Saturday, 9 July 2011

हिन्दी-संस्मरण- बाबा नागार्जुन के साथ

मुझे सप्तक में सम्मिलित करने वाले, मेरी कविताओं के पाठक अज्ञेय,  बाबा नागार्जुन तथा डॉ. विद्या निवास मिश्र को मैं अपना साहित्य गुरु मानता हूं। जिस तरह अज्ञेय मुझे स्नेह देते रहे, उसी तरह बाबा नागार्जुन भी। वे कभी-कभी अचानक मेरे घर आकर एक दो दिन जम जाते और बिना किसी औपचारिकता के कहते, तुम्हारी नई कविताएं सुनने की इच्छा थी, सो चला आया और तुमसे मिलना भी था। क्या लिखा है नया, सुनाओ। मैं विनय पूर्वक बोलता - बाबा पहले आप नहा-धोकर भोजन कर लें तब कविताएं सुने। बाबा बोलते- वो सब बाद में होगा। यूं तो रोज-रोज नहाता नहीं, नास्ता लेकर चला हूं। अभी खाने का भी मन नहीं, बस काफी या चाय पिला दो।  कुछ देर तक तुम्हारी कविताएं सुनूंगा।

घर पर यह उनका पहला पदार्पण था। मेरे प्रतापादित्य रोड, कोलकाता पर स्थित मकान को बाबा ने कैसे खोज लिया यह आश्चर्य है। हिन्दी कविता के वरिष्ठतम् कवि का इस प्रकार बिना किसी पूर्व सूचना के आना मेरे लिए विष्मय भरा अनुभव है। यह घटना 1980 के मार्च महीने की है। वे हमारे घर दो दिन रहे, जमकर कविता पाठ हुआ।  मैने अपनी कविताएं सुनाई,  उन्होंने अपनी। और साहित्य चर्चा में बहुत कुछ जानने समझने को मिला। इसके पहले बाबा 1978 में भारतीय भाषा परिषद के कैमक स्ट्रीट स्थित पुराने भवन में रूपाम्बरा द्वारा आयोजित तीन दिवसीय युवा लेखक शिविर में पधारे था। उसमें भी वे अचानक आए और मुझसे कहा कि- स्वदेश, तुम्हारी युवा लेखक शिविर में एक बूढा भी शामिल होने आया है। उन्होंने हंसते हुए मेरा हाथ पकड़कर जोर से झझकोरा। मैने कहा बाबा यह हम सब का सौभाग्य है कि आपका आशीर्वाद मिलेगा।

युवा लेखक शिविर में डॉ. सुरेन्द्र चौधरी, रमेश बक्षी, सुदर्शन चोपडा, डॉ. कृष्ण बिहारी मिश्र, डॉ. बलदेव बंशी, डॉ. विनय, डॉ. नरेन्द्र मोहन, डॉ. गंगा प्रसाद विमल, परमानंद श्रीवास्तव, डॉ. चन्द्रकान्त वांदिवडेकर, डॉ. शम्भु नाथ, डॉ. नागेन्द्र चौरसिया, जगदीश चतुर्वेदी, सुरेन्द्र तिवारी, आदि लेखकों ने भाग लिया था। बाबा ने समापन संगोष्ठी की अध्यक्षता की। उन्होंने खुले दिल से हिन्दी की आधुनिक स्थिति की चर्चा की। उन्होंने कहा कि आलोचना की स्थिति पर मुझे दुख होता है। आज तो लेखकों के भिन्न-भिन्न गोत्र बन गए हैं। ऐसे गोत्र धारी लेखकों, आलोचकों से हिन्दी को खतरा है। संगोष्ठी में उन्होंने चार प्रस्ताव भी दिए - 1) गोत्रधारी लेखकों आलोचकों की राष्ट्रीय सूची छपानी चाहिए। 2) उनके लेखों का मूल्यांकन उसी तरह करना चाहिए। 3) गोत्र-आचार्य -संहिता तैयार की जानी चाहिए।  4) गोत्र बदलने वाले घुसपैठियों को चिन्तन, हनन के अपराध के लिए मौलिक-साहित्य सीमा से निकालकर बाहर फेंक देना चाहिए। बाबा नागार्जुन लेखकों के गुटबंदी से बेहद क्षुब्ध थे। उनका वक्तव्य मेरे द्वारा संपादित्य रूपाम्बरा द्वारा 1981 में प्रकाशित पुस्तक रचना और आलोचना,  खंड-1 में शामिल है।
गोष्टी समापन के बाद बाबा एक बेंच पर लेट गए थे। सभी लेखकों के चले जाने के बाद मुझे बुलाकर बोले- स्वदेश मुझे दिल्ली जाना है। कुछ पैसे हों तो दो। मैंने बाबा को 500 रुपये दिए। उन्होंने 300 रख लिए बाकी दो सौ मुझे वापिस देते हुए बोले इसकी जरूरत नहीं। तुम इतनी बड़ी संगोष्ठी बुलाए हो मैं जानता हूं तुम्हारा खर्च बहुत लम्बा है, रखो।
एक शाम डॉ. बालशौरि रेड्डी जब भारतीय भाषा परिषद के निदेशक थे, अपने घर पर मुझे तथा पत्नी उत्तरा को खाने पर बिलाया था। पहुंचने पर देखा, बाबा वहां पहले से मौजूद थे। रेड्डी जी ने बाबा के लिए गोश्त बनवाया था। और हमारे लिए शाकाहारी। बाबा गोश्त को इस तरह खा रहे थे जैसे कोई जवान आदमी खाए। बाबा नागार्जुन विभिन्न व्यंजन खाने के बेहद शौकीन थे। हमेशा भ्रमणमान रहते। पांव कहीं एक जगह नहीं टिकते। मेरी कविताओं के साथ मुझसे अधिक आत्मीय नाता रखते आए थे।

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