Monday, 16 April 2012

समय का अतिक्रमण

हमें कदम, कदम पर करना पड़ता है
समय के आगे आत्म समर्पण
जब भी आत्म-बोध पर प्रहार किए गए
जिजीविषा के संकट आते रहे नए, नए
हृदय की माटी में
जब भी उग आए दर्द के अक्षयवट
उसकी छाया से घनीभूत पीड़ा को मिला संरक्षण...

नव-संस्कृति के विकास और उन्नयन के
विविध आयामों से जुड़कर
कई कई बार यात्रा-पथ से मुड़कर
चिन्तन के बनाए ताने बानें
जिए भी तो बहुत सा राज छिपाए
कुछ बाहर, कुछ भीतर लिए
बनाए तरह-तरह के प्रवंचना-सेतु
सच और झूठ के बीच किए बहुत सारे बहाने
बस भागते रहे अस्तित्व की काली सड़क पर
देखे नहीं सकें वास्तविक जीवन का प्राणधर्मी दर्पण..

कुछ भाग रहे रोटी की तलाश में
कुछ भाग रहे सत्ता के अभिलाष में
कुछ भाग रहे काले-धन की गठरी सिर पर लादे
कुछ भाग रहे कुर्सी के लिए करते किसिम-किसिम के वादे
कुछ भाग रहे तोड़ते जन-विश्वास
सभ्यता, संस्कृति, आजादी ले रही हताश भरी उच्छ्वास
वे सभी भाग रहे करते समय का अतिक्रमण...

                                                                    28.03.12


शब्द-संकट
काले समय की अंधी आंधी से बचाकर
मैं देता हूं शब्दों को आत्म-संरक्षण
करता नई स्थितियों का वरण
इस जनकोलाहल में
सजाता हूं नए सिरे से यात्रा अभियान
जिससे बनी रहे प्रज्ञा शब्दवान...

समय-प्रवाह में चिन्तन की नाव को
आस्था और विश्वास की पतवार से खेते हुए
संघर्षरत, लहरों के आलोड़न से बचता
नाव को नई दिशा देता चल रहा हूं
असाध्य अंधकार में पल रहा हूं
एक विश्वास है कि
शब्द कभी न कभी होंगे प्राणवान।

                                                               29.03.12

आह्वान
ओ मेरे आजाद देश के खुशहाल
बड़बोले ऐश्वर्य-शाली धनी मानी
भ्रष्ट, काले कारनामों वाले
सत्ता-सिंहासनारुढ़
छल बल, दल, फरेब और बाहुबल से
कुर्सी की राजनीति करने वाले
संसद और विधान सभा की
गरिमा को धूमिल करने वाले
पिलाते आम जन को आश्वासनों की घूटी
ओ मेरे देश के पृष्ठपोषी, सत्ता भोगी
शब्दों को अपरुप, पराश्रयी करनेवाले,
अपने अहम् की केंचुल में बैठ शब्द साधक
तुम्हारी सोच की कितनी तश्वारे हैं झूठी
आओ हम मिलकर आजादी की
दशा-दिशा पर चिन्तन करें
आमजन की अभावग्रस्त खाली झोली को भरें।

शब्द-गीत
उड़ता हूं स्वच्छन्द
शब्दों के आकाश में निरानन्द
नए-नए शब्द-क्षीतिजों में गाता आत्मविभोर
कभी निर्मौन पर्वत के ऊपर मंडराते
चक्कर लगाते, नीली घाटियों, वनों, मरुस्थलों के ऊपर असर
नदियों, सागर के आर-पार......

मैं शब्द हूं। मैं अहम और लोभ से तटस्थ
गाता हूं अस्तित्व-गीत
उनके लिए जो हैं अभावग्रस्त, संत्रस्त
और अपनी दिशा स्वयं चुनता हूं
मैं नहीं रह सकता व्यवस्था के पिंचड़े में बन्द...

नेता, अभिनेता,
योगी, महात्मा, धर्मशास्त्री, पंडित, पुजारी,
सत्साईं, मौलाना, पादड़ी सभी के होठों पर रहता हूं
किन्तु जब देखता हूं आडम्बरी बनावटपन
कैसे मेरा गलत तरीकों से प्रयोग कर रहे हैं,
रचते भयानक द्वन्द
तब उड़ जाता हूं खोजने आत्मगीत के नए छन्द
उड़ता हूं प्राण-संवेदना के विस्तृत आकाश में निरानंद।
                      31.3.12

Wednesday, 11 April 2012

मैंने कभी अंधकार ओढ़ा नहीं

मैने कभी अंधकार ओढ़ा नहीं
सदा प्रकाश के लिए यत्न करता रहा
रोशनी से अंतर्मन भरता रहा
और उजाले का आंचल पकड़े हुए
अपने रास्ते पर चलता रहा
वह आंचल कभी छोड़ा नहीं....

कई बार अंधकार ने अपने चक्रब्यूह में
भ्रमित किया। कई बार मेरी रोशनी को
काटने, बांटने, आंटने की कोशिशें हुई
कई बार मेरे पथ पर कांटे बोए गए
असमय की प्रवंचना भरी वर्षा से
मेरे दिनकाल भिगोए गए
किन्तु मैं समय को
मुट्ठियों में कस कर थामे रहा
कभी भी उससे संबंध तोड़ा नहीं...

थामे रहा समय का हाथ
गाहे बगाहे यदि छूट भी गया उसका साथ
तो मैंने अपने को अंधेरे में पाया
और कष्टकर स्थितियां करने लगी अपमानित
होने लगा निराश्रित, पराजित
घिरने लगे विरोध और साजिशों के काले मेघ
अस्तित्व बन गया असहज, अस्वाभिक, संकटमय,
तब भी काले समय से संबंध जोड़ा नहीं..

                                                       23.03.12


जीवन की सीख
सीखा है मैंने प्रकृति से, जन-जन से
जीने के विविध संदर्भ
धरती की उष्मा पाकर उगते पेड़, पौधे,
कलियों की शुष्मा से भर जाता मन-उपवन

सीखा है नदी से, सागर से, लहरों के निश्छल, उच्छल,
कलकल, छल छल, करती ऊंचे नीचे गिरती उठती,
तट को समर्पित होती
अपना अस्तित्व अर्पित करती
सूखी सिक्ता का मन प्राण भिगोती
सीखा है पर्वत से साधना की मौन भाषा
सर्जित करते हवा, बादल, जल,
पूरी करते घाटियों की अभिलाषा
सीखा है, वन-प्रांतर से
नित नए रुपों में, हरियाली सर्जित करना
पशु,पक्षी, जीव जन्तुओं से
सीखा है मैंने उगते सूर्य की सतरंगी किरणों से
धरती की विविध रुपावली हरीतिमा से
सीखा है मैंने अस्तित्व-धर्म से
भीतर बैठे आत्मबोध-मर्म से  .....                                 
                                                           24.03.12


कालेधन की सुरंग में
कालेधन की अंधी सुरंग में
चाहे जितना चलते जाओ
वहां काले धन के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखता
वहां गहरा सन्नाटा होता
किन्तु वह भी काले धन की
काली चादर से ढंका रहता
जिससे फूटता विषैला रक्त अंग अंग में...

कितने सारे लोग,
देश भक्त, सेवक, जन-निर्वाचित प्रतिनिधि
अथवा छल बल कौशल से
सड़क से संसद, विधानसभाओं तक पहुंचे लोग
जो लगाने लगे पल पल
लोभ-लाभ का जन-भोग
चारो ओर उत्सव जैसा रंग छा गया
उड़ने लगी उनकी आकांक्षाएं
आत्मानन्द भरता
जैसे उन्मुक्त पंख खोले उड़ते विहंग में...

जन-रक्षक किस तरह बन जाता जन-भक्षक
आजादी का किस कदर झुक गया है मस्तक
किसी क्षितिज से प्रच्छन्न पराधीनता की
सुनाई दे रही देश-विरोधी दस्तक
काले धन के स्वामी स्वछन्द, अभिमानी
राजपथ से सिवान की टूटी फूटी सड़कों तक
बजा रहे अपने यश के मृदंग, ढोल, नगाड़े,
तरह तरह के छंद में
भला कौन जन-सेवक डाल सकता है विघ्न
सत्ता भोगी आनन्द में...

                                           26.03.12


प्रश्नों की गढरी लादे
मैं जन्म लेते ही सिर पर
प्रश्नों की गठरी लादे
समय की काली सड़क पर चल पड़ा
धरती की उष्मा, सौन्दर्य-छठा से
मन आनन्दित, प्रफूल्लित, आह्लादित हुआ
और जब जब जगाया सोनाली किरण भोर की
तब तब सुनाई पड़ने लगी आवाजें विषपायी
जन-अशांति, कोलाहल ओर छोर में हो रहे
विघटन और अंधकार की काली सड़क पर
चल रहा अनन्त-पथ पर
गन्तव्य की ओर दृष्टि साधे...
कभी कंधे पर, कभी सिर पर प्रश्नों की गठरी लादे...
अभी तक उन प्रश्नों में से एक का भी उत्तर नहीं मिला
जो अंधकार जन्म लेने के पूर्व छाया था
वही आज भी छाया है
प्रश्नों की भीड़ में केवल समय ने
आगे बढ़ने का सबक सिखाया
जो मेरी आस्था का संबल बना
मैने सदा विपरीत स्थितियों से उबरने के लिए
उसी समय का सहारा लिया
देखता रहा संसद से सड़क तक
आत्मलोभ, प्रपंच और सत्ताधारी लालषा का विचित्र खेल
आमजन और कुर्सी की राजनीति के चौसर-खेल में
जीतते रहे राजा, रानी, हाथी, घोड़े
और पिटते रहे गरीब, अक्षम पियादे
ऐसे में मैं बढ़ता रहा आश्वस्ति साधे
प्रश्नों की गठरी पीठ पर लादे...

अराजक-अंधकार से आम-जन को
कब और कैसे मिलेगी-मुक्ति और समग्र आजादी
कब होंगे पूरे पैंसठ वर्षों से बार-बार किए वादे
कब तक चलता रहूंगा प्रश्नों की गठरी लादे.....

                                                             27.03.12

साहित्य की चौपाल में

स्वदेभ भारती के उपन्यास आरण्यक पर समीक्षा गोष्ठी सम्पन्न
नवगठित संस्थान साहित्य की चौपाल छत्तीसगढ़ के तत्वावधान में राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी, कोलिकाता के अध्यक्ष डॉ. स्वदेश भारती के नक्सली समस्या पर केन्द्रित सद्य प्रकाशित उपन्यास आरण्यक पर सिंघई विला, भिलाई में 6 मार्च, 2012 को समीक्षा गोष्ठी सम्पन्न हुई। उल्लेखनीय है कि प्रथम प्रमोद वर्मा काव्य सम्मान सहित अनेकों राष्ट्रीय सम्नों से विभूषित से चौथे सप्तक के कवि डॉ. स्वदेश भारती के अब तक 24 काव्य संकलन सहित 10 उपन्यास प्रकाशित हैं तथा 40 से अधिक ग्रन्थों का उन्होंने सम्पादन भी किया है। वरिष्ठ कवि एवं छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के महामंत्री श्री रवि श्रीवास्तव एवं युवा आलोचक डॉ. जय प्रकाश साव ने विशेष टिप्पणी दी। साहित्य की चौपाल के संयोजक श्री अशोक सिंघई ने  आलेख प्रस्तुत किया जबकि शायर मुमताज ने गोष्ठी का कुशल संचालन किया व आभार भी  व्यक्त किया। ज्ञातव्य है कि डॉ. स्वदेश भारती एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती उत्तरा 4 मार्च से 6 मार्च तक एक राष्ट्रीय संगोष्ठी के लिए प्रवास पर भिलाई आये हुए थे।
आलेख में कवि व समालोचक श्री अशोक सिंघई ने कहा कि किसी भी उपन्यास को जीवन का चित्र कुछ इस तरह प्रस्तु करना चाहिए कि वह यथार्थ की वस्तुनिष्ठ प्रस्तुति करे। स्वदेश भारती जी का आलोच्य उपन्यास आरण्यक इस कसौटी पर कुन्दन की तरह खरा उतरता है। यह उपन्यास हमारे समय के जो निरन्तरता में हमारे साथ-साथ ही बीतता है, संघर्षों, त्रासदियों और सभ्यताओं के साथ व्यवस्थाओं की विफलताओं का एक बहुआयामी चिन्तक दस्तावेज है। आरण्यक का नायक भीमाराव समाज, धर्मों के तथाकथित झण्डाबरदारों के अन्याय, शोषण और दुष्चक्रों के खिलाफ कमर कसता है, समझौते की भाषा न समझने वाला भीमा एक-एक कर  समाज के सभी प्रभावी पात्रों के मुखौटों में जाता है, पर अंतहीन महाभारत के अभिमन्यु की तरह अपने पीछे कई प्रश्न छोड़ जाता है। आयशा, लाली, आशा जैसी महिला पात्रों के माध्यम से लेखक ने पुरुषवादी समाज के आदिम और बर्बर चेहरे को कई बार बेनकाब किया है। इस उपन्यास में विचार आसवित रूप में हैं जिन्हें हजम करने के लिए उसमें समय का जल श्रमपूर्वक मिलाना होगा। यदि पाठक के पास धैर्य हो और वह परिश्रमी हो तभी वह चिन्तन के इस प्रकाश को मानसिक आंखों से देख सकेगा। इस सिम्फनी का पूर्णतः रसास्वाद करने के लिए पाठक को विश्व साहित्य की अमर रचनाओं और पात्रों से पाठक को सुपरिचित होना होगा। भारती जी का उपन्यास मुझे अपने तई कैडस्लिकोप जैसा लगता है जिसे जब-जब घुमा-घुमा कर देखा जाये तो हर बार नये बिम्ब, नये चित्र नये अर्थ और अंततः नये विचार उपस्थित होते जाते हैं। मनुष्य के आस्था, विश्वास और संघर्ष की कहानी है आरण्यक। कुछ मिलाकर भारती जी आरण्यक एक ऐसा औपन्यासिक अरण्य है जो उसी को मानसिक जीवन जीने देगा जो अरण्य में जाने और अरण्य. में जी पाने की कला तथा कूबत रखते हैं।
लेखकीय उद्बोधन में डॉ. स्वदेश भारती ने कहा कि साहित्य में शिगूफेबाजी नहीं होनी चाहिए। लोकप्रिय लेखन के लिए बहुतेरे तथाकथित बड़े लेखकों ने ऐसा किया और साहित्य, विशेषकर उपन्यास विधा को बहुत नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने कहा कि मनुष्य अकेला आता है और अकेला ही चला जाता है और वह वस्तुतः अकेला ही चला जाता है। मनुष्य एकान्तिक और असाहय है। आम आदमी की व्यथा को यदि हम पाठकों तक नहीं लाते हैं तो अपने साहित्य कर्म से गद्दारी करते हैं तथा अपनी आस्था के स्वयं हत्यारे बन जाते हैं। मैंने अपनी रचनात्मकता में मनुष्य को अपने हृदय का प्यार दिया है। प्यार संघर्ष का ही दूसरा नाम है और इस संघर्ष में आत्म बलिदान और आत्म समर्पण होता है। हमें चाहिए कि हम मनुष्य की चेतना और व्यथा से जुड़ेतभी कुछ सार्थक लेखन सम्भव हो पायेगा।
उपन्यास पर अपना मन्तव्य व्यक्त करते हुए श्री रवि श्रीवास्तव ने कहा कि इस उपन्यास में मनुष्य के संज्ञान का सारा समय प्रतिबिम्बित होता है। इस उपन्यास से यह प्रतिध्वनि निकलती है कि मनुष्य एक डरावना मकान है जो कभी भी सम्पूर्ण नहीं हो पाता। उसके निर्माण में कुछ न कुछ कमियां रह ही जाती है और यही न्यूनता हमेशा सुधार और विकास की प्रेरणा स्रोत होती है। यह उपन्यास पाठक की परीक्षा लेता है। यदि वह पहले पचास पृष्ठों तक पढ़ने का श्रम और समझने की क्षमता का परिचय दे सके तब ही यह उपन्यास उसे अपने अंतस् में प्रवेश करने देता है।
युवा आलोचक डॉ. जयप्रकाश साव ने विशेष टिप्पणी देते हुए कहा कि साहित्य की अन्य विधायें विषय से बंधी हुई नहीं होती पर उपन्यास के लिए विषय पहली शर्त है। यथार्थ अपने नग्न रूप में उपन्यास में ही आता है और अपने समय की क्रूर सच्चाइयों को अभिव्यक्त करता है। दिक्कत यह है कि अधिकांशतः लेखक शिल्प व कला के खेल में यथार्थ पर एक चमकदार लेप चढ़ा देते हैं जिससे यथार्थ की तल्खगी कम हो जाती है तथा रचना मर्मस्पर्शी नहीं हो पाती। आरण्यक इसका अपवाद है और नग्न सच्चायों को पूरी तरह से सीधे ही प्रस्तुत करता है। नक्सलवाद की आतंकवादी और पूरी तरह से भटकी हुई मानवीय त्रासदी पर केन्द्रित यह उपन्यास विवरणमूलक गद्य, यथार्थ की वस्तुनिष्ठ तटस्था का एक आदर्श है। इसमें विलक्षण पठनीयता है।
इस अवसर पर वरिष्ठ कवि श्री शरत कोकास एवं श्री नासिर अहमद सिकंदर, कवयित्री श्रीमती शकुन्तला शर्मा, प्रो. सरोज प्रकाश, श्री प्रकाश, श्री एन.एन. पाण्डेय, श्री एस. एस. बिन्द्रा, शायर शेख निजामी, डॉ. नौशाद सिद्दीकी, श्री राधेश्याम सिन्दुरिया, श्री रामबरन कोरी कशिश, शायरा प्रीतिलता सरु, श्री शिवमंगल सिंह सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार व साहित्य प्रेमी उपस्थित थे।