Friday, 8 July 2011

ये पंछी कहां जाते हैं

ये पंछी कहां जाते हैं
इतना सबेरे
किस पहाड़ की ओर
किस क्षितिज की ओर
क्या मिलेगा वहां?
पर्वतीय खामोशी में डूबी बर्फ की ऊंचाई।
सौन्दर्योष्मा-रस से पागल प्रभात के बादल!
एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी की तिकोनी ऊंचाई पर
बांधे अपना सर्वांग
प्रेमालिंगन-पाश में
सुनहरी मुस्कान में सराबोर
पर्वतों के आर पार
ये पंछी कहां जाते हैं
इतना सबेरे पहाड़ की ओर
पंख पर लादे रजतरश्मियां
कलरव गुंजित करते दिखाएं
तोड़ते घाटी वन प्रांतर की जड़ता
सर्जित करते क्षिति में
पंक्तिबद्ध छवियां
नापते क्षितिज के ओर-छोर
ये पंछी कहां जाते हैं
इतना सबेरे पहाड़ की ओर
हम भी तो इसी तरह उड़कर आए थे
अपना घर गांव कुनबा छोड़
अपनी किताबें, अपनी मेज,
अपना शयन कक्ष, बैठक खाना
अपने आस-पास का बंधन तोड़
तरह तरह से पाई-पाई जोड़
आ गए पहाड़ की गोद में
जंगल, वन-प्रान्तर में
नदी-तट पर, समुद्र के किनारे
शायद खोजने आनन्द-किरण-नव-भोर
आ गए हैं और चलते जाएंगे
अनजाने समय-पर्वत-क्षितिज की ओर।

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