हम आगे बढ़ते जाएं।
कितना भयावह है वक्त
बर्फानी रात में
हवा चुप होने का नाम तक नहीं लेती
अभेद्य अंधकार की काली तकदीर पर
बेहद सफेद अक्षरों से लिखती हैं बर्फ
देवदारू पत्रों पर अधूरे वाक्य-
प्रेम अंधेरे और तूफान के बीच का सफर है

Definition
When all the paths are merged in mist
The greenery is under snowy cover
From this end to that end
transparent wall of fog stands
we two would go on knotted and knitted together
over the uneven hills
May be our hands gripped in cold
But our bodies heated with the warmth of heart

As the mountaineers scaling the heights
robed in soft deerskins
Let our heart-beats be speeded up more and more
As and when we go on treading along

How dreadful is the time
In the snowy night
The air is raving and renting non-stop

The snow writes on the pine leaves
the black fate of pitch darkness
with the letters of snow
incomplete sentence that's the Love's
journey starts amidst darkness and storm. 

Tuesday, 6 September 2011

तटस्थ (Indifference)

तटस्थ
मैं भला कैसे भूल जाऊं
कि कुछ ही दिन पहले
तुम शोख लहर थी चंचल अशांत
और मैं
हाथ में हाथ
प्राण में प्राण भर
बाहों में बांधे तुम्हारा मखमली स्पर्श
और आज
मद्य-मंजूषाओं के मोम-चिन्ह तोड़ता
सरस किये हूं किसी तरह अपना आहत मन।
अनगिन पंछियों के उड़ते हुए पंखों की हवा ने
स्पर्श किया मुझे
सुनहली धूप से फूली सुबह ने
किया आत्मीय अभिवादन
झुलसती दोपहरी का
मिला गर्म आलिंगन
और अंधकार ने
मेरे ठुठुरते हुए जिस्म को
ओढ़ायी काली चादर
खामोशी धुन्ध में डूबे
गिरिवन-प्रांतर के बीच
आते-जाते मौसम के पावों तले-रौंदा जाता
झेलता रहा निरुपाय, तटस्थ
सिर्फ एक ही विश्वास के साथ
कि कोई लहर आयेगी
अवगाहित कर जायेगी।


Indifference
How can I ever forget
that only some time back
You were a mischievious only wave
-lively and restess
And we with I, hand in hand
Merging ourselves heart and soul in one another
taking you in the
deep embrance of my
tightening arms
Oh! what a velvety touch
How can I forget it

And today
Breaking the wax-seals of spiritous barrels
Make my broad wounded mind passionate
The breeze caused by wings of many a bird
touches me.
While they fly away or land around
They are more happy with a golden
sunlight which greets like a near relation
The scorched mid-day embraced
warmily and the darkkness covered
my shivering body to keep its soul alive
I felt so helpless by indifference of the season
trampled me and roamed it
In the mid-region on the mountainous forest
drowned itself in its hazy taci-turmity
I have full confidence
that somedy aultimately
some wave shall come
and drench me eternally

Friday, 2 September 2011

Jan Lokpal Movement

Honourable Priminister, India
Speaker Loksabha,
Chairman,
Rajay Sabha


Hon'ble  Sir/Madam,
I feel and I suggest that Gandhian Anna Hazare has done the great work in the interest the Nation and the people  which Gandhiji has Left  Half way. The National Media has covered the entire 13 days hunger strike and public protest remarkably well it was most comprehensive and unbiased.
Sir why the media should be blamed for covering the national events, as freedom of speech  Guaranted to each and every citizen of India is to be respected. Why a private citizen if critices  against any MP or MLA who is the elected representative of the people should not be draged in the house in terms of Priviledge       Motion. Sir, any such common man could be sued in any of court of law and not in Parliament or Bidhansabha wasting   valuable  time of the House and public money.
Sir, Media should not be blamed and penalized for the coverage of the peoples regentments agains the Government. Which has not Passed the Lokpal Bill Tabled in lok Sabha Since 1967. Several PMs  and gone about 145 Parliament Sessions ended.but no MP has spoken about the Bill pending for years.
Any move to put the media accountable and tied with regulatory strings around its neck is a breach of constitutional right and priviledge against the freedom of speech. This move is also against the Citizens rights to protest which the media covered Jan Lokpal Movement in National Interest.

Sincerely

Yours
Dr. Swadesh Bharati, Kolkata

Thursday, 1 September 2011

जन लोकपाल आंदोलन


जन लोकपाल आंदोलन और मीडिया

कुछ राजनीतिज्ञों ने जन लोकपाल आंदोलन को मीडिया द्वारा व्यापक कवरेज देने के लिए विरोध प्रकट किया है जो ईर्ष्या और छोटी सोच को दर्शाता है। देश और जनतंत्र की रक्षा के लिए बुद्धिजीवियों और मीडिया ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत ऐतिहासिक, अभूतपूर्व और प्रशंसनीय कार्य किया है। उन सभी को धन्यवाद देना चाहता।

अब माननीय सांसदों को निहित दायरे की सोच को जनहित के लिए व्यापक बनाना देश और स्वस्थ, भ्रष्टाचार मुक्त समाज के लिए आवश्यक है। आम आदमी के हितों की रक्षा करना मीडिया अच्छी तरह जानता है। और जब उसे कोई भी चुनौती देता है अथवा अपनी अल्पबुद्धि का परिचय देता है। और भ्रष्ट राजनीति का मुखौटा पहनकर बात करता है। तो मीडिया उसे कवर करता है तो क्या अन्याय करता है।

धन्यवाद प्रधान मंत्री जी

माननीय प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंहजी ने मेदान्ता अस्पताल में भर्ती अन्ना हजारे को शीघ्र स्वस्थ होने का संदेश फूलों का गुलदस्ता भेजकर गांधीवादी परम्परा का उदारतापूर्वक निर्वाह किया। इसके लिए बधाई के पात्र हैं। माननीय प्रधानमंत्री की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम है। उन्होंने बड़ी सूझबूझ से जनलोकपाल के तीन मुद्दों को संसद द्वारा पास कराया, इसके लिए उनकी भूरि भूरि प्रशंसा की जानी चाहिए।

एशिया सोसाइटी, न्यूयार्क का गलत नजरिया

एशिया सोसाइटी, न्यूयार्क ने अन्ना हजारे के जन-लोकपाल आंदोलन की आलोचना की है। ऐसा इसलिए है कि वे सच्चे लोकतंत्र का अर्थ नहीं जानते। वे नहीं जानते कि लोकपाल बिल सन् 1967 से संसद में लंबित है, और इन चालीस वर्षों में कई प्रधानमंत्री आए, गए। लगभग 140 संसद के सत्र हुए परन्तु किसी संसद सदस्य, मंत्री या प्रधानमंत्री ने उस बिल को पास कराने का प्रयत्न नहीं किया। भ्रष्टाचार से त्रस्त भारत की जनता को अहिंसात्मक तरीके से अपनी मांगे मनवाने के लिए अनशन का, जन आंदोलन का सहारा लेना पड़ता है तो क्या गुनाह करता है। ऐसा करना जायज है।

अन्ना और भ्रष्ट राजनीति बनाम साहित्य

गांधी जी के 9 अगस्त 1942 को भारत छोड़ो स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में हर वर्ग के लोग हजारों की संख्या में शामिल हुए थे। आजादी के 64 वर्ष के बाद हजारों की तादात में आंदोलन में शामिल हुए। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार के विरोध में अन्ना के अगस्त 2011 के जनलोकपाल आंदोलन में दिल्ली, मुम्बई, कलकता, बैंगलोर, चेन्नई, पटना, लखनऊ हैदराबाद, कानपुर, भोपाल आदि शहरों एवं कस्बों, गांवों में लाखों की संख्या में जन सैलाब देखकर आश्चर्य होता है। इस जन शैलाब में बच्चे, युवा वर्ग, बूढ़े, स्त्रियां, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालयों के छात्र-छात्राएं स्वेच्छया शामिल हुए। सबके सिर पर मैं अन्ना हूं लिखी हुई सफेद गांधी टोपी, हाथ में राष्ट्रध्वज, भारत माता की-जय, बन्दे मातरम्, इन्किलाब जिन्दाबाद, अन्ना तुम संघर्ष करो- हम तुम्हारे साथ हैं के नारों से सारा भारत गूंज रहा था। आजादी के बाद रामलीला मैदान, इंडिया गेट पर इतना बड़ा जन-सैलाब मैंने नहीं देखा था। और संसद को वाध्य होकर अन्ना की तीन शर्ते माननी पड़ीं। जनतंत्र को भ्रष्ट मुक्त स्वार्थ मुक्त बनाने के लिए यह आंदोलन की सिर्फ शुरुआत है। जिसे आजादी की दूसरी लड़ाई का नाम दिया गया है। 12 दिनों के बाद 74 साल के अन्ना ने अनशन तोड़ा जबकि संसद में उनकी तीन प्रमुख मांगे मान ली गईं।

साहित्य में दलवाद, जनवाद, जातिवाद के कींचड़ में धंसे फंसे साहित्यकारों को इस जन आंदोलन से सीख लेनी चाहिए और अपने मस्तिष्क को वन्धनमुक्त कर जनहित के लिए साहित्य रचना का प्रण लेना है। हिन्दी साहित्य का वर्गों में विभाजन करना भाषा साहित्य के प्रति भाषाद्रोह है, अन्याय है। इसलिए सर्जनात्मक रचना के लिए यह जरूरी है कि गुटों, खेमों, क्षेत्रीयता, जातीयता में बंटे लेखक राष्ट्रीय चेतना को नए परिवेश में अभिव्यंजित करें क्योंकि हिन्दी भाषा-साहित्य के लिए मुक्त आकाश और स्वतंत्र चिन्तन आज की जरूरत है।

भारतीय संविधान, संसद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

अन्ना के जन लोकपाल आंदोलन को आजादी की दूसरी लड़ाई के रूप में अपूर्व एवं अपार जनसमर्थन मिला। भारतीय जनतंत्र को मजबूत करने का यह ऐतिहासिक मिशन था। आम नागरिकों और मीडिया ने जिस प्रकार इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया, वह अद्वितीय है। परन्तु सरकार तथा सांसदों को यह भय सता रहा है कि आगे चलकर कहीं यह आंदोलन उनके पांवों तले की जमीन न खिसका दे। लग रहा है वे अन्ना टीम पर तरह तरह की साजिश करने का मन बना लिया है। संसद में विशेषाधिकार हनन के अंतर्गत भारत के किसी नागरिक पर  अभियोग लगा कर विशेषाधिकार हनन के बतौर सजा देने की प्रक्रिया संविधान की आत्मा के अनुरुप नहीं है।
भारतीय संविधान में प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति का अधिकार मिला है। यदि कोई नागरिक किसी सांसद पर छींटाकशी करता है तो उसे किसी न्यायालय या हाईकोर्ट में उसके विरुद्ध मानहानि का मामला पेश करना चाहिए न कि संविधान अनदेखा कर आम नागरिक की छींटाकशी को संसद में विशेषाधिकार हनन का मामला बना कर उसे दंडित करना उचित नहीं।
विशेषाधिकार हनन का मसला संसदीय प्रणाली में संसद सदस्य के ऊपर लागू होना चाहिए न कि आम नागरिक की ऊपर। यदि ऐसा होता है तो यह संविधान की जन अभिव्यक्ति की धारा के विरुद्ध है।
मेरा प्रस्ताव है कि संसद इस बारे में एक जन-प्रक्रिया बनाए और आम नागरिक को संसद में दंडित न करें। बल्कि किसी कोर्ट में मामला दायर करें, इससे संसद का समय बर्बाद नहीं होगा और जनता के धन की व्यर्थता पर अंकुश लगेगा।