Tuesday, 31 December 2013

विश्रृंखला के बीच

आज तो हर ओर शोर है
हर ओर उत्श्रंखल शोर
नई-नई दावेदारी की आवाजें जुड़ जातीं
तनावग्रस्त चीखती चिल्लाती
दिन में भी ऐसा अंधकार छा जाता
समझ में नहीं आता रात है या भोर
हर आदमी के सपने आहत हैं
उसका पथ रक्तरंजित है
लोभलाभी समय स्वार्थी राजनीति के कंधों पर
अपनी प्रत्यंचा ताने
आम जन का शिकार करने के लिए उद्यत है
राजनीति हर तरह से
आजमाती है अपना जोर...

आखिर यह सिलसिला कब तक चलेगा
असहाय आमजन
कब तक अपना हाथ मलेगा,
अभावग्रस्त चिर-प्रगाढ़ निद्रा में सो जाएगा
इसी अमोघ निंद्रा, असमर्थता, किंकर्तव्यविमूढ़ता के तई
हम सदियों तक पराधीन रहे
ईरानी, अरबी, अफगान, मंगोल, मुगल
घोड़ों के टापों से हमारी अस्मिता रौंदते रहे
हमारी संस्कृति को पद दलित करते रहे
और बन गए शहंशाह
हम रह गए अघोर
आज भी पूरी आजादी के लिए उठ रहा शोर

                                 कोलकाता,
                                 22 अप्रैल, 2013







चलो बांधे नाव को उस पार वन्धु

चलो बांधे नाव को उस पार बन्धु
हृदय-सागर के किनारे
आत्ममन - विश्वास से बनी सुन्दर, सौम्य, सुखकर
भाव-श्रद्धा, संप्रीति रचित तटनी को चलाएं
समय की उत्ताल लहरों में मन की सधी
पतवार नियंत्रित कर
नहीं माने हार वन्धु
हृदय की उत्ताल लहरों से प्रकपित
जब भी नाव डगमग डोलती
खोलती अनबूझ अंतर व्यथा- कथा
सहती आलोड़न
चलती मौन के मझधार में अतिशय तरंगित
आत्म बल का बोझ लादे
और ला दे तीव्र अभिलाषा कि
पहुंचे सिन्धु के उस पार
काटे प्रीति की मझधार वन्धु
चलो बांधे नाव को उस पार वन्धु


                                 कोलकाता,
                                 24 अप्रैल, 2013





 चेतना की धार

चेतना की धार प्रवाहित होती पहले सीधे
फिर दाएं बाएं घूमती हुई
मन की रेत को जहां तहां बहा ले जाती
फिर कई अंतर्रधाराएं जन्म लेती
मस्तिष्क ग्लेशियर से गर्वोन्नत कल कल
छल छल गिरती हैं छन्दबद्ध अथवा छन्द विच्यूत
धार कई कई रूपों में प्रवाहित होती
वृहत्तर प्राण-शोक सर्जित करती
जल से तृप्त करती बिनारीते
उकेरती नव-बीज, स्फुरित करती
धन्य-धान्य भरा भू-गर्भा
हरित भरित कर प्राण में नवप्राण जोड़ती नवनीत...
मानव चेतना की घास कभी सूखती नहीं, न मिटती
समय परिवर्तन के साथ साथ
नव चेतना की धार अपनी दिशा बदलती
जीवन को हरिताम्बरा करती
नए-नए सुख-उष्मा से भरती
चेतना की धार प्रवाहित होती आत्मगत सीधे
मन संप्रीति का सेतु तोड़
इसी तरह कई कई युग बीते।


                                   कोलकाता,
                                   26 अप्रैल, 2013






शब्द और छन्द

मैं शब्द बनू और तुम छन्द
मैं बनू मधुप रस पराग रंजित
पंखुड़ियों में बन्द
तुम बनो रसराज बसन्त की कली
खिली खिली, मधुमादित माधुर्य, मोद भरी निरानंद
किन्तु समय होता बहुत बड़ा छली
जो पतझर बनकर अपने हाथों में
तूफान, चक्रवात लेकर आता
हमारे सपने चूर-चूर कर जाता
और मैं शब्द बनते बनते छन्द बन जाता हूं।

                                          कोलकाता,
                                        27 अप्रैल, 2013






वर्ष का अंतिम दिवस

वर्ष का अंतिम दिवस
कुछ इस तरह पैगाम लाया
दर्दमय था दौर सुख का
प्राण-दंशित और घातक
आत्म-पीड़क- दंड दुख का
वही सब प्रारब्ध में था
उसी में यह वर्ष बीता

प्राण-अंर्तद्वन्द में
चेतना के छन्द में
कामना के भग्न तारों पर
ध्वनित अनुराग
अन्तर-राग में
निस्सार वन यह वर्ष बीता

जो नियति में नियत था
बस वही पाया, उसे ही मन में संजोया
जो नहीं था, उसे खोया
वर्ष का अन्तिम दिवस
कुछ इस तरह पैगाम लाया
सार्थक है वही जो जितना जिया
साल का अंतिम दिवस
बस, अलविदा कह चल दिया

                                        कोलकाता,
                                       31 दिसम्बर, 2013

कविता - वर्ष 2013

वर्ष 2013 में प्रतिदिन लिखी कविताओं में से कुछ कविताएं अपने प्रिय पाठकों, मित्रों के लिए फेस बुक में उद्धृत हैं जिनमें वर्ष की अन्तिम कविता भी शामिल है
कविताएं हार्दिक शुभकानाओं सहित नव वर्ष के उपहार स्वरूप  प्रस्तुत है।
                                                                                                   - स्वदेश भारती


सोनाली फसल का अर्थ
सारा गांव फसल पकते ही
आनन्दोत्सव में मग्न हो जाता है
उसे पता होता है कि कितना धान (चावल) या गेहूं,
तिलहन, कितनी दाल मिल सकती है
खाने के लिए अन्न की कमी नहीं होगी
बागों में अमराई बौराती
कई कई पेड़ों में नन्हें नन्हें टिकोरे लगते
सूर्योदय की सतरंगी किरणों में
पके गेहूं की बालियां स्वर्णिम
चमकदार हो जाती
पूर्व क्षितिज की लोहित लावण्यभरी लालिमा
और दूर तक फैली सोनाली फसल
मन को अनजाने सुख-सौन्दर्य से भर जाती है
मैं गेहूं के खेत के मेंड पर उगी
हरी घास पर बैठा किसान के परिश्रम से पकी फसल
और प्रकृति का नैसर्गिक, सौन्दर्य देखकर
अनुमान लगा रहा हूं
सारे देश के परिश्रम से ही जन जन की भूख
और किसानों की अभावग्रस्तता, दुर्भिक्षता के विरुद्ध
सत्ता की बैसाखियों को परे हटाकर
स्वच्छन्द जिन्दगी जीने को मिलती है
टूटी फूटी झोपड़ी में कंडी के उठते धुएं के बीच
तवे पर रोटी पकती है
भूखे, नंगे बच्चों के कुम्हलाए मुख पर
खुशी की कली खिलती है।

                                                    झाउ का पुरवा (प्रतापगढ़)
                                                    2 अप्रैल, 2013







मनुष्य की चाहत

मनुष्य की चाहत अनन्त है
उसी चाहत की डोर पकड़
वह चढ़ना चाहता है सातवें आसमान पर
बाहों में आकांक्षाएं भर
और यही चाहत बनती
लोभ, मोह, क्षोभ, जय-विजय, प्रेम-अप्रेम
लाभ-हानि, सुख-दुख की जड़....

यही चाहत ही सबसे अधिक बलवंत है
सत्ता की कुर्सी चीखकर कहती है
अधिक चाहत, सर्वोपरि आकांक्षा, हंसी, शोक
मन में मत पालो
सुखी हो इहलोक, तब परलोक
पहले फैलाओ जन-जन में आलोक
सभी हों सुखी, स्वस्थ, धन-धान्य भरा
हरीतिमा, सुषमा, फूलों, फलों से भरी हो
हमारी शाश्वत माता वसुन्धरा
नियंत्रित करो चाहत समष्टि के लिए
मजबूत करो अपनी जड़
 कदम दर कदम आगे बढ़

                                                     झाउ का पुरवा (प्रतापगढ़)
                                                    3 अप्रैल, 2013





सम्बन्धों की प्रवंचना

एक छद्म आवरण ओढ़े हैं
प्रत्येक आदमी और
कितनी तरह से संप्रीति की
गाढे बांधकर
सम्बन्धों को जोड़े हैं
फिर भी कहता
यह प्रवंचना थोड़े हैं।

                                                      झाउ का पुरवा (प्रतापगढ़)
                                                     4 अप्रैल, 2013








गांव-गिरांव फटेहाल

सबेरे की पीली धूप चैत्र मास की
मृदुल, मृदुल उष्मा ठंडी हवा के थिरकत्ते पांव
पकी गेहूं की सोनाली फसल
नृत्य करते एक हृदय ग्राही दृश्य उपस्थित करते
पल्लि पथ पर गायों, भैंसों का रंभाना
चारागाह की ओर प्रसन्नचित्त जाना
हृदय को पृथ्वी धन और पशुधन के
विविध रूपों से भरता है
चरवाहा गाता है चौताल बिरहा
कान पर हाथ रखकर
जैसे उससे बड़ा-गवैया संसार में कोई नहीं
फूटते हैं लाल टेसू कहीं कहीं
अर्पित करता अपना रस भरा फूल
मन्दिर में देवी भवानी को अर्पित किए जल को
पीता गांव का भूखा झबरैला-टामी
जो रात भर घरों की रखवाली करता
और किसी कूड़े की ढेर में दुबक कर सो जाता
गांव में बसते गरीब अमीर नामी गिरामी
किन्तु सभी एक दूसरे को टेढी आंखों से देखते
यह विसंगति मन को आहत करती
और यह संकेत देती कि
आजादी के पैंसठ साल बाद भी नहीं हुआ विकास
और गांव का सिवान करता रहा अट्ठास।

                                                       झाउ का पुरवा (प्रतापगढ़)
                                                       9 अप्रैल, 2013




ईश्वर के अधीन

न जाने क्यों ईश्वर ने
पृथ्वी बनाई विशाल और सुन्दर
फिर उसे दिया असीमित
मनोरम सौंदर्य शुष्मा हरीतिमा
तरह-तरह के पेड़, पौधों से रचे सघन जंगल
बर्फाच्छादित पर्वत-शिखर, बादल
नदिया, सागर
बनाए किसिम-किसिम के फूल, पौधे,
धनधान्य भरे खेत, बाग, गांव, नगर
बनाये उसने स्त्री, पुरुष,
विविध दुग्धधारी पशु,
रंग विरंगे पक्षी सुन्दर
दिए मानव को ज्ञान प्रखर
विज्ञान, कला से भरा जीवन
आनन्द, संप्रीति-स्फुरण
और दिए उपादान सुख, शान्ति का वरण
किन्तु ईश्वर ने क्यों दिए
मानव को लोभ, लिप्सा, आकांक्षा, अहंकार
काम, क्रोध, भोग-संचरण
क्यों दिए ईश्वर ने मनुष्य को
वासना, हिंसा, प्रतिहिंसा, पिपासा
सत्ता दोहन, दासता-जन्य परिभाषा
क्यों दिए तरह-तरह के विनाशक अस्त्र
क्यों दिए अमीरी, गरीबी, आशा दुराशा
क्यों दिए देव, मानव, दानव में
विनाश की प्रवृत्ति, आत्मक्षरण
कि एक समय हो जाएगा सर्वस्व इति
क्यों बनाए ऐसी दुनिया हे विश्वम्भर
इतनी सुन्दर प्रकृति...।

                                                        झाउ का पुरवा (प्रतापगढ़)
                                                       10 अप्रैल, 2013






गन्तव्य पथ के बीच

गन्तव्य पथ पर चलता रहा
आपद-तूफान, वर्षा, झंझावात के बीच
अपने विश्वास
और आस्था को
मन-मस्तिष्क से भींच
चलता रहा
वह जो सपना था मन के भीतर
नए नए रूपों में पलता रहा
सभी के हमारे अन्तस में सम्बन्धों की राख में
एक द्युतिमान चिन्गारी छिपी होती है
जो समय असमय जलती है धू धूकर
इस तरह हठात जलती है तो कुछ न कुछ
विध्वंस होता ही है
कभी आग सार्थक होती है
तो कभी निरर्थक होकर
जलाती है मन-मस्तिष्क निःस्वर
मैं भी उस आग में जलता रहा
और गन्तव्य-पथ पर चलता रहा
कभी-कभी ऐसा भी होता आया
कि अजाने सुख ने रोमांच दिया
सुखा डाला सोच की हरियाली को दुःख ने
और उसे ही प्रारब्ध का छोटा अंश मान लिया
नए-नए क्षितिजों में चलने की चाह से
मन का आइस वर्ग पिघलता रहा
मैं अपने गन्तव्य-पथ पर चलता रहा।

                                                       उत्तरायण (कोलकाता)
                                                       20 अप्रैल, 2013

Monday, 30 December 2013

आदमी-औरत

आदमी ने कहा - आओ चलें आगे और आगे
औरत ने कहा- हां चलो पर थोड़ा सुस्ता लें
नदी किनारे, पर्वत की छांव में
सागर-तट पर, वसन्त-कानन में।

आदमी ने कहा - आओ चलें आगे और आगे
औरत ने कहा - पहले जीवन के उन मधुर क्षणों को,
अपनी आकांक्षाओं को मन से बांध लें
और यह देख लें कि कलियां भी
फूलती हैं किसी न किसी प्राप्य की इच्छा लिए
जो ऐसा नहीं करतीं, वही असमय कुम्हला कर
वृन्त-विहीन हो जाती हैं
जो समय की ताल पर
नाचती हैं
यही समझ लो कि उनके भी
अभिराम स्वप्न जागते हैं
आदमी ने कहा- आओ चलें आगे और आगे
औरत ने कहा- आह मर्द क्यों नहीं समझ पाते औरत के
अन्तस में धधकते अंगारे, अन्तर-निहित रहस्य, कामनाएं
और उनके दायरे।

कलकत्ता,
8 अप्रैल, 1992






Man and Woman (A Dialogue)

Man- Let's go on and on
Woman-Yes, but let it be so after resting
by the river side for a while
in the shadow of the mountain, on the sea-beach,
In this forest during the Spring
Man-come on let's go on and on
Woman-First, let us recollect life's sweet moments
And our cherished desires floating in the mind
And realize that blossom turn into flowers and fruits
with some purposes and times
which fail in this process
fade, wither, shriven or lose their luster
Before the time of existence
Those which dance on the tune of rhythmic tune
They weave their dreams
Man-come let's go on and on
Woman-oh! men don't understand the burning
mystic desire's tussles in
The various inner beings of women,
their mysteries and their spheres of influence.

Calcutta
8th April, 1982




समय-संदर्भ

चुपचाप बीत जाती रात
और उजाले से स्नान किया हुआ प्रभात
अपनी शुभ्र कांति-देह पर
भीड़ भरी दिन-चर्चाओं का आवरण ओढ़े
चलता है
जीवन-प्रक्रिया भीड़ के साथ
चुपचाप चुपचाप बीत जाती रात
और इसी तरह हमारे सपने भी
अपनी गठरी से स्मृतियों के एक-एक चीथड़े निकालते हैं
भीड़ भरी आशाओं के फुटपाथ पर
दुकान सजाते हैं
और अपने मोल-भाव की कुशलता से
कुछ न कुछ लाभ उठाते हैं
घाटा सहते हैं
अंधकार घिरने के साथ-साथ
मालपत्र सहेज कर
इच्छाओं की सन्दूक में रखते हैं
सहते हल्ला-गाड़ी-समय का घात-प्रतिघात
चुपचाप चुपचाप बीत जाती रात
उफनता रहता समुद्र
लहरों की हथेलियों पर लिखता जाता
अनगिन शब्द-गीत छन्द
मौसम बदलते तेजी के साथ अपने रास्ते
नदियां बदलती प्रवाह
और बर्फाच्छादित पर्वत पर
अचानक ही लग जाती आग
अभिलाषा के अलिंगन हो जाते
कमल कोरकों में बन्द
और ऐसे ही बीत जाती मनुष्य की
संघर्षरत अंधेरी रात
चुपचाप चुपचाप

कलकत्ता,
22 मई,1992






In the Context of Time...

The night passes quietly, silently
And the dawn washed in the sunlight
Covered with crowded news moves on with
it's brilliant figure within
The crowded process of existence forward...
The night passes silently.
Likewise, our dreams bring out the truth
rags of reminiscences one by one
lay out their makeshift shops on
crowded foot-paths
and despite with their lust of regaining
make some profit, losses, more or less
and as darkness sets in they endure
the police action to clear foot-path
Before the goods are boxed
in desire's go downs
the night passes quietly
The sea surges & swells on writing
count, lyrics verses-stanzas on
The palms of waves;
The seasons change
imperceptible, swiftly on their own
even the rivers change their courses.
the snow-clad mountains are fired suddenly
And the black bees are confined in lotus buds
likewise, dark nights of struggling humans
passes on quietly....

Calcutta
22nd May, 1992.

Sunday, 29 December 2013

सुख और दुख

क्या सुख मिला- उसने कहा- हां
क्या दुःख मिला- उसने कहा-हां
फिर एक मौन छा गया
न प्रश्न ने उत्तर की अपेक्षा की
न उत्तर ने अगले प्रश्न की
दोनों ने हाथ मिला लिए
फिर उन्हें नागफनी के जंगल से गुजरते समय
एक काला नाग मिला
दोनों ठिठक गए
चिन्तन-मन्थन करते रहे
आगे की यात्रा के नये-नये पथ-विधान गढ़ते रहे
एक ने कहा
सुख में कांटे होते हैं
दूजे ने कहा
दुःख में कांटे ही काटे होते हैं
दोनों ने एक स्वर में कहा
सुख और दुख दोनों में कांटे होते हैं
इसलिए पहले कांटेदार जंगल को पार करना है
फिर नदी के उस पार पहुंचना है
तभी डाल पर बैठी मैना बोली
दुःख और सुख के परे भी
एक ऐसी स्थिति होती है
जहां मन निरानंदित होता है
कभी दुख, सुख को
और कभी सुख, दुख को
अपने कंधे पर ढोता है,

न्यू सिक्किम हाउस, नई दिल्ली
21 मार्च, 1992





Pleasure and Pain

Tranquilly Tranquilly and anxiety
Comforts and misery
Happiness, glory and doubt
Could you get any of these

Both respectively got
their replies in Yes and No
There was silence, thereafter
neither questions were asked
nor answers given
Both shook hands
Both were passing through the jungle
of prickly pears, cactus
There they met a black serpent
Both stopped a short,
were wavering to go forward
Musing and thinking
they planned their ways to continue their
journey ahead
One said-There are thorns in happiness
The other said-
There are only thorns in unhappiness.

Then they both uttered in unison
life is full of Joy and Sorrows
So let us cross first the thorny jungle
then have to reach the other side of the river quietly
mynah sitting on a branch meanwhile exclaimed
There is a state of experience beyond
both Pleasure and Pain-s state of mind
when and where none
of these apposite are felt. The min's
equanimity is never unbalanced and forever
one goes through any of them without a waver.

New Sikkim House, New Delhi
21st March, 1992




एक पत्रांश

......... तुम किसी एक फूल का नाम लो
निचोड़ों उसे अपने खून में मिलाकर
गिराओ कहीं भी
मेरा नाम नजर आएगा।

मैं फलों की बात नहीं करता
क्योंकि सारी जिन्दगी
गंवा दी फूलों की परिभाषा करते
उनकी पहचान से आत्मसात होने का
दम भरते
तुम किसी भी फूल का नाम लो।

वैसे तो फूल बहुत हैं बाग में
मैंने और तुमने महसूस किये हैं
उनके बीच अपने ही रंगों के छन्द
और रूप-रसगन्ध

पर सच तो यह है
न तुम और न ही मैं
ठीकठीक समझ सके
समय और जीवन में परिवर्तन-द्वन्द
तुम किसी एक फूल का नाम लो
मेरे अन्तस् का रंग जरूर नजर आएगा...

कलकत्ता
16 जून 1979



The part of a letter

You name a flower
squeeze its essence in your blood
and drop somewhere
you'll find my name written there

I don't talk about fruits
because the whole of my life
I wasted in defining the kinds of flowers
and be one with them.

Name a flower.... there're so many
in the garden, you and I feel their meters
the themes of your own colors, forms, fragrance, tastes
But the truth is that
neither you nor I understand well about flowers
The changes in the opposites of life and times
you name a flower and see there
only the color of my inner being shall appear.

Calcutta
16th June, 1979

Saturday, 28 December 2013

वेदना के क्षितिज में

वेदना के क्षितिज में
जब भी समय का सूर्य खिलता
चेतना का द्वार खुलता
प्रीति-आइसवर्ग बनता
चाह-आतुर मन पिघलता
हिरण्य गर्भा धरा का सौन्दर्य ढलता
अनुपम मनोहर रूप का संसार पलता
अंकुरित होता सदा ही प्यार जिसमें
बांध लेते स्नेह-बंधन हृदय को
फिर उसी से नियति का आधार बनता
उसी से ही प्रेरणा का द्वारा खुलता
हर सुखों का वृक्ष फलता

पास रहकर भी समय से दूर रह जाते
सदा संप्रीत बंधन से अलग है दर्द की पीड़ा
वही जो सालती अंतर प्रवंचित तमस जीवन भर
मौन का घिरता कुहाशा
टूटते संबंध की पतवार थामे
मन-तरी को समय के मजधार में
उत्ताल लहरों से बचाते क्या कभी हम
प्राण-तट तक पहुंच पाते पंथ हारा
डोलती डगमग तरी पतवार टूटी
अन्ततः दुख-मौन का अंधियार घिरता
वेदना के क्षितिज में ही प्यार खिलता....

                                     झाऊ का पुरवा, प्रतापगढ़, (उ.प्र.)
                                                30 मार्च, 2013





संभावना के क्षितिज

संभावना के क्षितिज में
उड़ते आकांक्षा-खग दूर-दूर तक
उनके समानान्तर ही मानव
बढ़ाते आहिस्ता-आहिस्ता अथवा तेजगति से कदम
कर्म के प्रति श्रद्धा, विश्वास, आत्मबोध से
जीवन होता सुखान्तक अथवा दुखान्तक
संभावनाओं के जंगल में भटकता दूर तक

हम सभी छल, मोह, माया,  लोभ, लिप्सा
विविध-कर्म-अकर्म में हो लिप्त
जीवन भर
भोगते प्रारब्ध अपने
कर्म-फल को झेलते

अन्ततः मृत्यु -भय से जब निकलती चीख
मर्मान्तक
उस समय भी चल रहे होते
प्रणय मन दूर तक।

                                     झाऊ का पुरवा, प्रतापगढ़, (उ.प्र.)
                                                1 मई, 2013

Thursday, 26 December 2013

शोक प्रस्ताव

राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी, रूपाम्बरा के निदेशक श्री राजेन्द्र जोशी, सुप्रसिद्ध कवि, साहित्यकार का दिनांक 25.12.2013 को प्रातः 11 बजे हृदयगति रूक जाने से भोपाल में अकस्मात निधन हो गया।

श्री जोशी ने लगभग 15 वर्षों तक राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी के विविध सम्मेलनों, संगोष्ठियों, समारोहों का सुचारू रूप से संचालन किया तथा रूपाम्बरा पत्रिका के नियमित लेखक रहे। श्री जोशी कवि, विद्वान, साहित्य कलाप्रेमी होने के साथ-साथ कुशल प्रशासक भी रहे और बहुत ही हंसमुख, विनोद प्रिय एवं स्नेहशील, मिलनसार व्यक्ति थे।

राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी, रूपाम्बरा उनके निधन पर गहरा शोक एवं दुःख प्रकट करती है। ईश्वर जोशी जी की आत्मा को शांति प्रदान करें तथा उनके शोक संतप्त परिवार के सदस्यों को इस अपूर्णीय क्षति से उबरने का साहस प्रदान करें।

         कोलकाता                                                            डॉ. स्वदेश भारती
         दिनांक - 25.12.13                                               अध्यक्ष
                                                                                    राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी,
                                                                                    रूपाम्बरा एवं
                                                                                    केन्द्रीय कार्यालय कोलकाता के माननीय सदस्यगण

क्या कांग्रेस का दूसरा विकल्प आम आदमी पार्टी?


आम आदमी पार्टी द्वारा दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में शनिवार, 28 दिसम्बर 2013 को दोपहर आयोजित शपथ समारोह में नई सरकार बनेगी। मुख्यमंत्री पद की शपथ श्री अरविन्द केजड़ीवाल लेंगे तथा अन्य पार्टी-विधायकों को मंत्रीपद की शपथ उप राज्यपाल द्वार दिलाई जाएगी।
इस दिन अखिल भारतीय कांग्रेस समिति का स्थापना दिवस भी है।
क्या कांग्रेस का दूसरा चेहरा आम आदमी पार्टी के रूप में देश के सामने उभरकर आएगा?

Friday, 20 December 2013

सादर समर्पित

ब्लॉग, फेसबुक, ट्विटर के साहित्य प्रेमियों, मित्रों, पाठकों, शुभचिन्तकों को यह सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि भारतीय वाङ्मय पीठ, कोलकाता द्वारा मुझे साहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मान (मानद उपाधि) द्वारा दिनांक 19 दिसम्बर 2013 को बंगला अकादमी, जीवनानन्द दास सभाकक्ष, नंदन परिसर, कोलकाता में  सम्मानित किया गया।

सम्मान समारोह में कोलकाता नगर के वरिष्ठ साहित्यकार, विशिष्ट अतिथि बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

साहित्य शिरोमणि सारस्वत सम्मान मैं अपने सभी साहित्य प्रेमियों, ब्लॉग के मित्रों को संप्रीति, सादर समर्पित करता हूं।

-स्वदेश भारती
कोलकाता - 19.12.2013

Tuesday, 17 December 2013

12 दिसम्बर 2013 को मेरे 74वें जन्म दिन के उपलक्ष्य में

मित्रों! प्रशंसकों, साहित्य प्रेमियों, आत्मीय अभिभावकों, संस्थाओं आदि को मेरे जन्म दिवस-बधाई के लिए आभार एवं संप्रीति सहित सौहाद्रर्पूर्ण धन्यवाद!

मैं आपके साथ दिनांक 12 से 17 तक यानी 5 दिनों की प्रतिदिन लिखी कविताओं के साथ अपनी अंतर भावना जनित-चिन्तन को बांटना चाहता हूं और आप के मन्तव्य के लिए निवेदन करना चाहता हूं। आप सभी प्रसन्न रहें, सुखी रहें, स्वस्थ एवं सुरक्षित रहें।
                                                                                                   - स्वदेश भारती



किसिम किसिम के खेल
खतरनाक ढंग से लोग खेल रहे खेल
समय सागर-तीरे सत्ता-रेत में
कोई कोई ताबड़तोड़ कोई धीरे-धीरे
राजनेता, जननेता, धर्माचारी
मिथ्या आडम्बरी, बलशाली, लोभी, दुराचारी
किसिम किसिम की
किसिम किसिम से
खेल रहे सत्ता लोभ -खेल
कर रहे रोटी के वादे
किन्तु नेक नहीं हैं उनके इरादे
मुंशी, बाबू, धोबी, नाई, कर्मकार
खेतिहर, मजदूर, किस्मत के मारे
अराजकता के जंगल में सभी हैं मजबूर
बाढ़, सूखा, विपदा से विपन्न सूने खेत में
जब फसल बेकार होती
किसान, मजदूर की हिम्मत खोती
खोते आशा दिगन्त अधीरे
फुटपाथ, पल्लिपथ से उठता शोर
राजपथ पर चलती अस्मिता खंडित
क्षत-विक्षत, लहू लुहान
पश्चिम से उभरती व्यंग आवाज
वाह रे प्यारा हिन्दुस्तान
सबसे अच्छा हिन्दुस्तान।

                                     - कलकत्ता, 12 दिसम्बर


प्रभात-गीत
सबेरा ठंड से सिकुड़ गया है
पेड़ के पत्तों में बैठी उकड़ूं सघन हरियाली
तनों की गर्मी से सेक रही है ठिठुरन
पंछियों का झुंड क्षितिज में ओझल हो गया है
आकाश बादलों और धुन्ध से ढक गया है
हवा थम गई है
प्रातः कालीन अजान हो चुका है
मन्दिर में घंटियां, शंख बजकर
शान्त हो गए हैं।
चारों ओर शीतस्वनी खामोशी है
फुटपाथ पर अंगीठी में
चाय उबल रही है। सड़कों पर
रद्दी कागज चुनने वाला छोकड़ा
फटी कमीज पैंट में ठंड से सिहर रहा है
अट्टालिकाओं में सर्दी सेंध लगाकर
अनाहूत घुस आई है। आमिजात्य नर्म कम्बल और
रजाइयों में ढकें आंखें मीचे
फुटपाथ पर नाचता नगे बदन पागल
आबुल-ताबुल बड़बड़ाकर
क्रोध और आवेश में। ऊंचे फ्लैट से
सिनेमाई गीत के आने वाले स्वर
होठों पर सस्वर, थिरक रहा है। पत्थर फेंक रहा है।
अखबारी लड़के साइकिलों पर
दुनिया भर की खबरें बांटते हुए
तेज गति इस गली, गली भाग रहे हैं
कल जो कुछ घटनाएं घटी
उससे सुभिज्ञ होने के लिए
नागरिक उत्सुक, घरों में
चाय की चुस्कियों  ले रहे हैं
सूर्य की लालिमा यह रहस्य खोल रही है
कि प्रभात हो चुका है।

                        - कलकत्ता, 13 दिसम्बर (74वां जन्मदिन)



मित्रों के लिए
ब्लॉग, फेसबुक, ट्यूटर पर
मित्र बनने वाले
मेरे लेखन पर टिप्पणी, मन्तव्य, सुझाव
अभिमत देने वालों को धन्यवाद देता हूं
किन्तु मन में अहसास होता है
कि ब्लॉग, फेसबुक, ट्यूटर पर
अपने अनुभव, विचार लिखना
जैसे दो बासों से बंधी रस्सी पर
सम्हल कर चलना है
लोग मुझे या मेरी दशा
अथवा मनीषा के विविध आयामों की कशिश
जीवन के ताने-बाने को नहीं देख पाते
बस जो लिख दिया
उसी पर अपने विचार प्रकट करते जाते
ऐसे में धन्यवाद के शब्द से
व्यवहार-कुशलता की रेखाएं खींचता हूं
मन में यह आश्वस्ति पाता हूं
कि चलो विश्व-जनसंवाद से जुड़ा
एकन्तिक पथ से
आत्मीयता के सहअस्तित्व की ओर मुड़ा
भावना सर्जित चिन्तन को
ब्लॉग पर, अनन्त आकाश में निर्मुक्त
अस्तित्व के डैने खोले उड़ा

                                                              - कलकत्ता, 14 दिसम्बर




 आत्मगत-मौन

आत्मगत मौन का अवसाद बेहद गहरा होता है
और जीवन के एकाकी क्षणों में
जब भी अवसाद की गहराई नापने का यत्न किया
अतीत का विष ही पिया
मुझे लगती है अन्तर-कुठार के प्रति
समय असंबंधित मूक और बहरा होता है

प्रकृति के मौसम-परिवर्तन के बीच
समय को तीव्र गति से भागते हुए देखा है
ऐश्वर्य-शाला में मदमस्त नाचते देखा है
निर्धन, अभावग्रस्त, विषाद-दुःख से जर्जर
मनुष्य की तकदीर लिखते देखा है
किन्तु बदलाव की आंधी जब भी आई
आम-जन को उड़ाकर निर्मूल कर गई
अस्तित्व की सर्जित अथवा
विसर्जित रेखा से दूर
समय-सागर को उद्वेलित-आन्दोलित
अट्ठहास करते किंकर्तव्यविमूढ़ देखा है

सघन कुहासा जब भी मेरे मौन के आरपार छाया
न जाने कितने संदर्भों में
कितनी बार, क्षितिजों के आर पार
समय-पाखी को दिशाएं बदलते देखा है
अनहद-नाद के बीच
आत्म-व्यथा से सजल आंखें भींच....

                                                                - कलकत्ता, 15 दिसम्बर




अनहद नाद

प्रथम शब्दनाद रुदन से प्रारम्भ होकर
अपने रुपाकार को बढ़ाता
जोड़ता नये-नये रिश्ते नाते
अहनद-नाद से अस्तित्व जोड़ता

आदि से अन्त तक
अनन्त संदर्भों में
अपनी ईकाई घटाता-बढ़ाता
ढाई आखर को नव शब्द- स्वर देता
अथवा पद दल्लित करता
आत्म-अनात्म-बोध के गलियारों में
नए-नए आकर्षण-आशा-जाल में बंधा
अतीत की स्मृतियों के
निर्जन, उदास, एकाकी
रंगलीला की व्यथा-कथा को उजागर करता
वर्तमान के व्यामोह को तोड़ता

प्रथम-शब्द-नाद गर्भ धारिणी मां को
जहां नैसर्गिक सुख-आनन्द देता
जीवन के अवसान पर
वही शब्दनाद रुलाता, व्याकुल व्यथित करता
अनहद-नाद से जोड़ता
हमारे आत्म-पथ को
अजानी दिशा की ओर मोड़ता

                                                     - कलकत्ता, 16 दिसम्बर

Thursday, 12 December 2013

आज के संदर्भ में

आजादी के 66वें वर्ष भारतीय लोकतंत्र को, आम आदमी को भ्रष्ट, स्वार्थी, सत्ता लोलुप राजनीतिज्ञों से बहुत बड़ा खतरा है। गठबंधन की राजनीति, संघीय मोर्चा या जोड़-तोड़ से बने संयुक्त मोर्चा से जहां देश का विकास अवरुद्ध होगा वहीं इससे राजनीति-परस्त नेताओं के लोभ और अहम् की तुष्टि होगी। देश में विखराव पैदा होगा। आम आदमी के बीच संकट उपस्थित होगा।
                                                                                         


जन लोकपाल

अन्ना हजारे द्वारा प्रारम्भ किए जन लोकपाल आन्दोलन को सारे देश के बुद्धिजीवियों, आम आदमियों का पूरा समर्थन प्राप्त है। जन लोकपाल द्वारा देश को भ्रष्टाचार्, राजनीति के गन्दे इरादों से मुक्ति मिलेगी। विकास का रास्ता खुलेगा और सच्चा जनतंत्र आएगा।

                                                                                                      - स्वदेश भारती
                                                                                                          साहित्यकार

Sunday, 8 December 2013

Swadesh Bharati: भाई अरविन्द केजरीवाल का हार्दिक अभिनन्बदन।  उन्हों...

Swadesh Bharati: भाई अरविन्द केजरीवाल का हार्दिक अभिनन्बदन।  उन्हों...: भाई अरविन्द केजरीवाल का हार्दिक अभिनन्बदन।  उन्होंने भारतीय राजनीति में नये परिवर्तन की दिशा दिखाई यह ऐतिहासिक अवसर चिर स्मरणीय रहेगा। दि...
भाई अरविन्द केजरीवाल का हार्दिक अभिनन्बदन।  उन्होंने भारतीय राजनीति में नये परिवर्तन की दिशा दिखाई यह ऐतिहासिक अवसर चिर स्मरणीय रहेगा।

दिल्ली विधानसभा चुनाव देखकर भारतीय राजनीति को आम आदमी पार्टी (आप) से सीख लेनी चाहिए।

अब भ्रष्ट, मुस्टंडी, कुर्सी-लोलुपों, कालाबाजारी करने वालों, जाति, धर्म, के नाम पर वोट की राजनीति करने वालों को आप से सीख लेनी चाहिए।

                                                                                             - स्वदेश भारती
                                                                                               (साहित्यकार)