Saturday, 2 July 2011

समय-असमय

ऐसा क्यों है कि समय
अपने साथ ऋतुओं के नित नवीन सौंदर्य भरे
परिवर्तन लेकर आता है
और दूसरों को नितान्त अकेलापन बांट कर
अपनी कुटिल प्रवंचना से मर्माहत कर जाता है
ऐसा क्यों है
कि समय अपनी गठरी में बांधे सत्य को
कभी भी नहीं खोलता
और असत्य की परिभाषा करते समय
सत्य के बारे में कुछ भी नहीं बोलता
फिर भी अस्तित्व-रंग-मंच पर
परिदृश्य बदलते हुए जीवन-नाटक में
यातना और दुःखों को कहानी के बीच घिरे
मातमी अंधकार में
समय ही असत्य का पर्दा उठाता
सत् को अंधेरे में या पर्दे के पीछे रखता
असत्य का रहस्य-द्वार खोलता
और करता प्रवंचना के नाटक का पटाक्षेप
ऐसा क्यों है कि उम्र की ऋतम्भरा अपने सिर पर
जीवन-कलश लिए चलती
जिसमें अमृत और विष दोनों भरा होता
वह बांटती है प्यार और दुःख
करुणा और घृणा
जीवन पर्यन्त आकांक्षाओं को छलती
अमृत और विष की पहचान करता हुए
नये-नये परिवेशों में अपने को बदलती
अन्ततः हमें मर्माहत करती।

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