Wednesday, 20 July 2011

जीवन-अस्तित्व

कितना कुछ घटित होता जीवन में
कितना कुछ
कितना कुछ खोता जाता आदमी
कितना कुछ
और जो कुछ वह पाता है
उसे भी तो खोता चला जाता है
समय इसी तरह गुजर जाता है
बहेलिए की आखेटघाती तीर की गति जैसा
समय कभी ठहरता नहीं...

किसी सिंहासन के आदेश पर सिर नहीं झुकाता
समय-असमय हर किसी के जीवन में
कुहासा की तरह छा जाता
फिर क्षणभर में आंखों से ओझल हो जाता
संचित प्रेम-सुख के छिन जाने पर
समय-प्रभात-ओसकण बनकर
अपनी करुणा बरसाता है
अतृत्व प्यास, सुख, दुःख का
अहसास लिए
समय सदा ही वर्तमान को खोता
अतीत को पीठ पर लादे हमेशा चल नहीं पाता
भविष्य की आशाएं ही ढाता
आदमी कितना कुछ खोता...

आशाओं के छिन-भिन्न होने पर
किंकर्तव्यविमूढ़ आंखें भिगोता
विस्मृतियों के जंगल में चक्कर लगाता
सचमुच आदमी इतिहास के टूटे हुए आइने में
स्मृतियों की खंडित छाया के अतिरिक्त
भला क्या देख पाता है!

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