Monday, 31 December 2012

हृदय के सितार पर

रात का दूसरा पहर, अंधकार भरे सन्नाटे के बीच
अभिशप्त नारी क्रंदन
मनको बोझिल बना देता है
कोई कैसे दूर करे चारो ओर छाया यह कहर

रात का दूसरा पहर
सपनों के पर्वत से कूदकर
नदी की धारा में बहता हुआ
समुद्र के बीच पहुंच जाता हूं
मुंह से निकल जाता है - हे ईश्वर
कैसी कैसी दुर्घटनाएं घटती हैं
मनुष्य नहीं जी पाता निडर
विखर जाते आस्था के स्वर हृदर के सितार पर
                                   
                                                 24 दिसम्बर, 2012





जीवन का संकट

आकाश में घनघोर घटा छा गई है
उसके विद्युत माला से ज्योतित हो रहा अंतरिक्ष
भयंकर तूफान और भैरवनाथ के बीच जैसे शिव का डमरू बज रहा है
तांडव नृत्य पर डमरू का शाश्वत स्वर
ब्रह्मांड में झंकृत हो रहा है
मनुष्य का विनाश का संकट आ रहा है
सागर में सूनामी लहरों का कहर उभर रहा आत्मघाती
जनरल स्वर आने वाला है
महाजल्पलावन का समय सन्निकट
ऐसे में सुनाई दे रहा
पागल अट्ठास इस विनाश संकट में
मनुष्य भर रहा अपनी लोभ लाभी झोली
ये जीवन का महासंकट है
जिसे हमें पहचानना है।


                                                25 दिसम्बर, 2012






सीता की प्रसर पीड़ा

हे मेरे प्रभु! त्रैलोक्य स्वामी, अयोध्यापति
मैं अकेली इस वियावान संघन वन में
असाध्य प्रसव-पीड़ा से व्याकुल
सहायता के लिए
केवल तुम्हें पुकार रही हूं
किन्तु मेरी आवाज इस सघन जंगल में
प्रतिध्वनित होकर गहरे अंधेरे में
डूब जाती है
इस प्राण लेवा पीड़ा को सहन नहीं कर पा रही
काश कि हो जाता इसी क्षण
मेरे उपेक्षित जीवन का विराम
मेरी करुण पीड़ा-स्वर सुनो हे राम
नारी प्रसव पीड़ा क्या होती है
उसे तुम नहीं जानते
हे लीलानाथ
मैंने धरती की कोख से जन्म लिया
तुम्हारी प्राण प्रिया सुकुमारी हूं
तुम्हारे राम राज्य की प्ररित्यगता असहाय नारी हूं
असह्न्य युग वेदना की मारी हूं
मैं अयोध्यापति की भार्या जनक सुकुमारी राजदुलारी हूं
क्या यह राम राज्य का विधान है
अथवा घोर नारी अपमान है
आज मैं भयंकर घोर प्रसव पीड़ा से
कष्ट झेलती इस जंगल में अकेली असहाय पड़ी हूं
झेल रही हूं तुम्हारे न्याय का असम्मान...।



                                                             26 दिसम्बर, 2012






जीवन की रंगत

सुबर शाम दिन रात
परिवर्तन होती है
मौसम की तस्वीर
बदलती रहती क्षण प्रतिक्षण
प्रकृति की रूप कथा
चलते रहते अनन्त पथ पर
लतपथ संघर्षरत
 दुख और पीड़ा
जब भी स्मृतियों की आंधी आती है
अंतस-आकाश में
बदली छा जाती है
अपने अपनत्व और सम्प्रीत के पैमाने में
मंजिल तक पहुंचने के क्रम में
दुख और सुख में नहीं हो पाती संगत
बस एक खालीपन
मन को सालता है
बैठा नहीं पाते
दुख और सुख में
अपने थके हुए जीवन की संगत





 27 दिसम्बर, 2012



                                     

Sunday, 30 December 2012

भविष्य की विधिलेखा

अतीत लिखथा है भविष्य की विधि लेखा
जब दिशाएं अंधकार में डूबी हो
और बहुत दूर दिगन्त के पार
रोशनी हाथों में किरणों की मेहदी लगाती हो
तारे अदृश्य-पथ-गामी के करपाती -उत्सव में शरीक होने
अन्तरिक्ष की राह चले जाते हों
अतीत मिटाता है वर्तमान की काल-रेखा..

मनुष्य अपने कर्मों पर जीता है
कर्मों का संस्कार छोड़ जाता है
जिसे भविष्य अपने ढंग से रुपायित करता
वैसा नहीं होता जैसा हमने सोचा
और बनाया आकांक्षा का भाग्य-सेतु
युगों से हटा नहीं सके आत्मघाती- राहु केतु
जो भाग्य को प्रताड़ित करते
और हमारे अस्तित्व के विकास को कर देते अनदेखा..

एक अदृश्य शक्ति जो समय के साथ मिलकर
हमारे प्रारब्ध को तरह-तरह से बनाती विगाड़ती
और हम वर्तमान की चौखट पर खड़े होकर
देखते निर्माण और विध्वंस
हम अभावों की शीत लहरी में निरुपाय
भीतर जलती आक्रोश ज्वाला में
अपने हाथ सेंकते रहे
मांगते रहे अपना दाय
ऐसे में वर्तमान को शीघ्रता से जाते देखा
लिखी जाती रही अनवरत भाग्य लेखा।

                                              11 दिसम्बर, 2012






समय का दिया

समय ने जैसा दिया दिया
उसके प्रकाश में यह जीवन जिया
अपना सर्वस्व समष्टि को दिया
अस्तित्व के लिए ही तो कर्म-अकर्म किया।

                                                      12 दिसम्बर, 2012






स्थितियों से साक्षात्कार

मुझे घूर-घूर कर मत देखो
मरे घर, मेरी सुविधाओं की ओर नजर मत फेंको
मैं कैसे जीवन-यापन करता हूं
उसे भी मत देखो
सिर्फ देखो कि मैंने क्या किया
और यह भी कि
दुखद विसंगतियों, प्रवंचनाओं और
विपरीत स्थितियों में कैसे जिया...

मुझे घूर-घूर कर मत देखो
कम से कम इतना भर करो
कि भीतर जो प्रपंचवादी बैठा है
उसे निकाल कर दूर भगाओ,
स्थितियों को सही सही देखो
और यह भी कि तुमने क्या किया...।

                                                      13 दिसम्बर, 2012






मेरी-तेरी गति

तू डाल डाल
मैं पात पात
तू अंधकार
मैं नव प्रभात
तू धरा प्राण-उर्वर माटी,
मैं अंकुर हूं
युग की थाती
तू बने दिया, मैं बाती
इस अंधेरे समय में
दोनों ही चलें साथ-साथ।

                            14 दिसम्बर, 2012






तन्मयता के क्षणों के बीच

प्राण गर्भा आत्मीय तन्मयता के क्षणों को
कौन कितने दिन याद कर पाता है भला
स्मृतियों का सिलसिला
समय के पतझर में झर जाता है
जिस सपने को चाहत का औदार्य समझ
सीने से लगा रखा था
वह आश्विन के यूथ भर्ष्ट बादल की तरह
हृदय-आकाश से ओझल हो जाता है
सब कुछ सरे आम होता है
कहीं कोई छिपाव, दुराव, भटकाव नहीं
सब कुछ बसन्त में खिले
फूल की तरह होता है
जिसकी पंखुड़ियों का रस पीकर
मदमस्त हो जाता है
अलिन्द
कितने सारे प्रेम-विभोर मरते हैं
दिए की जलती वर्तिका में आत्मघात करते हैं
पूरे आत्मसंवेदी संस्कार के साथ मरत हैं
वे नहीं याद कर पाते
अपने जल मरने की संगति
आत्मसात कर लेते जीवन की इति
किन्तु हम जीने और मरने का हिसाब नहीं रख पाते
प्रेम-सुख भोगते, उसके खट्टे मीठे फलों को चखते हैं
भले ही प्रवंचना का खेल खेलते हैं
जय-विजय का सुख-दुख झेलते हैं
और फिर सब कुछ भूल जाते हैं
भला कौन मुट्ठी में भर
बालू के कणों को सहेज पाया है
पूरे मनसे आत्मसात कर सका है
प्राणगर्भा प्रेमीले तन्मयता के क्षणों को।

                                                    15 दिसम्बर, 2012






 जीवन का धूप-छांव

हमें अपने पथ पर
आगे बढ़ने का साहस देता

फिर जब थके पांव चलने में असमर्थ होते
अतीत को याद करते
अवसाद में आहें भरते
यही जीवन का क्रम है
और इतिहास घटनाओं, उपघटनाओं का व्यक्तिक्रम है
जिसके बीच हम
अपने अस्तित्व को संजोते हैं
कर्म की माटी में शब्द-ज्ञान बीज बोते हैं
अतीत को सीने से लगाए जीते हैं
स्मृतियों के टूटे दर्पण में अपना चेहरा देखते
आत्मसात करते तन्मयता के क्षणों को।

                                                17 दिसम्बर, 2012






नदी प्रवाह

नदी यूं ही नहीं बनती
सदियों तक हवा पत्थरों को तराशथी है
ऊंचे गिरि शिखर, गलेसियर
बर्फाच्छादित चट्टाने
अपने हृदय का प्यार पथरीली ऊंचाई से गिरते
सफेद झरनों के जल में विसर्जित करते
एक प्रवाह को जन्म देते
उसी से बनती है नदी...

जैसे-जैसे ऊंचाई से गिरकर
जल धाराएं समतल में आती हैं
अपने साथ
ऊंचे-शिखरों, ग्लेशियर,
बर्फाच्छादित चट्टानों का प्यार
धरती जनों के लिए लाती हैं
नदी पर्वत की थाती है
जो सदा रहती अपने प्रवाह से बंधी...

नदी खेतों, बनो, जंगलों को
देती अपना जल
जिससे उपजती फसल
हरियाली फूलती फलती
पैदा करती फूल, फल
सदियों से जीवन पोषित करती नदी
अपने कर्म से सधी...।


                                         18 दिसम्बर, 2012





पंडितों की भविष्यवाणी

शीत लहर चली
मौसम हुआ ठंड का बाहुबली
ठंड से कांपते लोग, मरते लोग
मच गई है गांव से शहर तक
पृथ्वी के ध्वस्त होने की खलबली।

                                          19 दिसम्बर, 2012







अंधे समय का जाल

बिछा है अंधे समय का जाल
फंसना नहीं उसमें
बच बचाकर निकल जाना राह अपनी
नहीं बनना दूसरे की ढाल
यदि अकेले हो डगर में
चले चलते ही रहें
लक्ष्य का संधान करते
चाह की अंजुरी पसारे
प्रीति-रस से उसे भऱ लें
और गतिमय करें अपनी चाल...

कोशिशों से नहीं मिलती
जिन्दगी की चाह
बस निरत चलते रहे
आकांक्षा की राह
काले समय से संघर्ष करते
गरल पीते
किन्तु मन में सृजित करते
प्रीति का मधुमास
बनते हृदयकुंज-मराल...।




                             20 दिसम्बर, 2012






पुरुषार्थ

मैं युद्ध में टूटी हुई प्रत्यंचा से लड़ने के बजाय
नया शस्त्र बनाने की प्रक्रिया में
भूल गया इतिहास धर्मा-मर्म
कि टूटी प्रत्यंचा से बना शस्त्र
युद्ध में कारगर नहीं होता
नहीं होता सफल यश-
पुरुषार्थ का सत्कर्म।


                                       21 दिसम्बर, 2012





समय-ऋणी

मैं मन की तराजू पर
जीवन का समतुलन
ठीक करता रहा
कर्म की फसल
प्राण-संवेदना के खेत -खलिहान से
काटपीट-माड़ कर
घर लाया
जिसे ऋण के बदले
भाग्य के बनिया को थमाया
किन्तु ऋण टा नहीं पाया
बनिया की लोभ लाभी चतुराई से
ऋण का ब्याज
बढ़ता रहा
और आदमी का मूल्य घटता रहा
ऐसे मैं बाजार का मिजाज
परवान चढ़ता रहा

मैं घटते बढ़ते मूल्य की मार सहता रहा
और समय का कर्ज भरता रहा।

                                     22 दिसम्बर, 2012



आजादी का मंजर

जन-जन है त्रस्त
कैसा आजादी का मंजर
सोने का हाथी
और चांदी का बन्दर
दूध जैसी नदी
और खारा समुन्दर...

भाव हुए बेभाव
और अर्थ हुए अनर्थ
वोटों की लड़ाई में जीवन विनार्थ
जनता है मरी डरी
नेता सिकन्दर
सोने का हाथी
चांदी का बन्दर।

                                                    23 दिसम्बर, 2012















Friday, 28 December 2012

लवकुश का गर्भ-ज्ञान

माता, रोओ मत, इस सुनसान जंगल में
तुम्हारे असहाय-क्रन्दन की आवाज सुनकर
न मेरे पिता राम, नाही चाचा लक्ष्मण आएंगे
देखो माता देखो कैसे बदल गए राजधर्म के अर्थ
कुछ हिरण तुम्हारे आसपास आकर दुःख भरी आंखों से
तुम्हारी ओर ताक रहे हैं
रात का निविड़ अंधकार है
और तुम्हारा करुण विलाप
वन-प्रांतर को दुख से कंपा रहा है
रोओ मत माता
मैं अपने भ्राता के साथ
पृथ्वी पर जन्म लूंगा
राम और लक्ष्मण का सत्ता-गर्व चूर-चूर करुंगा
उनसे मांगूगा नारी-स्वतंत्रता, न्याय-धर्म का
शाश्वत- अर्थ
परम्परा के गौरव की स्थापना
जो किया जा रहा है व्यर्थ...

माता, तुम रोओ मत
यहां सुनसान वन में
तुम्हारा रुदन भला कौन सुनेगा?
तुम्हारी अन्तर व्यथा कौन गुनेगा
अयोध्या का इतिहास ब्रह्माड में सहेगा
समय का विनार्थ...

                            3 दिसम्बर 2012






जीने का अर्थ

जीने का अर्थ मैंने तब जाना
जब अस्तित्व  के यथार्थ को पहचाना
दुखों के करघे पर संजोया
सुख का ताना बाना

                                4 दिसम्बर 2012










स्वगत

दूसरों को कितना कुछ ज्ञान दिया
अपने को दिशाओं में उड़ने के लिए
संवेदना को जिया
शब्दों से क्षितिजों में उड़ना सीखा
जैसा हूं वैसा ही दिखा।


                                     5 दिसम्बर 2012







अन्तर्मन का राग-विराग

जन्म से मृत्यु तक
हम प्यार के भटकाव में जीते हुए
अपने को जोड़ते, तोड़ते हैं
इस प्रक्रिया में
सम्बन्धों की प्रवंचना से
जब भी मुंह मोड़ते हैं
उदासी भरे क्षण
हमारे अन्तर्मन को झंकृत करते
राग-विराग से भरते।

                                    7  दिसम्बर 2012









ऋषि उवाच

ऋषि कहता है
जीवन का अन्त कब, कहां, कैसे होगा
उसे समय ही जानता है
औरसमय ही
जीवन में कर्मों को
भवितव्य तक पहुंचाता है
जीवन और कर्म का गहरा नाता है।

                                     8  दिसम्बर 2012









विखर रहे शब्द-भाव

विखर रहे शब्द, भाव, विभाव
रिक्त होते सर्जना के भंडार
कहां गए घुटनों के बल चल रहे
आंखों में पल रहे प्यार
सौरभी वातास का कमरे के भीतर आना
मौसम के आंगन में
रंग-विरंगी कलियों का खिलना
अपने वृंत पर इतराना
और कुम्हलाकर झड़ जाना

कई दिशाओं में बंट गया है
मनसा-अन्तराल से निकलती नदियों का बहाव
विखर रहे शब्द भाव-विभाव

वह ज्योति भी धूमिल हुई
जो दिखाती थी अंधकार में रास्ता
अब तो विखराव के कगार पर खड़े होकर
देखना है आत्मदर्शी दुष्प्रभाव
और समेटना है शब्द-भाव।

                                          10  दिसम्बर 2012





ईश्वर - अस्तित्व

यदि यह सच है कि ईश्वर ही
सर्वत्र, प्रत्येक स्थिति में,
कर्म में, अकर्म में, महाशक्तिमान बन
आनन्द-सुख, दुःख-व्यवथा, अन्तस्-मर्म में
कण-कण में व्याप्त है
फिर हम जो आस्था से निर्मित
सपने, आकांक्षाएं लिए कठिन से कठिन
कर्ममय जीवन को अर्थवान बनाने की
यथा संभव कोशिश करते हैं
समय की दहलीज पर उम्र का वलिदान करते हैं
हमारे किए का वर्चस्व अदृश्य के हाथों में होता है
हमारा तन-मन जीवन पर्यंत इस बोझ को ढोता है।

                                             16 नवम्बर 2012




अभावग्रस्ततता

कभी भी कुछ भी घटित होता
विश्वकर्मा द्वारा
रचे गए समय के खेल में
अनियंत्रित व्यक्तिपरक
स्वार्थ और लोभ के ठेलम-ठेल में
हम भूल गए हैं कि
संस्कृति भी एक शब्द है
जो जीवन से इस प्रकार जुड़ा है
कि उसे अलग कर देने से
युगान्तरकारी, विनाशक भूकम्प आता है
जिसमें हमारी आस्थाएं
डाल से टूटे पत्ते की तरह उड़ जाती हैं
हमारी जीने की कशिश
कहीं से टूट कर
कहीं जुड़ जाती है
हम देखते रहते असहाय, अपनी बेबसी,
अर्थ की असमर्थता, सत्ता की मनमानी के बीच
संकटग्रस्त अभावग्रस्त जीवन की असमर्थता तथा
नश्वरता के खेल में।

                                                                     17  नवम्बर 2012






नवपथ-गामी


चलो फिर से उन रास्तों पर चलें
भले ही विपरीत स्थितियों में हाथ मलें
प्रेम और आत्मीयता को अक्षुण्य रखना
कष्टप्रद क्रिया है
जीवन की यही तो सार्थक प्रक्रिया है
हमें प्रेमीले रास्ते पर चलना है
अपनी वर्तमान स्थितियों को बदलना है।

                                                 19  नवम्बर 2012






चिन्तन की स्लेज


मैं अपने चिन्तन की स्लेज पर घिसटता हुआ
भावों की बर्फानी डगर पर चल रहा हूं
ठंडी हवा परिवर्तित मौसम की
कंपा रही हड्डियां बाहर भीतर
चल रहा हूं बर्फानी डगर पर
ठंडी हवा के कहर से कांपता सिहरता हुआ
शताब्दी के नए मूल्यों की
ठंडी, उदास, हवाएं नव युग-आगमन का
समाचार देती कि आने वाला समय
इतिहास निरोधक होगा
मानवता-विरुद्ध
हो सकता है बैसाखियों पर चले
विकास-अवरुद्ध अपने में सिमटा हुआ

शब्दों के पतझार में
मैंने नव संवेदना का वसन्त चाहा
बहुरंगी भावों की कलियों को
जीवन पर्यंत देखा और सराहा
वहीं तो मेरा प्रारब्ध रहा
जिसे समय ने मेरी झोली में डाल दिया
बहुत तरह के बहुत सारे संदर्भों के बीच
चलता रहा दुश्कृत्यों से कटता हुआ
असमय की बर्फीली हवाओं के बीच
चिन्तन की स्लेज पर घिसटता हुआ।

                                                      20  नवम्बर 2012








राधा की प्रतीक्षा


महाभारत युद्ध समापन की रात
जब आर्यावत वृंदावन पांडवों की विजय पर झूम रहा था
राधा रानी भूखी प्यासी
चिन्ताग्रस्त जागती रही
कौन जाने कृष्ण गोकुल, बरसाने आएंगे

राधा-रानी जमुना-तट पर
18 दिनों तक बैठी सूर्य देव से
कृष्ण के विजय की प्रार्थना करती रही
कछारों से उड़कर बलाकाओं का झुंड
जब अर्ध गोलाकार जमुना के ऊपर
चक्कर लगाता
तब उनसे भी राधा पूछती-
क्या कृष्ण युद्ध में विजयी होकर
लौटेंगे मथुरा, ब्रज, नन्दगांव
विजय-गर्व से प्रसन्न-चित्त लौटेगे श्याम
रास लीला भूमि ब्रज धाम

हे राधे, इतिहास के सन्नाटे के आर पार
जब समय अपना पंख पसारे उड़ता है
नए युग से जुड़ता है
हे राधे! तब भी गूंजते होंगे तुम्हारी प्रार्थना के स्वर
तभी क्या बैठी रहोगी कालिन्दी तट पर
चम्पा, चमेली, पारिजात के फूलों से अंजुरी भर
कृष्ण के आगमन की राह जोहती रहोगी निःस्वर अविराम।

                                                                          21  नवम्बर 2012








आमजन की यंत्रणा


सत्ता के हाथों में आत्म-लोभ-कलश है
जो खालीपन भरने के लिए
पराए सुख पर करती है अतिक्रमण
देश और आमजन का जय जयकार करती हैं
जिन्होंने तन-मन-धन सर्वस्व अर्पित किया
शहीद हुए देश के लिए
वे किस्से कहानियां बनकर रह गए
समय की चोट सह गए
वे सभी प्रणम्य हैं जिन्होंने आमजन के संकट को जिया
अब तो इस लोभ लाभी जनतंत्री मेले में
नए -नए लोग आए हैं
नई वैश्विकता, नई नई चाहें
लगाती हैं तरह तरह की दांव, कुर्सी के लिए
छल-प्रपंच-सत्ता के जाल में फंसता जाता आमजन
कैसा समय आचा है
कुछ असर नहीं होगा- गूंगा, बहरा है सिंहासन
चाहे जितना करो आन्दोलन, आमरण अनशन
भले ही कर दो बलिदान देश के लिए।

                                                                 22  नवम्बर 2012








जीवन होता बहुरंगी


जीवन होता बहुरंगी
अन्दर, बाहर
जन्म-जन्मान्तर
अनगिन रंगों से सजता
बहुआयामी पंखों से नापता
आकाश की ऊंचाई और
सागर की गहराई
सूर्य-किरण सतरंगी...

जीवन से बंधकर जीव
हो उठता कर्ममय, सजीव
अभीष्ट-पथ पर चलते हुए
इन्द्रियों को बनाना होता पौरुषेय, जंगी...

यूं तो सबेरे से शाम तक
विविध कर्म करते हुए-
आकांक्षा की खाली झोली भरने के लिए,
आत्मीयता के घने छायादार वृक्ष तले
अथवा नदी, सागर तट,
या वर्फाच्छादित पर्वत पर
नए-नए रूप सर्जित करते हुए
समय-प्रवाह में हिचकोले लेती
आत्म-निष्ठा की नाव चलती बांधे पाल रंग-विरंगी

                                                                      23  नवम्बर 2012








आत्मलोभ का रिक्त कलश

उनके हाथों में आत्मलोभ का रिक्त कलश है
वे उसे पराए-सुख से भरते हैं
यही उनका सार्वजनिक गुण है
जिसे भोगता हैं आमजन...

तन, मन, धन से
जो वतन के लिए वलिदान हुए
वे तो अब किस्से कहानियां बन गए
वैश्विक बदलाव में घिरी है जन-संस्कृति
चरागाहों में आ गए हैं बनैले पशु
बेमेल, भुतही आकृति
वे भयहीन, मुक्त भाव से आ गए हैं
लेकर अपने साज-सामान, नववृत्ति
परतंत्रता की हवा चलने लगी है चारों ओर से
ऐसे में आमजन अपने दायरे में असमर्थ और विवश हैं
एक ऐसा युग आ गया है जहां विकास चौबन्द है
अब तो अपयश भी यश है
उनके हाथों में मुक्त बाजार का कलश है।

                                             24  नवम्बर 2012








बीते पलों की खंडित राग गुनता हूं


मैं शब्द-बाग में स्मृतियों के फूल चुनता हूं
अभिव्यक्ति की चादर संवेदन के ताने बाने से बुनता हूं
कुछ तो खो गया अर्थ
विसंगतियों की माटी में
जिसे खोजता रहा समय की थाती में
बीते पलों का खंडित राग गुनता हूं
आनेवाले समय की पगध्वनि सुनता हूं
किश्तों में बटे जीवन को जीता हूं
हर तरह से रीता हूं।

                                            27  नवम्बर 2012







 प्राण संवेदना का द्वार

एक शून्य से निकल कर
भीड़ भरे रास्ते में आ गया हूं
लोग अपने सिर पर
लोभ-लाभ, अहम, अहंकार
और घोर निजता की गठरी लादे चल रहे हैं
उनके लिए मैं शब्द-गीत लाया हूं
चारों ओर घिरी निराशा का अंधकार में
उनके भीतर भी
छोटे, बड़े सपने पल रहे हैं
वे संघर्षरत हैं
चाहें जीत हो या हार....

भीड़ आक्रोश में है
वे बुझे हुए मन से नारे लगा रहे हैं
कई तरह के लोग हैं
कई तरह की आकांक्षाएं हैं
कई तरह के छोटे बड़े दुख हैं
उन सबके लिए मैंने खोल दिया है
प्राण-संवेदना का द्वार

                                     28  नवम्बर 2012







 सृजन मर्म

समय के वियावान में मन
पागल घोड़े की तरह भागता बेतहासा, अनियंत्रित
विभिन्न दिशाओं में चक्कर लगाता
दिमाग के अस्तबल में रख पाना
उस पर निगरानी करना कठिन कर्म है
सृजन का यही मर्म है।

                                      29  नवम्बर 2012







स्वतंत्रता

अभी हम स्वतंत्र नहीं हुए
आमजन के प्रति कर्तव्य-धर्म निभाना नहीं आया
स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छन्दता नहीं
सत्ता की अहंमन्यता नहीं
मनुष्य के प्रति हृदय की समरसता, अपनत्व, प्यार
स्वतंत्रता को स्थायित्व देते हैं
जन-अनात्म-बोध के क्षण
घातक सिद्ध होते हैं
बलिदानियों ने स्वतंत्रा का जो जलाया था मशाल
उसकी रोशनी क्षीण हो रही है
हमें मशाल को बुझने नहीं देना है
जान देकर भी उसे जलाना है
जन-जन में नव निर्माण का मंत्र जगाना है।

                                           30  नवम्बर 2012








तथागत का स्मृति-दंश

श्रावस्ती के जंगलों में
भील कन्याओं का समवेत-गान-स्वर उभर रहा था
वीणा के तार साधा
उन्हें इतना ढीला मत करो
कि बजे नहीं
और इतना कसो मत
कि टूट जाए
सुमधुरगान की स्वरलहरियों से
जंगल का कण-कण सुखानुभूति से भर गया
तथागत की समाधि टूटी
उन्होंने अधोन्मेलित आंखों से
भील कन्याओं को देखा और फिर समाधिस्थ हो गए
उनके अन्तर्मन में
पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल की यादें उभरी,
फिर एकाकी मौन का घटाटोप घिर आया
हौले से बरस गई
यादों की बदरी।


                                            1 दिसम्बर 2012













Thursday, 27 December 2012

पृथ्वी का पहला व्यक्ति

मैने जब पृथ्वी पर पहला पग रखा
सौन्दर्याचारी बना- मां का मुंह निहार
फिर बना लोभाचारी-अच्छे स्वादिष्ट भोजन,
सुस्वादिक वह सब कुछ जिससे पेट भरता हो
तभी प्रेम के अंकुर उगने लगे
मैंने जब धरती पर प्रथम पग रखा
बनाये कितने सारे मित्र, सखा
मां के प्रथम चुम्बन से मेरे भीतर पैदा हुई
नई शक्ति और वही मेरे अस्तित्व का औदार्य बना
खट्टा-मीठा, सुन्दर-असुन्दर,
पांच तत्वों के साथ मेरा संबंध सधा
प्रथम बार चलने पर किलकारियों के बीच
मेरे भीतर एक सपना जागा-प्रकृतिजन्य नवान्न मांगा
जिससे जीवन पर्यन्त बंधा रहा
भले ही स्वप्नारोही रहा अथवा स्वप्न विपाशाकूल
अनगिन फलों को चखा..
मेरी प्रथम मां जन्मदात्री जननी थी
दूसरी मां यह हरित भरित पृथ्वी
जिस पर चलकर मैं उसके ईर्द-गिर्द घूम आया
कितने योजना-दर-योजन
कितने प्रकृति की सुन्दरता और मधुरिमा को चूम आया
अपने भीतर आनन्द-उल्लास का खालीपन भर लाया
बनाए मित्र, हिती, बन्धु, सखा एक से एक
जिनके साथ जीवन बिताया।
                   
                                              1 नवम्बर, 2012




भोर बेला का पाखी

भोर बेला का पाखी
उड़ता है नभ की दूरियां मापता
क्षितिजों में उन्मुक्त..

कौन जाने भला वह कहां जाएगा
पाखी की यात्रा का अन्तिम पड़ाव
नीड़-ग्राही नहीं होता
वह उसे निस्पृह भाव से त्याग देता है
जिस नीड़ को सयत्न निर्मित किया था
जिसमें अपने शावको के साथ
ममत्व का खेल खेला था
वर्षा, ताप, तूफान को झेला था
किन्तु सदा ही अपने पंखों से
नापता रहा आकाश की अनन्तता
खोजता रहा एक वृक्ष की डाल
जिसे समझता रहा नीड़ के उपयुक्त...

भोर बेला का पाखी
अस्तित्व की सुरक्षा के लिए
शावको का पेट भरने के लिए
कितनी तरह के ठिकानों पर दाना चुनता है
और चोंच में भरकर रोटी दाना
नीड़ की ओर चल देता है
जहां प्रतीक्षा करते होते
उसके नन्हे नन्हे प्रिय शावक
कुछ जागते कुछ शुषुप्त..

भोर बेला का पाखी
आनन्द भरे पंखों से उड़ता
अपने कर्म पर जीता
संबंधों से सदा रहता रीता
किन्तु खोजता सहचर उपयुक्त....

                                             2 नवम्बर, 2012






सत्ताधारी

वे सब मिथ्यावाद के खेल में माहिर थे धर्मकांटे पर चढ़कर
अपने को झूठ की तराजू का वाट बना गए
और उनके पीछे की पीढ़ी आज के उथल पुथल में
धर्म-अधर्म, सत्य-असत्य, लोभ-क्षोभ
पाप-पुण्य, अच्छे-बुरे की पहचान करने में
अपने को असमर्थ पा रही है
सभी वेद शास्त्र, उपनिषद, पुराण, श्रुतियां
अर्थहीन हो गई है समय के वाचाल-तथ्यों के बीच
कितने सारे उपदेशक, नेता, ज्ञानी
कर रहे हैं व्याखाएं वर्तमान-युग की अव्यवस्थावाद की
कष्टप्रद व्यथाओं के बीच
आदमी का अस्तित्व-विघटन
आधुनिकता से पलायन करता
वोटखोर नेता जन-कल्याण की योजनाएं बनाते हैं
एक दूसरे से आगे बढ़कर बड़े सत्ताधारी होने का दम भरते हैं
अब महादेव, राम, कृष्ण
हनुमान, माता-देवी भी असहाय हैं
आज का सत्ताधारी
महाबली, फरेबी, झूठा, अनाचारी
सत्ताधारी देवा तथा आमजन
हाथ में हरे छूरे लिए घूम रहे हैं
आमजन असहाय हैं
आज के सत्ताधारी, देवी-देवताओं से अधिक
पूज्यनीय तथा भीमकाय है।

                                                                   3  नवम्बर, 2012







मायाजाल

रात की निविड़ नीरवता बन्द आंखों में
सपनों के मायाजाल बुनती है
स्मृतियोंको इतिहास कोश है एक एक को चुनती है
कितना कुछ घट जाता है अंधकार में
और हम सबेरा होने की प्रतीक्षा करते हैं

रात का अंधकार कभी निस्तव्ध मौन रहता
कभी अट्ठाहास स्वर में पागल की तरह हंसता
कभी माताल होकर खेत, खलिहान में
अथवा फुटपाथ पर अथवा बार बनिताओं के साथ
बार, नाच घर, क्लबों, पबों, होटलों में
मचाता हुड़दंग
छा जाता उसके अन्दर बाहर
जीवन आनन्द का मांसल-आनन्द
बहशीपन झलकता है अंग-प्रत्यंग में
रात का अंधकार रोमानी क्षण दे जाता
और प्रकाश उसे नई ज्योति से भर जाता

रात एक असत्य, मिथ्या जारिणी की तरह
अपने माया-लोक का सृजन करती है
और सबेरा उसे मिटा डालता है
रात और दिन का नाता अटूट है
हम जिस तह सबेरे की प्रतीक्षा करते हैं
उसी तरह शाम आने की प्रतीक्षा में लालायित रहते।

                                                                               5  नवम्बर, 2012








नवान्द का विपर्यय

सब कुछ है मेरे पास, मेरे भीतर बाहर
मन, हृदय, बुद्धि से बढ़कर कुछ भी नहीं
किन्तु मैंने उसे विखराया है अराजकता खेत में
किसान की तरह बीज बोया है
फिर पाया नहीं वह अभीष्ट
जिसे खोज रहा था सागर-तट की रेत में
सुनता रहा लहरों का आहत-क्रंदन
जो बार-बार तट से टकराती है
और करती प्रार्थना अगाध, अगोचर से
कि शांति दे सागर के उच्छ्वल, अशांत
सदा उद्देलित मन को
जिसे अनन्तता और विशालता की
एकरुपता से गम्भीर अगम्य
सौन्दर्यवान बनाया
वह सब समय के गहरे में विलीन हो जाएगा
सृष्टि की नवपरिवर्तन चर्किका
तीव्रगति से चलेगी, अंतस् की सड़क पर
नवान्द-रस-उच्छ्वास से भर जाएगा।




                                                              6  नवम्बर, 2012









समय-पंथी

जो गाता था आनन्द विभोर तरह-तरह के गीत
अपने गीतों से बनाया करता था
दिन प्रतिदिन नए-नए मीत
जो रुपहली नदी धार के पार चले गये
अन्तिम गीत की अन्तिम पंक्तियां
आज भी गूंजती है कानों में -
वीणा के तार इतना कसो मत कि टूट जाए
और इतना ढीला भी मत करो कि बजे ही नहीं
खेतों-खलिहानो में, फुटपाथों, अट्ठालिकाओं में
बार, कहवा घर, नाच घरों में
ऐसा फैशन परस्त प्यार किस काम का जो सजे नहीं
उनके गीतों में जीवन का फिलसफा था
और नव राग-रंग था, उमंग थी
परन्तु अब तो वह समय-प्रवाह में बह कर
अनन्त में चला गया है।
रातें होगीं, सुबहें सप्तवर्णी किरणों की सौगात लेकर
धरती को प्रकाशमय बनाएगी
जन-जन अपनी प्रतिदिन की दिनचर्या में लग जाएगा
कहीं आनन्दोल्लास, कहीं दुखद त्रासद क्षण विषाद
समय आदमी की भाग्यलेखा लिखता है
नए-नए अध्याय जोड़ता है
जीवन के नवगन्तव्य-पथ की ओर मोड़ता है।


                                                                         7 नवम्बर, 2012








सत्य - असत्य

तिल-तिल कर जीवन के क्षण बीत जाते
किन्तु हम अपने भीतर के सत्य को उजागर नहीं कर पाते
आधि दैविक, आध्यात्मिक और आधि भौतिक शक्तियों के रूप में
तथा उनके अधिष्ठाता मित्र वरुण की कृतज्ञता ज्ञापन नहीं कर पाते
और आत्मलोभ, अहंकार, प्रवंचना के जंगल में
भटकते रहते हैं आलो-छाया के बीच
उम्र के अंतिम पड़ाव तक ले जाता
मनुष्य को सत्य असत्य के पथ पर
बहुत सारे अन्तर्ज्ञान के तथ्यों से खींच।

                                                                         8 नवम्बर, 2012








रिक्तता

सब कुछ चूक जाता
रिक्त हो जाता
प्रकृति का प्रत्येक प्राणी
मौसम-परिवर्तन
मन के भीतर चलते रहते युद्ध
कितने सारे सुखी देवों
और असुखी असुरों के हो जाते उन्नत-मार्ग अवरुद्ध
युगों का यही मानव-आचरण
जितना भरता कर्म-घट
उतना भरता कर्म-घट
उतना रिक्त हो जाता
अन्ततः कोई भी कुछ नहीं पाता...

सब कुछ चुक जाता
रिक्तता की आंच सबको सताती
जिनके पास सारे सुख के सरंजाम हैं
उन्हें भी नींद नहीं आती
बस धन-लिप्सा का मायाबी अंधकार
घेरे रहता है उम्र भर जीवन के आर-पार
आलोक भी उनकी छलना का होता शिकार
आत्म-लोभ से जोड़ लेता नाता....

सब कुछ चुक जाता
हमारे अहम और ऐश्वर्य की महत्ता
नहीं रह पाती धन और अधिकार की सत्ता
हमारा अभिमान कितना कुछ अनर्गल ढाता
हमारे पास जो भी जितना होता
वह सब चुक जाता

                                                            9  नवम्बर, 2012







निरन्तर चलने की कोशिश

मैं उबड़-खाबड़ रास्तों पर चलता रहा
अभावों में पलता रहा
फिर भी इच्छाओं की नाव को
बुद्धि और मन की पतवारों से खेता रहा
अभीष्ट तट की ओर जाने के लिए
भीतर नित नव नूतन भाव का उद्वेग मचलता रहा...

याद आते हैं वे लमहे
जब हम नदी तट पर बैठे
रेत से मुट्ठियां भर-भर खाली करते रहते
पांव के अंगूठे से
तरह तरह के बालुका-चित्र बनाते
हृदय में नदी प्रवाह का आनन्द भरते
उसी समय से हृदय में
नए -नए रुपों में ढलता रहा...

कितना कुछ बीत गया समय
कितना पानी मनकी गागर से रीत गया
हर स्थिति में, हर दशा-दिशा में
समय हमें जीत गया
अतीत संघर्षों में बीता
और वर्तमान हर मोड़ पर छलता रहा
फिर भी आदमी लस्त-पस्त अभावग्रस्त चलता रहा।

                                                                     10  नवम्बर, 2012







मन का अन्तरीप

आस्था का त्योहार है दीपोत्सव
जो आता है आनन्द, शुभ, धन-धान्य भरा संदेश लेकर
सज जाता है घर -आंगन-हृदय
छा चाता है उल्लास जन-जन में नव भाव-विभव

संप्रीति का त्योहार है दीपावली
नए शुभ-साध्य-भरा स्तवन, पूजन स्वर
चारों दिशाओं को मुखरित करते
खाली हृदयों को नव उमंग से भरते
प्रार्थना के वचन गूंज उठते
आनन्द भरा हो जग जीवन साज वैभव

घर बाहर सजते प्रदीप
दूर के रिश्ते आते समीप
खान-पान सुखमय नव आनन्द सौरभ से
महक उठता मन का कोना कोना
छा जाता नववसन्त मन-जीवन में जो बसाया है अन्तरीप
किन्तु टूट जाता अचानक स्मृतियों का खिलौना

                                                                                    12  नवम्बर, 2012





दीपावली

दीपावली का प्रदीप
देता है हमें नव संदेश
कि हम रहे एक प्राम, मां माटी के संतान
प्रेम और पारस्परिक विश्वास के धागे से बंध
मानव मूल्यों से सधे.....

दीपावली का प्रदीप यह भी सिखाता है
कि हमें प्रकाश देने के लिए
वर्तिका की तरह जलना है
अपने संस्कारों में, जन प्रतिश्रृतियों में पलना है
आत्मडोर से बंधे......

दीपावली का प्रदीप यह भी सिखाता है
कि हमें प्रकाश देने के लिए
वर्तिका की तरह जलना है
अपने संस्कारों में, जन प्रतिश्रतियों में पलना है
आत्मडोर से बंधे....

दीपावली का प्रदीप
स्नेह और संपीति का उजाला देता
धरती पर छाए अंधकार को दूर करता
हृदय को आलोक-प्रभा से भरता
किन्तु पहचान नहीं पाते
प्रकाश की परिभाषा धरती के बंदे....

                                                                                        13  नवम्बर, 2012







समय-वंदन

सबको नमन
नवसंवत्सर का अभिनंदन
आज के असमय का मिट जाए आहत-क्रन्दन
अज्ञान, अपसंकृति, अन्तर-कलह का हो भंजन
सबको नमन
स्वागत नवसंवतसर का नव आगमन
आने वाले समय का वन्दन

                                                                           14  नवम्बर, 2012      









भग्न-स्वप्न

जिस सपने को अपने कैशोर्य काल में संजोया था
जब टूट गया
ऐसा अहसास हुआ
समय ही मुझसे रुठ गया

दुःख-सुख की संकरी, ऊबड़ खाबड़ पगडंडी पर चलते हुए
देखाहै आलो-छाया की आंख मिचौनी
भाव-सद्भाव-विभाव-अभाव के बीच
देखा है लोगों की आत्मलिप्सा घिनौनी

प्रत्येक सुबह नए-नए सपनों के अक्षर-बीज को
मन की माटी में उगाता हूं
और भावों के जल से सींचता हूं
फूल फल की आशा नहीं करता
क्योंकि संवेदना का भाव-सेतू
जो नई प्रतिज्ञाओं के पूरा होने से पहले ही टूट गया
और करता रहा आत्मदंश की आंख मिचौनी।

                                                                             15  नवम्बर, 2012      









Wednesday, 26 December 2012

स्वार्थ घर

आदमी अपने स्वार्थों में डूबे
बनाते छोटे बड़े मन्सूबे
मुंह में फरेब की भाषा
मथती अन्तस की दुराशा
तरह तरह के आदमी
तरह-तरह के काम अजूबे

गहरे से कहीं से कोई बंधना नहीं चाहता
आत्मस्थ प्रेम-सागर के किनारे बैठ आंसू बहाता
अपनी हार पर, खोए हुए अतीत पर
वर्तमान के उन हिमखंडों को सहेजता
जो सुखान्ति के दिखते किन्तु दुःख का कारण बन जाते
कितने बड़े छोटे मान-अपमान के आइसबर्ग उनके भीतर डूबे

आदमी जन्म से मृत्यु पर्यन्त
छोटा से बड़ा बनने का सपना संजोता है
इसी कामना को साकार बनाने में, अशक्त, अकर्मण्य,
अपना वर्तमान खोता है।
कितने सारे हंसते, मौजमस्ती में डूबे
अनगिनत चेहरे हैं दूसरों का भाग्य छीनकर निजता की
गठरी कंधे पर लादे
लस्त-पस्त चल रहे बनाते नये-नये मन्सूबे
अपने स्वार्थ में डूबे।

                                                                     23 अक्टूबर, 2012





शब्दाचारी

चलो आज मैं शब्द बनूं
और तुम बनो मधुर मंजुल गान
जिसके मधुर स्वर से
भर जाए सुखानन्द, सुरभित,

सौम्य-सुखान्वेषी अंतर का खालीपन
आह्लादित हो संप्रेषित नव-प्राण

दिग-दिगन्त में छा जाए नवविहान
टूट जाएं सभी बन्धन
जड़ता उन्मुक्त हो जीवन की हर तान
दुख, विषाद, अवसाद से हो मुक्त
अभाव-संकट से हो परित्राण
छा जाए जगती में चारों ओर
भव्य आलोप्रभा दिव्य नवप्राण।

                                          24 अक्टूबर, 2012







सन्धि पथ

सन्धिपथ सन्धिपथ सन्धिपथ
आलोकित हो अन्धकार में डूबा पथ
प्राण चेतना  की अग्नि प्रज्वलित हो
नव-आह्लादित, नव-संप्रेषित हो आनन्द गान
धरती से आकाश तक
मनुष्य हो जाए सौहार्द्र में संलिप्त
पराजित हो संकुचित, पराजित, जीवनमान
अपना शक्तियां दें नीरस शुष्क जीवन को
नव ज्योति-प्रभा, नवानन्द, नवयुग-छन्द
हृदय-पुष्प हो पराग भरा मधुमन्त हो मकरन्द
हमारे भीतर जो कर्ता है महान
देखता सब कुछ और वह भी
जो हमें दिखाई नहीं देता दृष्टि पथ
सन्धिपथ,  सन्धिपथ,  सन्धिपथ,
ऐसा हो दाता का प्रसाद जहां गरल भी हो जाए सुधा
सब तरह से मुक्त हो जीवन, मिटे जन-जन की क्षुधा
अग्नि, हवा, महासिन्धु, अन्तरिक्ष, धरा
जीवन को करे सुख-सौंदर्य भरा
कंटकाकीर्ण रक्त-पथ-श्लथ हो प्रशस्त
सन्धिपथ,  सन्धिपथ,  सन्धिपथ।

                                         25 अक्टूबर, 2012







अकेलेपन का पाखी

ओ पाखी, तिनका लिए चोंच में
तु किस क्षितिज में उड़ेगा
किस आम्रकुंज में
किस सघन जंगल में
किस वृक्ष की डाल से जुड़ेगा
ओ पाखी, तू अकेला नीड़ का निर्माण करेगा
अपने लिए अथवा अपनों के लिए
कि नन्हें शावक सुख से जिए
ओ पाखी, तुझे वर्तमान-संकट से बचने की चिन्ता है
अस्तित्व को बचाने की चिन्ता है
किन्तु तुझे क्या उस तूफान के बारे में पता है कि जो
 भग्न संहारक बने घरों, चौपालों
वृक्षों को धराशायी करता
क्रूर सेनानायक की तरह
तीव्रगति से चला जाता है
ऐसे में तुम्हारे नीड़ का निर्माण कैसे बचेगा,

ओ पाखी, यह जीवन तुम जी रहे
तिल-तिल कर नीड़ का निर्माण कर रहे
जिस क्षण बज्रघाती तूफान आएगा
बादल, बिजली के साथ
घनघोर घटाओं से मिलाए हाथ
पता नहीं कब आए
और नीड़ को नष्ट कर जाए
ओ पाखी, अस्तित्व की आपाधापी में
तू जंगल को आत्मकथा का
एक अंश भर रह जाएगा
कौन, कितने दिनों तक याद करेगा
जीवन कर्मवृक्ष की छाया में
लोभ-लाभी क्षणों की भूल भुलैया से
जीवन नये कोणों से जुड़ेगा।


                                                         26 अक्टूबर, 2012








दुर्गा-भसान

माँ दुर्गा का भसान हो गया
किस तरह से रच रच कर चतुर शिल्पियों ने
देवी प्रतिमा का निर्माण किया
उन्हें रंगों, आभूषणों, वस्त्रों से सजाया
सबसे उत्कृष्ट कला कारी का मानदंड स्थापित किया
और वही हुगली के जल प्रवाह में डूबाई जा रही है
भला कौन
उन्हें डूबने से बचाए
पूर्ववत् सौन्दर्य मंडित करे नवनीत सुन्दर अद्वितीय
नए आनन्द-रव से भर दे
दिशाओं में नवगान नव प्राण,
नरनारी फिर से मनाए उल्लास
स्थापित हो कला का उत्कृष्ट प्रतिमान
मां दुर्गा, तुम्हारा इस तरह से तिरस्कार पूर्वक
लोगों का लोक रीति-आचरण
सौन्दर्य-शिल्प के साथ अत्याचार है
युग-नव जागरण के प्रति कुत्सित व्यवहार है
हे मां, आह! तुम्हें जल में निमग्नकर
बांस बल्लियों से ठोकर लगाकर गहरे में
भसान-उत्सव मनाना कितना वीभत्स है
यह जीवन और कला का परिहास है।
भसान एक माया - विश्वास है।

                                                                      27  अक्टूबर, 2012







इतिहास-समय-सत्य

इतिहास हमें नहीं बनाता
हम इतिहास बनाते हैं
इसी तरह जन्मते ही
बनते जाते रिश्ते नाते
ितिहास जीवन का दर्पण होता है
दर्पण के साफ सुथरा होने पर ही
समय का प्रतिविम्ब झलकता है
प्राण-संवेदना चित्र-विचित्र रूपों में चमकता है
समय ही जीवन को इतिहास बनाता हुआ चलता है।

हम कितनी सारी चेष्टाएं करते हैं
कितने सारे विन्दुओं पर जुड़ते विछुड़ते हैं
साध्य को परचम बनाकर
अपना वर्तमान सार्थक, मूल्यवान, अर्थवान बनाता
अथवा समय के गर्त में डूब जाता
वहां भी अकर्ण्यता और व्यक्तिपरक कुचेष्टाएं
जीवन को कर्महीन, कर्तव्यहीन, दीन हीन बनाते
और इतिहास बनाने को दौड़ में पीछे रह जाते
पृथ्वी, आकाश, समुद्र, अग्नि, हवा सभी
समय-गति से कर्तव्यनिष्ठ होकर
अपने को  सृष्टि सम्यक बनाते
किन्तु मनुष्य स्वेच्छाचारी, अहंकारी, बन जीवन भर
तृष्णालु, आकांक्षा और लोभ की झोली लिए
साम, दाम, दंड, भेद से उसे भरने की चेष्टाएं करता
ज्ञान और कर्म का सही सार्थक
और वस्तुनिष्ठ समष्टि सेवा से बंधना
नवयुग के परिवर्तन से जुड़ना ही इतिहास को बनाने का प्रयत्न करता
इतिहास हमें प्रतिपल बनाता है
किन्तु  आदमी इतिहास के सत्य को सदा कलंकित करते।

                                                                                      29  अक्टूबर, 2012








दुष्काल-नर्तन

काल का दुश्चक्र कब, कहां, कैसे
भीषण तम तांडव करेगा
कौन जाने?
देश के राष्ट्रपति से लेकर नौकरशाह तक आश्चर्य और
झुंझलाहट भरी आंखों से देखते हैं
भयानक तूफान का जानलेवा खेल
विज्ञान के आंकड़े भी नहीं समझपाते
नाही खगोल शास्त्री इस विपद्जनक स्थिति से
मुक्ति-मार्ग खोज पाते
अमरीका के भव्य शहरों, न्यूयार्क, न्यूजेर्सी,
बोसटन, कनेक्टी कट में तबाही मचाती हुई शैंडी
पूर्वी तटों को अस्त व्यस्त करती हुई
विध्वंस का जानलेवा खेल खेलती
सागर की ऊंची उठती लहरों पर बैठी
मनुष्य के कमजोर होने और
आश्रय के लिए भागते हुए दृश्य को
देखकर आनंदित होती
महाकाल का यह भयावह खेल
कितना भयावह, कितना विकास रोधक है
कितना कष्टकर है।

                                                                       30  अक्टूबर, 2012






अस्तित्व-अनस्तित्व


मैं अपने को बार-बार दोहराता हूं
शब्दों के घोड़े पर बैठकर
क्षितिजों के चक्कर लगा आता हूं
कितनी तरह से
सोए हुए लोगों को जगाता हूं
और अब विक्षुब्ध, संघर्षरत
सन्नाटा भरे माहौल के बीच
अपने को फिर से दोहराने के लिए
तरह-तरह के यत्न करता हूं
मैं अस्तित्व-अनस्तित्व की आग में जलता हूं
शब्दों के सहारे अभिव्यक्ति की राह पर चलता हूं।

                                                                       31  अक्टूबर, 2012





Monday, 24 December 2012

नवस्वर-सर्जन

सुबह-शाम, दिन-रात
परिवर्तित होते रहे मौसम
और चलते रहे पथ पर थके पांव
जब स्मृतियों की आंधी आई जान लेवा तूफान के साथ
मैंने अनुभव किया- कितना ऊबभरा होता अकेले का सफर
और जब अन्तस् - आकाश में
पीड़ा की बदली छाती है
सुख और दुख के बीच होता जय-विजय का नाटक
मैं तटस्थ हो जाता,
नहीं टूटती जड़ता दुर्निवार
चाहे जो जीते, चाहे जिसकी हो हार
सर्जित करने का यत्न करता रहा
 नए-नए स्वर बार बार।

                                                           9 अक्टूबर, 2012







आत्म बोध

तेरे प्रति जो आत्म बोध जागता है
और जो अंधकार घिरा था, भागता है
क्षण भर में ही निरभ्र, ज्योतित, एकात्म प्रेम
आन्दो पहार लिए आता है
सारा द्वेष-विद्वेष ओझल हो जाता है
हमारे तुम्हारे बीच
नया रास्ता बनता है

यह स्थितियों का खेल है
उसी से हममें जो मेल है
अंतराल का सूनापन
नव-उमंग में बदल जाता है।

                                            10 अक्टूबर, 2012







नचिकेता के प्रश्न

यम से निचकेता ने पूछे बहु सारे प्रश्न
किन्तु सारे प्रश्न अनुत्तरित रह गए
क्योंकि युग-बोध नए युग के साथ बदल जाता है
कोई सत्य एक रूप नहीं होता
समय के साथ बदलता है अर्थ
जो उसके सही स्वरूप को नहीं पहचानते
और सत्य से बंधे होते हैं, उसके सारे आयाम हो जाते व्यर्थ

नचिकेता के प्रश्नों का यम सही उत्तर नहीं देते
ना ही उसकी सत्य-ज्ञान जिज्ञासा को शांत कर पाते हैं
बस परमात्मा प्राप्ति के साधन रूप श्रेय की प्रशंसा कर
साधारण मनुष्यों की विशेषता और उसके वैराग्य-भाव को
प्रशंसा करते हैं। नचिकेता सोचता है - संसार का
संहार करने वाले मृत्यु देवता यम अपने
मृत्यु दान परक धर्म से तनिक भी इधऱ-उधर जाने वाले नहीं
क्योंकि उन्हें नहीं छू सकता किसी भी तरह का स्वार्थ
और जीवन-मृत्यु स्वार्थ से परे होते
जितना अर्जित करते वह सब महाकाल प्रवाह में खोते।

                                                                                   11 अक्टूबर, 2012








देश राग

मैं अपनी आंखों से देश को देखता हूं
उसके इतिहास को गुनता हूं
दिन-प्रतिदिन नए-नए स्वप्न बुनता हूं

मैं अपनी आवश्यकताओं, मांगों और जरूरतों को
देश की चौखट पर रखता हूं
उन पर संसद में कभी कभार बहसे भी होती है
बिना किसी निष्कर्ष के
यूं तो बनाए जाते हैं नव निर्माण के नए-नए खाके
किन्तु कैसे बताएं खोखली दलीलों और
बेबुनियाद बहसें जिनके बीच
अस्तित्व विहीनता आदमी के उत्कर्ष को
नकारा बना देता है

मैं अंधकार भरे रास्ते पर
चल रहा डगमग पांव
बहुत दूर छोड़ आया शहर, गांव
यूं तो प्रतिदिन अपने लिए
नए सपनों से भरा आकाश चुनता हूं।

                                                          12 अक्टूबर, 2012






शब्द खेल

शब्द-खेला-घर में
भावों की अजब गजब गुड़िया, गुड्डे बनाता हूं
और उन्हें अक्षर-शाही बाजार में बेचने ले जाता हूं
कुछ गुड़िया गुड्डे अच्छे भाव में बिकने पर
जश्न मनाता हूं
गुनगुनाता हूं नया गीत
जिसे गढ़ता नए ताल-छन्द स्वर में...

शब्द खेला घर मेरे भीतर बना है
बना क्याहै बनाया है अदृश्य शक्ति ने
उसे उजागर किया है
मेरी शब्द-प्रेम-कर्म आस्था-भक्ति ने
जन-जन के लिए सप्तपर्णी प्यार का वितान तना है
सुखानुभूति होती है मन-अलिन्द-मर्मर में..

शब्द खेला घर कहीं टूटा फूटा है
कहीं अभिव्यंजना से बनी दीवारों की
भग्न-परतें दांत चिढ़ाती हैं
फिर भी खेला घर जीर्ण शीर्ण होने पर भी अनूठा है
और उसी पर रहता आया जीवन पर्यंत निर्भर...।

                                                                                      13 अक्टूबर, 2012







नये नीड़ के लिए

कितने सारे प्रिय-अप्रिय,
आत्मीय अनात्मीय संबंध छूट गए
कितने सारे मौसम, मधुमास,
झंझावात, तूफान
और बर्फीली तेज हवाओं में बेमौसम हो गए
आत्मदंशित-संबंध रिश्तों के आत्म-सेतु टूट गए
अब नए परिवेश में
नए के लिए नवाकांक्षा का नीड़ बनाना है
भले ही कष्टकारक स्थितियां
पग-पग पर बाधाएं डालें
प्रत्येक खडयंत्र से नए नीड़ को बचाना है
क्योंकि हो न हो पुनः लौटकर नये नीड़ में आना है।

                                                                                15 अक्टूबर, 2012





अहंभाव

मैं अपना अहंभाव सबसे ऊपर रखता आया
शायद इसीलिए
अपनी हंसी-खुशी,
अपना आनन्दोल्लास
उन सब के साथ बांटता रहा
और यह भी उजागर करता रहा
कि इयत्ता की प्रभुसत्ता सर्वोपरि होती
इसी मंशा को सफल करने के लिए
संबंधों के आर-पार
आकांक्षा जाल फैलाया
और अपनी अहमियत सबसे ऊपर रखता आया

दर्द और संघर्ष सहना पुरुषार्थ है
खंडित अस्मिता को जीना विनार्थ है
अंधकर में ही रोशनी का जन्म होता
असमर्थतावश हार के कारण ही हमारा सर्वस्व खोता।

                                                                                    16 अक्टूबर, 2012







पथचारी

मैं अपने पथ पर चलते हुए रुकता जा रहा
संभवतः चुकता जा रहा हूं
रोज सबेरे उठकर सूर्यप्रणाम करते हुए
जब मैं धरती-नमन के लिए झुकता हूं
तब मुझे लगता है बाहर से हरा भरा लगता
किन्तु भीतर से सूखता जा रहा हूं
मौन आह की आहट से चौंक जाता हूं
कि समय किस तरह पंछी की तरह डैने फैलाए
उड़ता हुआ दिगन्त के करीब पहुंच गया
और मैं कभी यह पथ, कभी वह पथ
विविध कोणों पर मुड़ता रहा
एक क्षितिज से टूट कर दूसरे से जुड़ता रहा।

                                                       17 अक्टूबर, 2012













शब्द-भाव के बीच

मैं शब्दों के छन्दों में जीता रहा
फिर भी अगीता ही रहा
नहीं जानता समय का रथ किन -किन मार्गों से
गुजरेगा, नए पथ पर चलेगा
और उसी क्रम में
मेरे भीतर नए-नए सपनों का आकार पलेगा
हर हाल में शब्दों की फटी कमीज को सीता रहा

कहीं मिलती रही नई-नई राह
कहीं मिलती रही बेगानी आह
असंख्य विघ्न बाधाओं से बचाकर
संजोए रखा मन की चाह

हर हाल में चलता रहा
हालांकि बन्धो-उपबन्धों में पलता रहा
अपनी अभिव्यक्ति की थाती बचाता हुआ
नए-नए शब्द बोध के लिए मचलता रहा
अनाशक्त होते हुए भी
उस सभी स्थितियों से संपृक्त हुआ
मौन रहते हुए भी अभिव्यक्त हुआ
शब्दों के भाव-अभाव के बीच जीता रहा।

                                                          18 अक्टूबर, 2012






नवसंवत्सर

तेज कदमों से वीहड़ रास्तों पर चलकर
आ गया हूं ऊंचाई पर
अब मुझे धीमी गति से उतरना है शिखर दर शिखर
परन्तु कैसे करूं गति धीमी

तेज चलने की आदत से मजबूर
कैसे करूं धीमी अपनी गति

कर्मण्डेव अधिकरास्ते का मंत्र लेकर
इतनी दूर की यात्राएं पूरी की
एक आश्वस्ति के साथ चला था
पथ-श्लथ, डगमग पग
किन्तु स्वयं को
सम्हालते, सम्हलते पूरी यात्रा
जो कई चरणों में अधूरी थी

और अब कैसे करूं फिर से यात्रा-संयोजन
उसी गति के साथ
क्योंकि  मौसम का रुख बदल गया है
नवसंवत्सर में जीवन का रंग नया है।


                                                           19 अक्टूबर, 2012








सत्य का रूप

सत्य हमारे भीतर
कई आकार लिए छिपा होता है
वह बाहर तभी आता है
जब पैदा होते हैं असत्य के अनगिन जीवधर

सत्य हमारे भीतर
तरह-तरह से असत्य की समीक्षा करता है
किन्तु असत्य की सतह तक पहुंचने में
अपने को असमर्थ मानता है
प्रत्येक प्रभात की अरुणोदय बेला में
नई प्रतिज्ञाओं के साथ असत् का अंधकार हटाता हूं
अपने को दोहराता हूं
सत्य का आलो-अंधकार से अटूट नाता है।

सत्य हमारे भीतर प्रतीक्षा
नए-नए आकार ग्रहण करता
अपने को उद्भाषित करता
गाता आत्म-अनात्म के विविध गीत-स्वर
नए जीवन के स्वागत में नवोच्छ्वास भर

                                                    20  अक्टूबर, 2012









माँ देवी के आगमन पर

प्रतिवर्ष, प्रति घर आंगन, चौपाल, पार्क में
छा जाता अद्वितीय आनन्द
कुछ दिनों के लिए
सभी दुख, संताप, अभाव
प्राण-सप्तम के साथ हाथ मिलाकर चलते स्वच्छन्द
एक हो जाते कुत्सित, मलिन क्षण
गाते वैभव भरा गान एक स्वर
मां देवी के आगमन पर

सारी जगती खिल उठती है
खिल खिलाती शरत की मधुमाती हवा
सफेद बादलों के हाथ में हाथ डाले
सारे बोझिल क्षण हो जाते उल्लासित सुख के हवाले
नव-वातासी-मृदुल-ठंड-सिहरन से मुग्ध-मुद्रित
सिवाल और शहर के पथ सारे
सर्मित होते शिशिवर के क्षण न्यारे
अम्बर और धरती गाते नवोल्लास गीत एक स्वर
मां देवी के आगमन पर

प्रकृति लेती अंगडाई
धनधान्य भरा धरती पर नवान्न-छठा छाई
वन पाखी अपने नीड़ों को सजाते
नव-विहान गान गाते
हरित भरित झूमती अमराई
सब कुछ परिवर्तित होता
और बहुत कुछ बदला नहीं जाता
संसृत का विधि-विधान अनस्वर
मां देवी के आगमन पर।


                                            22  अक्टूबर, 2012






Saturday, 22 December 2012

टूटा स्वप्न

सुख भला अच्छा लगता है जब सोया दुख जगता है
भले ही क्षणिक हो यह अंतरण
जबकि अंधकार विलगता है और
प्रकाश हमारे रास्ते को प्रशस्त करता है
हमारे आसपास, देश दुनिया में, जन-जन में
अंधकार के विरुद्ध मन में
छाया है आक्रोश
कटी पिटी आशाओं के परिणाम स्वरूप
हृदय में अग्निचक्र सुलगता है
सोया हुआ स्वप्न
आत्म उद्वेग, समष्टि के दुखों से आहत
नींद में ही बार-बार चौंक उठता है।

                              1 अक्टूबर, 2012








रास्ता मुड़ता रहा

हम कहानी बनाते बनाते
स्वयं कहानी बन गए
देखा आत्म-प्रपंच, मिथ्या शब्दाडम्बरी
प्रवंचना-भाव-वितान नए नए
जब हम अर्थ-अनर्थ के कीचड़ में फंसे
तब ईर्ष्यालु अहंकारी शब्दचोर हंसे
चलता रहा यह कथा-सूत्र
कुछ कटता, कुछ जुड़ता रहा
अंधकार भी जागा, सबेरे को जगाया
नदी का कितना जल बहता रहा
रास्ता बार-बार मुड़ता रहा

                                      2 अक्टूबर, 2012




विपरीत मतों से ही आते दुर्दिन

सुनाता कई मुखो से-भते भते मतिर्यिन्ना
ताक ताक धिन ताता धिन्न
धिनक-धिनक धिन, देश-काल की घटना गिन
ताताधिन ताता धिन ताता धिन
विपरीत मतों से ही आते दुर्दिन
ताक धिना धिन, ताक धिना धिन
लाल जवाहर हो या जिन्ना

                                         3  अक्टूबर, 2012







सागर का आर्तनाद

रात भर सुनता रहा सागर का आर्तनाद-उद्वेलन
प्रचंड गर्जन
रात भर अंधकार को आत्मसात करता,
गरजता, भरजता, तट पर इतिहास की
अव्यक्त-कथा लिखता-मिटाता
लहरों से जोड़ता कालजयी नाता
सिखाता मानव संस्कृति को सर्जन-विसर्जन
रात भर सुनता रहा सागर-गर्जन...
अपने भीतर की अणुविस्फोटों से उत्सृज ज्वाला-व्यथा
कहता है एकाकी व्याकुल भीषण आग को सहता
संसृति का यह असहनीय दृश्य देखकर
ब्रह्माण्ड के असंतुलित सर्जन-न्याय के प्रति
मन में आक्रोश होता है
सागर के ऊपर चमकती चन्द्रिका अपने कामना
जाल में सागर-हृदय बांधती
करती उसी पीड़ा का संवर्धन
रात भर चलता रहता सौन्दर्य नाट्य मंचन...।

                                               4 अक्टूबर, 2012





जो पाया वही खोया

भींड़ भरे रास्तों से निकलकर
नई राह पर आया हूं
मन-मस्तिष्क की झोली में नए शब्द भाव लाया हूं
और उन्हें ही तो दता आया नव स्वर
वही सब तो देने के लिए यह जीवन जिया
अभीष्ट पाने के लिए
दुखों का ताजमहल बनाया
वही सब तो दिया जन-जन को
जो समय और समाज से पाया हूं।

                                                  5 अक्टूबर, 2012







प्रणाम्य सागर-तट

छोड़ आया सागर-तट
और जगन्नाथ धाम
लौट रहा खाली मन अपने ग्राम
खोजने नया पथ, नई दृष्टि अभिराम
करता हूं उस अनन्त जलाधिपति को प्रणाम।

                                                 6 अक्टूबर, 2012







सफलता -असफलता

मैंने यह सीखा कि
कर्मनिष्ठ जीना जरूरी है
अभाव, दुश्चिन्ता, असफलता, विखराव, असंतोष
अकर्मण्यता एक मजबूरी है
अच्छे से जीने के लिए यह सोच भी कि
समाज से जो कुछ लिया
उसमें से कितना वापस किया
विसंगतियां छाई रही मस्तिष्क-मन पर
बहुत सारा जीवन निजता, मिथ्या भ्रम में बिता दिया
संभवतः इसीलिए समझ नहीं सका
ठीक ठीक जीने की प्रक्रिया
जो सफलता और असफलता के बीच की दूरी है।

                                              7 अक्टूबर, 2012














Thursday, 20 December 2012

राधा की अन्तरपीड़ा

महाभारत के युद्धोपरांत कृष्ण
मथुरा वृन्दावन का रास्ता छोड़कर
द्वारका का लम्बा रास्ता चुना
राधा के वियोग-आंसुओं की याद नहीं आई....

कृष्ण चाहते तो मथुरा-वृंदावन पधारकर
ग्वाल, गोपियों, राधा को स्नेह भरी प्रेमिल
सांत्वना और मिलन-आनन्द का
रास सर्जित कर सकते थे
किन्तु कृष्ण का मन जैसे मथुरा,  गोकुल
नन्दगांव, बरसाने से टूट गया था
वे फिर से प्रेम-व्यामोह में बंधकर
राधा-गोपियों के साथ पुनः रासलीला
नहीं रचाना चाहते थे
किन्तु हस्तिनापुर से विदा होकर
क्षण भर के लिए उनका ध्यान उदास
राधा के मलिन मुख की ओर घूम गया
मन ही मन राधा को स्मरण किया
कृष्ण के मुंह पर चिन्ता की विषाद रेखाएं घिर आईं
आकाश में बजने लगी दुंदंभी, बांसुरी स्वर उभरकर
ब्रह्माण्ड को स्पंदित कर दिया
अनन्त से एक आवाज आई
सबसे ऊंची प्रेम-सगाई।

                     18 सितम्बर, 2012



अंतर्घाती पीड़ा

एक माहौल में
एक ही तरह जीता हुआ
आदमी अपने अस्तित्व के प्रति
चिन्तित और उदास होता है
बेमौसम पावस का प्रच्छन्न घन
उसकी पलकें भिगोता है
अन्तर्घाती पीड़ा ढोता है।

                                19 सितम्बर, 2012




इतिहास हन्ता आवाजें

जागते जागते सो जाता हूं
इतिहास हन्ता आवाजें
शताब्दी के अंधकार में
तेजी के साथ उभरती है
उनके विपत्ति सूचक स्वरों को
भविष्य के काले दिनों की संकटबद्ध स्थियां गुनते हुए
अर्धोन्मीलित पलकों में
अलस-नींद भर सो जाता हूं

एक दर्द उभरता है हृदय के आर-पार
इतिहास की घटनाओं के साथ
महाभारत-युद्ध में तूणीर से छूटते वाणों
को धनुष की टंकार के बीच घायलों, मरने वालों के
हाहाकार के शब्द कानों में गूंजते हैं
गूंजते हैं रावण, मेघनाथ के क्रूर-अट्ठहास
राम, लक्ष्मण के धनुष-वाण की टंकार
इतिहास की घटनाओं में मैं खो जाता हूं।

                                            20  सितम्बर, 2012







अर्थ-अविन्यासी गीत

तुम कुछ बोलो मत
बस सुनो
शताब्दी का छन्दविहीन गीत
इस अविश्वासी, असहिष्णु, आत्मलोभी
रुग्ण मानसी-युग में
मुश्किल है पाना एक सच्चा गीत...

फिर भी कितनी सारी यंत्रणाएं भोगते हैं
कितनी तरह से अपना सुख संयोजते हैं
अनन्त काल से चली आ रही
दुख-सुख को प्रवंचित रीत..

दुख-सुख की आंख मिचौनी खेलता
हमारा समय कभी पास
कभी दूर से स्मृतियों का माया जाल फैलाता है
परोक्ष-अपरोक्ष सपनों को
पूरा करने का राज बताता है
खोलता है राज मौसम के बदलते परिवेश में
मन में छिपी संप्रीत
बोलो मत, सुनो, सुनो, सुनो
समय का अर्थ-विन्यासी गीत

                                      21  सितम्बर, 2012







सर्जन का स्वरूप

वह कौन है जो सृष्टि-जाल में
सर्जन और विनाश की सारी लीला समेट लेता
वह कौन है, जो प्रकृति के विविध रूपों को रचता,
शक्ति-पुंज-प्रकाश अथवा निविड़ अंधकार फैलाता
वह कौन है, जो पृथ्वी तथा समस्त लोकों की
उनके अधिपतियों की रचना कर उनका अधिष्ठाता बन जाता
वह कौन है, जिसकी लीला अतर्क्य, अवणीनीय है
निर्विकार, अदृश्य, हमारे बाहर-भीतर व्याप्त है
वह कौन है, जिसकी इच्छा मात्र से
प्रकृति का सर्जन-विसर्जन होता
वह कौन है, जिसकी शक्तिओं के विरुद्ध
कोई भी, कुछ भी नहीं कर पाता
वह कौन है जो हमारे भीतर बैठा रहता
सर्व ब्राह्माण्ड-व्याप्त है
जीवन में सुख-शांति के लिए उसका स्मरण ही पर्याप्त है।

                                                                                    22  सितम्बर, 2012








प्रेम की नदी

प्रेम की नदी बहती है अबाध गति से
साहसी उसके भीतर आकर तैरते हैं
आनन्द तरंगों में सुखानुभूति से आह्लादित होते हैं
डुबकियां लगाते सांस खींच
तैरते लहरों के बीच
उनके लिए जीवन होता सुन्दर, सुखकर
वेद, उपनिषद, रामायण,
महाभारत, श्रुतियों की कथाओं में यही वर्णित हैं
प्रेम की मर्यादा पुरुषार्थ से बंधी होती
चाह की कसौटी आकांक्षा से सधी होती
आदमी बंधा होता प्रेम रति-गति से

प्रेम की नदी हर युग में बहती द्रुत गति से
कुछ हैं जो दरश-परस से सुख पाते,
कुछ हैं जो तट पर बैठ हृदय-घट भर ले जाते
कुछ हैं जो धारा में अवगाहित होकर
आनन्द-राग से उत्फूल्ल होते
लोभ और अहंकार से सूखती प्रेम- नदी की धारा
संगति और असंगति से।

                                                                  24  सितम्बर, 2012






मैं भूख हूं

मैं भूख हूं
सदियों से सारी दुनियों में परिवर्तन की हवा बनकर
दिशाओं को रौंदती आईं हूं
मिटाती आई हूं सत्ता और सिंहासन की शान
तहस नहस करती आई हूं आदमी का स्वाभिमान
इतिहास गवाह है-
राजमहलों के भग्नावशेष यह कहानी कहते हैं
कैसे भव्य-एकाधिकार को नष्ट किया
कैसे जलाया मनुष्य के भाग्य का दिया
कैसे कैसे दुख के तवे पर
अभाव की रोटियां सेंकती आई
कैसे कैसे स्वयं भूखे रहकर बच्चों को रोटी के टुकड़े खिलाई
प्यार किया और
मृत्यु की नदी में उन्हें फेंकती आई
निरुपाय, अवश, सजल आंखों से उन्हें
पानी में डूबोती आई
उनकी कातर चीत्कार सुनती हुई
युग की सीढ़ियां चढ़ती आईं।


                                  25  सितम्बर, 2012








पांचाली की असमर्थता

महाभाहत युद्ध में
केन्द्र विन्दु में रही पांचाली
जो इतिहास से एक अनुत्तरित प्रश्न पूछती रही
दुःशासन को शीश-महल में गिरते हुए देखकर
मुझे हंसी क्यों आ गई?
उसी क्षण
हस्तिणापुर की माटी में
प्रतिहिंसा का बीज अंकुरित होना शुरू हुआ
जो सघन-वृक्ष बनकर
महाभारत युद्ध का कारण बना
भरी सभा में कौरवों-पांडवों के महाबलशाली योद्धाओं के बीच
दुःशासन के हाथों बलात्कारित होते
उसका वस्त्र उतरते हुए सभी देख रहे थे
महामना भीष्म भी क्यों मौन थे?

मैं युद्ध रोक सकती थी
कुंती युद्ध रोक सकती थी
गान्धारी भी युद्ध रोक सकती थी
किन्तु नारी शक्ति पुरुष-शक्ति के सामने पराजित हुई
नीति और नीयति से
अहंकार-मति से उस समय
हो गई थी पराजित, एकाकी पांचाली
स्त्री-अपमान कोह संहारक, महाविनाशकारी युद्ध में

                                                           26  सितम्बर, 2012







प्रेम, सौन्दर्य का अलाव

प्रेम और सौन्दर्य
मनुष्य को महान बनाते हैं
और उनका अपमान
उसका सर्वस्व ध्वस्त करते जाते हैं
मनुष्य के भीतर
तरह-तरह के आत्म-लोभ के अलाव जलते
जिन पर वे कामना की रोटियां सेकते
नादान वे हैं कापुरुष
जो अपनी हविश और आंसुओं से
अलाव को ही बुझा देते ।



                                                          27  सितम्बर, 2012






संतप्तता

एक शून्य से दूसरे शून्य तक
अकेले चलते जाना है
हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना है
यूं तो जीवन में संबंधों का चिर-विचित्र ताना-बाना है
शून्य से चलकर
शून्य में ही समाहित होते जाना है।

पृथ्वी की सुरम्य हरीतिमा
बदलते मौसम
हमारे भीतर सर्जित करते विश्वास, आस्था एवं प्रेम
और यह भी कि कर्म ही धर्म है
जिसे समझ पाने में
जीवन का झेलना होता  दुष्चक्र
बस अपने अभीष्ट के लिए
गन्तव्य-पथ पर चलते जाना है।


                                                    28  सितम्बर, 2012






अंतिम यात्रा का पड़ाव

आ गया हूं सागर-तट पर
जो सागर मेरा आजन्म अंतरंग रहा
वह अपनी उदवेदना के हाहाकार में
आत्मस्थ, आत्म-अनुरक्त, आत्म-पियासाकुल
महाउद्वेलन में लहराता
तट को बार-बार छूने आता है
उसे प्रच्छालित करता,
अपने प्रचंड आक्रोश से
जलमग्न करता
उजाड़ता बेशुमार जन-जीवन, पशु-पक्षी, सघन वन
घर, गांव, शहर
और संसृति का भरा-पुरा जीवन
उसी सागर-तट पर खड़े होकर
उसके विशाल रूप को देख रहा हूं
अपने भीतर उसकी मौन-क्रांति -छन्द को
ग्रहण कर रहा हूं
जो जीवन पर्यंत सुनाता रहा अपना रौद्र स्वर
उसी आकर्षण में बार-बार आ जाता उसके तट पर


                                                                                   29  सितम्बर, 2012