Friday, 31 January 2014

राजनीति में भाषा का भ्रष्टाचार

21वीं शदाब्दी सांस्कृतिक तथा सभ्य लोगों के लिए है।
राजनीतिज्ञ भूखे भेड़िये की तरह अपने वोट पर वार करने के लिए अत्यधिक आक्रामक हो गए हैं। और मनुष्यों की भाषा भूल गए हैं। क्या उनके जीवन कर्म का यही आधार है?
आजादी के साथ स्वार्थ के लिए उत्श्रृंखल भाषा का प्रयोग करना शब्द- भ्रष्टाचार है।

Friday, 24 January 2014

To, Honorable Political Leaders of the country and Media (माननीय देश के नेतागण एवं मीडिया)

It seems strange that certain political parties and biased Media are ignoring the provisions of Indian constitution which provides a Parliamentary System of Democracy and not Presidential Form of Democracy

Accordingly after the parliamentary elections only elected MP's are authorized  to choose their leader by majority vote who becomes Leader of the House, Prime Minister and forms his cabinet on confirmation of the president, oath is taken and Govt. is formed.
Prior to Parliamentary elections how a PM is nominated by certain political Parties and impose that person PM condidate  on the people and imposing such person on the common people and enfluencing the electoral process against the spiritit of the constitution.

Is the country moving towards Presidential Form of Democracy. Then the constitution should be changed first by the Parliament.


यह देखकर आश्चर्यजनक लगता है कि कतिपय राजनैतिक दल और पक्षधर मीडिया देश के संविधान के विरुद्ध काम कर रहे हैं। जो संसदीय चुनाव होने के पूर्व प्रधानमंत्री का मनोनयन कर प्रचार प्रसार कर रहे हैं। हमारे संविधान में संसदीय लोकतंत्र की सीमा निर्धारित की गई है जिसके अंतर्गत संसदीय चुनाव के पश्चात बहुमत प्राप्त पार्टी के संसद सदस्य अपने नेता का चुनाव करते हैं जो संसद का नेता होता है  और प्रधानमंत्री के रूप में अपने मंत्रिमंडल  के साथ राष्ट्रपति द्वारा शपथ लेता है। कई दूसरे देशों में चुनाव के पूर्व राष्ट्रपति का मनोनयन किया जाता है जहां का संविधान हमारे संविधान से अलग् है।

क्या हमारा देश उसी रास्ते पर चल पड़ा है। यदि ऐसा है तो पहले संविधान को बदलें।

Friday, 17 January 2014

Swadesh Bharati: Recognition of Hindi At UNO

Swadesh Bharati: Recognition of Hindi At UNO: Recognition of Hindi At UNO An Appeal NGO’s Working for development of Hindi Worldwide, Govt. PUCs State Govt.s Corporations, Bank...

Recognition of Hindi At UNO

Recognition of Hindi At UNO
An Appeal


NGO’s Working for development of Hindi Worldwide, Govt. PUCs State Govt.s Corporations, Banks, Hindi Officials, Administrators, Business Houses, Trusts, NRI 
Senior Citizens and Common People. General Donors.

Dear sir,

Best Wishes for Happy New Year
                                    and greetings on Makar Sankranti, Pongal 

I on behalf of National Hindi Academy Kolkata Most humbly draw your kind attention regarding acceptance and recognition of Hindi as one of the world Languages of the world at United Nations.

During Last 65 years of Indian Independance  at several occassions and at different forums of All India Official Languages Conferences, Seminars, International Conference on Language and Literature, World Hindi Conferences. We have passed several unanimous resolutions to accept Vishwa Bhasha. Hindi as a Language of UNO. But nothing positive has been done as yet. The problem of subscribing 100 crore to the United Nations for this purpose was also not done by Govt. of India.

National Hindi Academy (Rashtriya Hindi Academy) has decided in national honour and interest to collect this amount of Rs. 100 crores on its own and hand over to UNO through Govt. for recognition of Hindi in the United Nations.

To attain this national objective Academy has instituted a special fund - Vishwa Bhasha Hindi Nidhi in which donors may send their donation’s liberally and generously through chques, D/D s fg. Vishwa Bhasha Hindi Nidhi  a  minimum amount to maximum amount to complete  Rs. 100 crores to give it to the United Nations through the Govt, safeguading National interest and honour by recognition of official Language Hindi in UNO and make Hindi as Vishwa Bhasha fulfilling the aspirations of 125 crore people in India and abroad. 

Your generous donation will be a great help and co-operation in the National Interest and honour to our geat country.

The donations may please be sent to -

The secretary
Rastriya Hindi Academy
A/c. Vishwa Bhasha Hindi Nidhi,
3, Gibson Lane,
Kolkata - 700 069
Telefax +91 -033-22135102
Email : editor@rashtrabhasha.com

With Greetings

Sincerely your’s

for Rashtriya Hindi Academy

Wednesday, 15 January 2014

राष्ट्रसंघ द्वारा हिन्दी की मान्यता हेतु सहयोग की अपेक्षाएं- एक अपील!

भारत तथा विदेशों में कार्यरत हिन्दी सेवी संस्थाएं/सरकारी उपक्रमों/संस्थानों के उच्च हिन्दी अधिकारी, प्रशासक, हिन्दी सेवी, हिन्दी प्रचारक,  मीडिया, हिन्दी साहित्य प्रेमी-पाठकगण,        उदार व्यवसायीवृंद, वरिष्ठ नागरिक एवं साधारण आमजनता

मान्यवर,

        मकर संक्रांति के अवसर पर
हार्दिक शुभकामनाएं एवं अभिनन्दन

आप सभी का ध्यान वैश्विक मंच पर हिन्दी की दशा-दिशा की ओर आकर्षित कराना चाहता हूं।
आजादी के 65 साल के बाद भी अभी तक हमारी राजभाषा को राष्ट्रभाषा के रूप में राष्ट्रसंघ (यूएनओ) में मान्यता नहीं मिली। मान्यता प्रदान करने के विषय में विविध मंचों, राजभाषा सम्मेलनों, विश्व हिन्दी सम्मेलनों, ससद के कई सत्रों द्वारा बहुत सारे प्रस्तावों पर चर्चा हुई, राजनेताओं ने आश्वासन भी दिए। परन्तु अभी तक भारत सरकार द्वारा कारगर कार्रवाई नहीं हो पाई। 

राष्ट्रसंघ को जब तक सौ करोड़ रुपए हिन्दी की मान्यता के लिए अनुदान  नहीं मिल जाते, तब तक मान्यता नहीं मिल सकती।  

राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी आप सभी के सहयोग से इस काम को सफल बनाने के लिए पहल करना चाहती है। राष्ट्रीय महत्व के इस कार्य को सफल बनाने के लिए राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी ने विश्व हिन्दी भाषा निधि की स्थापना की है जिसमें आप अपने स्तर से अधिक से अधिक आर्थिक सहायता प्रदान करने की कृपा करें। जिससे 2014 में हम विश्व हिन्दी निधि के खाते में जमा हुई राशि को सरकार के माध्यम से राष्ट्रसंघ को दे सकें और हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में राष्ट्रसंघ की भाषा स्वीकृत करा सकें। यह राष्ट्र हित में आपका प्रशंसनीय योगदान होगा।

आशा है, राष्ट्रीय अस्मिता, प्रतिष्ठा, भाषा- गौरव और राष्ट्रीयता हेतु आपका सहयोग प्राप्त होगा।

इस राष्ट्रीय कार्य हेतु कृपया अपना अनुदान सहायता राशि विश्वभाषा हिन्दी निधि के नाम राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी, केन्द्रीय प्रशासनिक कार्यालय को सीधे भेजें। जिसका पता है -

सचिव,
राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी
3 जिब्सन लेन, 
कोलकाता - 700 069, 
टेलीफैक्सः 91-33-22135102, 
 इमेल - editor@rashtrabhasha.com

आपकी सहायता राशि प्राप्त होते ही पक्की रसीद सधन्यवाद आभार सहित भेज दी जाएगी और कृत कार्रवाई की सूचना आदि से अवगत कराया जाएगा। कार्य में सफलता मिलते ही विश्वभाषा निधि खाते की आडिट रिपोर्ट भी आपकी सेवा में भेज दी जाएगी।

-निदेशक
कृते राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी

(स्वदेश भारती)
 अध्यक्ष















Tuesday, 14 January 2014

जीने की विवशता

आदमी अपने भीतर की
प्रेमाग्नि-ज्वाला में जलता है निरन्तर
फिर भी आकांक्षा भरी चाहत का सपना
सदा उनके दिल में पलता है
वह नहीं जानता कि
प्रेम-प्रवंचना के रेतीले बियाबांन में
अकेले चलना दुष्कर और असाध्य होता है
जब अन्धड़-तूफान के बीच
हमारा जिस्म आधा या पूरा
भयंकर रेतीले तूफान या बर्फवारी में
धंस जाता है अथवा
आत्म-झलना के चक्रव्यूह में
बुरी तरह फंस जाता है
उस वक्त हम असहाय, अशक्त हो जाते हैं।
यदि यह मालूम हो जाए कि
प्रेम का प्रभाव या तो अमृत बनकर
अमरता के गन्तव्य तक पहुंचाता है अथवा
विषपायी बनकर हृदय और मष्तिष्क को पंगु बनाता है
प्रेम भरा जीवन या तो आत्म समर्पण, श्रद्धा,
आस्था, विश्वास के चार स्तम्भों पर
टिका होता
 उसी में सफलता है
लोभ, अविश्वास की
वैसाखियों परचलना जीने की विफलता है।
                               
                                         बैंगलोर,
                                                       30 मई, 2013




प्रेम - संबंध

प्रेमाश्रयी संबंध टिकता नहीं
अखाद्य, अशोभनीय, अनचाहा फल
हृदय की बहुरंगी हाट में बिकता नहीं
भले ही उसे सघन, सुन्दर, सुशोभित
रससिक्त फलदायी वृक्ष से चुनकर तोड़ें
अथवा किसी मंडी से खरीदकर
हाट में विक्रय के लिए
दूसरे सामानों के साथ जोड़ें
सारा हिसाब प्रेम सिक्ता सा
मुट्ठियों से झर-झर कर निकल जाता
और मुट्ठियां रह जाती खाली
वह अप्रेम ही तो है।
मैंने हमेशा ही जीवन पर्यन्त
प्रेम - सागर की लहरों की तरह देखा है
जो अहर्निशि मचलती,
तटों को जलप्लावित करती,
उमड़ती घुमड़ती फेनोच्छसित,
उंचे नीचे गिरती उठती लहरों के बीच
अपनी विराटता को बांधे सरल शांत तटस्थ होता है
प्रेम हृदयों के निष्कलुष
निश्छल, निरारम्भ क्षणों का
अटूट बंधन है, हृदय का वंदन है
और सिर्फ निर्थक वादों से
लोभ लाभी प्रलोभनों का रिश्ता नहीं होता।

                                                        बैंगलोर,
                                                       31 मई, 2013




बीत जाते दिन

कैसे-कैसे बीत जाते दिन
उनका कोई हिसाब भला कौन रखता है
दुःख या सुख में जीना अपने उद्यम,
कर्म फल को तटस्थ भाव से जीना ही
हमारी समर्थता अथवा असमर्था है
अनर्गल कर्म के मिथ्या व्यामोह में पड़ना निरा अंधता है
इस पृथ्वी पर सब कुछ तो हैं
फिर भी लोभ लाभ को ही चुनते हैं
दिन रात बड़े धनपति, यशस्वी, सत्ता सेवी
अनन्य सुख-भोगी का सपना देखते हैं
एक गोलाई में घूमती फिरती है-
आकांक्षा, समय के पतझर में
पीली पत्तियां बन जाती हैं
तब दुखों का पतझर हमारे सजे सजाए
नीड़ को असमय उजाड़ देता है
हमारे बाहर भीतर किंकर्तवबोध और
अवसाद का कुहासा छा जाता है
ऐसे में हृदय, मस्तिष्क और हमारी मनीषा
हाथ मलते हुए पछताती है
 अतीत की दिन चर्या छिन-भिन्न हो जाती है
यही श्रुतियां भी कहती हैं कि
हमें अपने बाहर, भीतर और चारों ओर
निष्ठा एवं साम्य भाव से अन्वेषण करना
कर्म की पहली सीढ़ी है।
अन्यथा सारा कुछ किस गए क्रम में
असफलता का घुन लग जाताहै
कर्म की हेरा-फेरी में
यों तो बेहिसाब दिन बीत जाता है।


कोलकाता
11 जून, 2013


Best Wishes to my Poetry and Literature Lovers, readers and friends on the Auspicious occasion of Makar Sankranti & Pongal.

मकर संक्रांति एवं पोंगल के शुभ अवसर पर मेरे कविता एवं साहित्य-प्रेमी पाठकों, मित्रों को हार्दिक शुभकामनाएं।
                          - स्वदेश भारती


Wish you Pushp Very Happy and prosperous Birth Day. May God bless you for longer life.
प्रिय पुष्पी जन्म दिन पर हार्दिक शुभकामनाएं। ईश्वर तुम्हें लम्बी उम्र दें।        
                                                                                                           -स्वदेश भारती

Thursday, 9 January 2014

Swadesh Bharati: मेले में सपने

Swadesh Bharati: मेले में सपने: मैं सपने बेचता हूं लाभ-लोभार्थियों के मेले में सपने बेचता हूं। सपने कई तरह के, किसिम किसिम के हैं उन सपनों को मैने आत्म-व्यथा के विवि...

मेले में सपने

मैं सपने बेचता हूं
लाभ-लोभार्थियों के मेले में
सपने बेचता हूं।
सपने कई तरह के,
किसिम किसिम के हैं
उन सपनों को मैने आत्म-व्यथा के
विविध रंगों से सजाया है
उन्हें विक्रयार्थ बनाया है
कठिन दिनचर्या के झमेले में
ऊब और संत्रस्त मानसिकता के रेले में
वही सब अतीत की भट्टी में तपाकर
सार्थक रूप में ढालकर विविध रंगी सपने
अपने तई अच्छे से देख भाल कर
लाया हूं अस्मिता के कंधों पर संभालकर
अराजक भीड़ के बीच अस्तित्व - मेले में
कौन खरीद पाएगा भला
मेरे सपने
पाला है जिन्हें अंतस-राग से झंकृत
मनीषा के पालने पर
अनुराग-तान पर प्रतिध्वनित स्वर
आह्लादित मन-प्राण के सितार पर
जीवन रंगभूमि के तबेले में
सपने बेचता हूं
लोभ लाभार्थियों के मेले में

                    कोलकाता
                           4 दिसम्बर, 2013




चेतना का विपर्यय काल
जब जब होंठो पर निश्वास-कंपन अनुभव किया
हृदय का आइसवर्ग पिघलता रहा
शरीर बना रहा बर्फ का समुद्र
और तब तब वाणी हुई अवरूद्ध
अकथ मौन घिर आया
किन्तु उन क्षणों को
बेहतर ढंग से जिया

जब जब नई दिशाओं की ओर उन्मुख हुआ
अदृश्य छायाओं ने अनुसरण किया
जब भी एक दायरे से निकल कर
दूसरे में प्रवेश किया
प्रवंचना का प्राणघातक विष पिया
किन्तु तब भी अपने को जिया

जब जब आशाओं का आकाश खंडित हुआ
गहरे कुहासे के बीच
प्रभात की कालजयी किरण ने
नया रास्ता दिखाया
अस्मिता की कसौटी पर आत्मीयता के
उन क्षणों को जिया
और उस स्थिति में
चेतना का विपर्यय होने नहीं दिया
अपने को भरपूर जिया।

                            कोलकाता
                           5 दिसम्बर, 2013





 जीवन-निसार युद्ध
हम हमेशा ही युद्धरत रहते हैं
सबेरे से शाम तक
और रात के अंधकार के बीच
निश्रृत विनार्थ, ऊब घुटन भरी दिन चर्चा
सम्बन्धों की अराजकता,
उद्दंड माहौल की प्रवंचना
उदास, निरुद्देश्य भटकती अभिव्यंजना
कितने सारे मोर्चे पर
करते रहते अंतर-युद्ध
असमय के विरुद्ध
चिन्तन-अचिन्तन की वेगवती नदी का
प्रवाह बन अजानी दिशाओं में बहते
ऐसे में अस्तित्व के रक्षार्थ युद्ध विध रहते

पल-पल समय अपनी हथेलियों में
कर्म-सिक्ता भरे अनासिक्त
परिवर्ति मौसम के बीच इंगित करता
कि भुट्ठियां किसी क्षण
किसी भी स्थिति में होती हैं रिक्त
हम दूसरों के लिए
युद्ध का मुखौष धारण कर
अपने लिए ही युद्ध करते
भले ही इसके लिए समय की मार सहते
हमेशा ही पल छिन
कभी आत्मभाव से
तो कभी खिन्न मन से
विभिन्न संदर्भों में युद्ध-रत रहते हैं।

                             कोलकाता
                          18 दिसम्बर, 2013





साहित्य-सृजन
अनात्म की प्रतिष्ठा-नहीं करता साहित्य-सृजन
साहित्य नहीं रचता
प्रवंचना और खडयंत्र-सेतु
साहित्य नहीं होता आत्म-प्रभंजन
वह तो सबके हित की बात करता
साहित्य की उत्स धारा में प्रवाहित होते
कटुता, अलगाव, आत्म-विमर्ष, अप्रेम
चिन्तन-कर्म की अंधकारा में
सिर्फ आस्था ही साहित्य को प्रतिष्ठापित करता।

                                                                        कोलकाता
                                                                       19 दिसम्बर, 2013





असहज नहीं होता सत्य
असहज नहीं होता सत्य
ना ही विनष्ट होता
कर्म हीनता के कलुष
अनात्म बोधी-जाल में
इच्छाएं फंसकर
असमर्थता प्रकट करती
अपने विविध चाहत के रूप
अनायास प्रदर्शित करती

अतीत के खंडहरों के बीच
सत्य की कसौटी पर ही
खरा उतरता वर्तमान
क्योंकि प्रत्येक स्थिति में
सत्य सदा ही होता अर्थवान
सत्य की सत्ता समय-सापेक्ष्य होती
जिसके भीतर ही
मनुष्य गढ़ता रहता असत्य
ऐसे में
असहज नहीं होता सत्य.....



                                कोलकाता
                                20 दिसम्बर, 2013







Wednesday, 8 January 2014

राजधर्म जब जब खंडित होता

राजधर्म जब जब खंडित होता है
जन-जन में क्षोभ फैलता है
इससे राजधर्म अपनी इयत्ता की मर्यादा खोता है
जब से सृष्टि बनी है, कभी पैदल, कभी घोड़ों पर सवार राजसत्ता के शिकारी, छल, दल, बल से
तरह तरह के शस्त्रों से सुसज्जित चक्रव्यूह रचते, रक्तपात लूटपात करते
साम, दाम, दंड, भेद आमजन को अपनी प्रजा, अपना दास बनाते
और आम जन युगों से दासता की पीड़ा झेलता रहा
अभावग्रस्ततता की खाली झोली लिए राजपथ पर
खाली पेट का ढोल बजाता, मांगों का नारा लगाता रहा
सत्ता की लाठियां, अश्रु गैस, जल बौछार, गोलियां, खाता रहा
जेलों की यातनाएं सहता  रहा, सदियों से
सत्ता और आमजन का यही अटूट नाता रहा।
सत्ता सदैव आमजन को अलग-विलग करती
खडयंत्र के पुल बनाती
आर्थिक प्रगति, विकास के नाम पर छलती
अपनी कुर्सी मजबूती से पकड़े रहती
बिक्रांत-अक्रांत जन-आवाजों के बियावान में
सन्नाटे सर्जित करती, अपनी झोली भरती
राजधर्म का यही दुष्चक्र इतिहास बनाता,
अस्तित्व की लड़ाई लड़ती धनी, निर्धन के बीच खाई खंड़ो करती
अपने और अपनों के लिए
सत्ता की चाकबन्द सुरक्षा के लिए
नई-नई नीतियां गढ़ती
राजधर्म के नाम पर जन-भावनाओं को पददलित करती
समय के अनुसार
अपने स्वर बदलती
जब राजधर्म का क्रिएता सुख की नींद सोता है
तब आमजन दुखों की शर-शैया पर अंतरघात से
कराहता अपने शेष दिन गिनता और बेजार रोता है।


बैंगलोर
19 मई, 2013




मन मराल
सोच की नदी बहती है अबाध गतिक
शिखर-दर-शिखर, चट्टानों, घाटियों
शिलाओं, पठारों, वनों-उप वनों
सघन जंगलों, मरुथलों के बीच
अपना रास्ता बनाती
प्रवंचनाओं के तट बंध ढहाती
अिभव्यक्ति के दुकूलों को भिंगोती
अटूट दृढ़ विश्वास से भर
अभीष्ट की ओर बढ़ती
जैसे निश्चय से शपथित पथिक
मैं आत्मस्थ उसके प्रवाह
ऊपर आकाश की निभृत नीलिमा
नीचे धरती की शस्य इलम हरीतिमा
समय के द्वार पर बैठा
देख रहा चेतना का जल प्रवाल
सुखानुभूति से आनंदित
जैसे कमल-कोरों में
मधुरंजित मन-भरा ली...

                                                            बैंगलोर
                                                           23  मई, 2013






जीवन का प्रारब्ध
प्रारब्ध की ऊंचाईयों से गिरता झरझर
फेनोच्छ्वसित चाहत का गिरप्रपात रिर्झर
जो अपने आसपास के वृक्षों, लताओं,
नीली घाटियों को भिगोंता, रास्ता बनाता,
उच्छलगतिमय नदी-द्वार के आरपार
सहज बनता प्रवाह फेनोच्छ्वसित सुन्दर
प्रवाहित होता निरंतर
अस्तित्व नदी के ऊपर, अंदर बाहर
दो हृदयों के खम्भों पर निर्मित करता
संबंधों का सेतु
जिसका आधार बनता समभाव
समझौता, सहिष्णुता, आत्मीयता-स्नेह
और उद्देश्य होता जोड़ना, मोड़ना
जब प्रवंचना का विभाव
बन जाता आपद धर्म
चाहत का प्रपात भेदता, तोड़ता खंड-खंड करता
विश्वास की शिला-प्राण-मर्म
और फिर वही बनता विषाद प्राणी आबद्ध
जीवन का प्रार्बध....

                                                               बैंगलोर
                                                              25  मई, 2013







दर्द का अहसास
दर्द होता है-
जब विश्वास के सेतु ढहते हैं
प्रवंचना के कुठाराघात से
दर्द होता है
जब सम्बन्धों के विषाक्त-अदृश्य, अरूप
अशोभनीय, आत्मघाती-विनाशी पर्दा
उठता है, प्रवंचना की छद्म-अहंकार भरी
लोभ-लोभी-निजता की अंधेरी रात से
विषाद भरे प्रभात से
दर्द होता है -
जब आशा, विश्वास, स्नेह और अगाध
असीम प्यार से निर्मित
आत्मीयता का सेतु ढहताहै
जब रिश्तों के अप्रासंगिक अनुपाद के हृदय रिसता है
दर्द घिरता है-
जब वेदना का मौन अपारदर्शी कुहासा बन
मन के आरपार छा जाता है
जब कोई अपना अटूट प्रेम बंधन की
डोर तोड़ता है
अपने पथ को गन्तव्य से मोड़ता है
कोई जब अपना आपा खोता है
उसे अकल्पित, आकस्मिक, अस्वाभाविक
असामयिक चोट से आहत
प्यार भरे हृदय में विश्वास का आडम्बर्ग
तिल तिल कर पिघलता है
दर्द अंतर में पलता है।


                                                                      बैंगलोर
                                                                      27  मई, 2013

2014 की राजनीति

2014 भारतीय राजनीति के उथल-पुथल का समय है। 'आप' के उदय के बाद अन्य पार्टियां अंतर-चिन्तन-मंथन विवेचना के दौर से गुजर रही है, परन्तु क्या इस देश को भ्रष्टाचार, लोभलाभी, गुन्डागर्दी की राजनीति से छुटकारा मिलेगा? आम आदमी को सामाजिक न्याय, सुरक्षा और आर्थिक विकास के साथ स्वराज स्वातंत्र्य का सुख मिल सकेगा? और सत्ता के संघर्ष में महारथियों के अर्थहीन जन-लुभावन नारों से छुटकारा मिलेगा?
इन प्रश्नों के उत्तर इस देश की 120 करोड़ जनता स्वयं खोजे और सुनिश्चित मत बनाए। देश में साफ सुथरा विकासशील शासन के लिए जोरदार प्रयास करे।

समय के साथ चलना मानव अस्तित्वधर्म है। उससे चूक होना दुर्भाग्य भरा अंधकार है।

Wednesday, 1 January 2014

नव वर्ष मंगलमय हो

मेरे आत्मीय पाठकों, सभी मित्रों, अभिभावकों, 
राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी के सदस्यों एवं  परिवार जनों को 

नव वर्ष - 2014 की 

हार्दिक शुभकामनाएं

आप स्वस्थ, सानन्द, सुखी, सुरक्षित रहें। 
आनन्द तरंगित नदी प्रवाह बने
उत्कर्ष की ऊंचाईयों से
अनन्त कीर्ति और सुयश की ओर आत्मविभोर बहें


                        उत्तरायण (कोलकाता)                                                  - स्वदेश भारती
                       1 जनवरी 2014