Friday, 21 March 2014

तुम्हें याद करूंगा

तुम्हें याद करूंगा
उम्र के कगार पर बैठ
दोपहर के सन्नाटे में,
सबेरे और शाम की सतरंगी किरणों में
तुम्हें याद करूंगा

जब मेरे हाथ पांव अशक्त होकर
पथ के दावेदार नहीं रहेंगे
रास्तों में घाटी पर उतरेगी शाम की पकी धूप
जब सबेरे और शाम की रोशनी मेरे लिए एक जैसी होगी
आंखें देख नहीं पायेगी तुम्हारा हरी फसल-रूप
तुम्हें याद करूंगा

जिस तरह नदी के बहाव के नीचे
बहुत सारे अंतर-प्रश्न छिपे होते हैं
बालू की सतह के नीचे पानी
और पत्थर के दिल में करुणा स्रोत फूटते हैं
मेरे दिल में
यादों का बसन्त फूलेगा
बार-बार लिखूंगा नई पत्तियों के मस्तक पर
तुम्हें याद करता रहूंगा



I will remember you
Sitting on the baks of the river of life
brooding on each day that has gone by
In the still of mid-day in the midst of myriad hues of the rays
mom and eve, every day, I'll
remember you, No doubt.

When my main limbs shall
Fail to tread on the path of life.
When the light of fading evening
Shall descend on the forests and path ways
when the light of morning
and evening shall appear just
the same for me
And my eyes shall fail to see
the splendor of beauty of your greenery
I shall remember you, no doubt

As beneath the undercurrents of a river
Many inner questions remain concealed
As from under the sandy surface water gushes forth
And from a stony heart
Compassion springs out
So will the spring of memories shall bloom
in my heart reflected in silvery dew-drops
and repeatedly then I shall write on the surface of
new sprouting leaves
and go on and on remembering you, no doubt.

Tuesday, 18 March 2014

लड़की हंसती है

लड़की हंसती है
हंसी से दोहरी होती है
क्योंकि उसके आंचल में
मखमली रोओं वाली
नीली आंखों की चमक लिए
बालपन की बिल्ली खेल रही है

लड़की रोती है
जार-बेजार
क्योंकि उसके सीने में
धड़कता हुआ दिल है
जिसे किसी बेरहम ने
प्यार-प्रवंचना की क्रूरता से खरोंचा है
अब वह लड़की
असमर्थता की बैसाखियों पर चलती
दिन रात पलकें भिंगोती
न हंसती है
न रोती है
खालीपन-पतझर में
वृंतहीन फूल की पीली पंखुड़ी बन
समय की धूल में मिलने के लिए
निजता खोती।



The Girl Laughs
The girl laughs bending to her left and right
because the cat of her childhood
with velvety hair on its skin
And blue bright eyes
plays all the time
in decorated garment's end

The girl weeps incessantly
because she has a heart
In her bosom and it palpitates speedily
As it is scrached with some one's
cruel deception of loving her.
now she moves on using crutches of helplessness
With numb eye lids day and night
She neither laughs nor weeps on her plight

In the autumnal emptiness
she has turned into yellow dry leaves
of a stemless fading flower,
soon to be mixed in the soil
After having lost its essence forever
and her own identity whatsoever.


अभी और चलना है
कितने सारे ऊबड़ खाबड़
टेढ़े मेढ़े, मरुजीवी, जलजीवी, थलजीवी भूमि खंडों
सघन वनांचल, ऊंचे नीचे रास्तों
अनगिन चौराहों को पार कर
चलता हुआ पथिक अबाधगतिक
एक चौराहे पर रुक गया है
आशा अभी भी बिल्ली की आंख की तरह
चमक रही है
औदार्य-कम्पन में
कहीं भी शिथिलता नहीं है
अभी तो और भी चलना है
और भी आगे
सूर्य की तरह
अपने गन्तव्य तक जाना है
और उसी तरह ओजस्वी लाल रंगोली त्योहार मनाते
सांध्य-क्षितिज आंगन में
शून्यता की ओट ढलना है
अभी और चलना है
और भी आगे
क्योंकि इसी क्रम में
नए बदलाव में
बदलना है।

Still we've to go a long way
Having passed so many
uneven, crooked roads and
moments of torcherous deserts
stretches of treacherous wetlands
Dense forests and hight and low chartered ways.
innumerable crossings
at last crossing the final hurdle
the traveler reached the halting place
But the hope still brightly shines
Like some cat's eyes in the darkness
He is not a all tired in his limbs
keeping the heart open in use
delight has to proceed on and on up to the height
Like the brightest star he has to reach
his destination and take part in
the colorful Rangoli festival of fun
At the court yard of evenings, horizons
And, to be lost in the expanse of void.
But just now he has to go on
forward and onward because
in the perspective of changes
one transforms the self not otherwise.

Friday, 14 March 2014

तुम्हारा चेहरा

तुम्हारा चेहरा आंखों के आईने में
जब भी झलकता है
अतीत मेरी आंखों के कलश से
बूंद बूंद ढलकता है
ये बूंदे वर्षा की बूंदों जैसी नहीं होती
कि बरसी और
ताल लैया नदी दुकूल बाढ़ बन गए
या नगर की सड़कों पर पानी भर गया
ट्राफिक जाम में
सड़कों के रास्ते ही बदल गए
ये बूंदे उस वर्षा की बूंदों की तरह नहीं
जिसमें किसान प्रसन्न होता है
और मछुआरा अपना जाल लेकर
नदी की ओर चल पड़ता है
ये बूंदे उस वर्षा की बूंदों की तरह भी नहीं
जो सैलानी बादलों की आंखों से गिरती
धरती की हरीतिमा के आनन्द से
आत्म-विभोर कर जाती है
ये बूंदे अतीत की बूंदे हैं
स्मृतियों के कसकते घावों से निकल कर
आंखों की राह बरसती है
अन्तर की सूखी जमीन पर आहत
आस्था को अपनी ममत्व भरी बाहों में बांध कर
कहती है-स्मृतियां ही इतिहास
और भविष्य की धरोहर होती है।




Your Face
Whenever you face reflects
In the mirror of my eyes
The past flows drop by drop incessantly
through them
But those are unlike the raindrops
Which when falling constantly
cause floods in the water bodies
pools and ponds, riverbanks and collected on
the city roads
If improperly drained, change there contours of ways
also they are unlike the ones
which please the cultivators and farmers
to stir up a fisherman enough sailing for the river
armed with his nets and angles to cast in the waters
In the hope of getting bountiful catches
They aren't the ones which raining from
the wandering clouds eyes make the earth
so happy with the greenery all around
That she forgets the self in absolute profundity of bliss
These are the drops from the past coming out
of the painful wounds through the paths of eyes
on the dry land of ones inner self
fastening it within their arms saying
memories are the trust value of history
and future treasure deposits.

Thursday, 13 March 2014

जीवन अस्तित्व

कितना कुछ घटित होता जीवन में
कितना कुछ
कितना कुछ खोता जाता आदमी
कितना कुछ
और जो कुछ वह पाता है
उसे भी तो खोता चला जाता है
समय इसी तरह गुजर जाता
बहेलिए की आखेटघाती तीर की गति जैसा
समय, कभी ठहरता नहीं लक्ष्य-तक पहुंचने से पहले...

समय किसी सिंहासन के आदेश पर सिर नहीं झुकाता
समय, असमय होता किसी के भी जीवन में
जो धुन्ध की तरह छा जाता
फिर क्षणों में आंखों से ओझल हो जाता
संचित प्रेम-सुख के छिन जाने पर
समय प्रभात-ओसकण बनकर
अपनी करुणा बरसाता...
अतृप्त प्यास, सुख, दुःख का
अहसास लिए
समय सदा ही वर्तमान को खोता

अतीत को पीठ पर लादे हमेशा क्या कोई चल पाता?
भविष्य की आशाएं ढोता
आदमी कितना कुछ खोता...

आशाओं के छिन्न-भिन्न होने पर
किंकर्तव्यविमूढ़ आंखें भिगोता, पछताता
विस्मृतियों के जंगल में चक्कर लगता....

सचमुच आदमी इतिहास के टूटे हुए आइने में
स्मृतियों की खंडित छाया के अतिरिक्त
भला क्या देख पाता है!



Existence of Life
How so often happens in life
How so much is lost
One plays the game of gains and losses
in the course of life and the time moves on
Does it ever slacken its speed?
Like a hunter's arrow
Does it ever stop
before reaching the target?
Time never bows its head before these ones
As misfortune or distress erupts all life
Like a dense fog the mystic moments
Do pass after some time...

When stored up joys of love are fobbed off
Time's touching tenderness rains
like the dawn's dew drops fall on petals
The unquenched thirst
with experiences of joys and sorrows,
Time always loses the present.
Is it possible for any one to go on and on

With the load
of past events forever..?
How so much is lost in life
when one's fancies and fantasies are shattered
The eyes shed tears and wink much

Man wanders alone in forests of forgetfulness
Truly, he observes what else except
the distored images of memories in
the broken mirror of lifes past....!

Tuesday, 11 March 2014

यादें

तुम्हें याद करता हूं
जब सतरंगी आकाश अपनी बाहों में
बसन्त को खुशी भर लेता है
नये-नये फूलों के कम्पन में
प्रेमाकुल संगीत फूट पड़ता है

तुम्हें याद करता हूं
पावस के बादलों की घुमड़ने पर
शरद की तुषार-धवल चिंतवन पर
मन की उजास भर

तुम्हें याद करता हूं
शिरीष के पत्ते जब लिखते हैं
थिरकती हुई हवा के पंखों पर गोपन कथा
नीरव गंभीर काली रात की बाहों में
छुपा लेती निस्तब्धता
हाहाकार करती शताब्दी की
कातर अन्तर्व्यथा

तुम्हें याद करता हूं
जब कुहासे के बीच चमकता है सूरज
चलता नये समय का रथ
हरे भरे जीवन-अस्तित्व के बीच
सहेजता जिजीविषा के सूने गन्तव्य-पथ
गहन निराशा और त्रासद अंधकार में
तुम्हें याद करता हूं।


Reminiscences

I remember you-
when the seven-hued sky finds
In its arms the Spring's joyfulness
And lover's love song vibrates in the quivering fresh flowers.

I remember you-
When the rain clouds
darken the day's sky
and the autumn looks snow white
when the spirit
is enlightend with twilight

I remember you-
when the ancient
acacia-leaves write about
their secret intentions
on the wings of air dancing
with expressive gestures
And the soundless deep black night
Spreads its arms to conceal its silence
like the century's restless inner wailing

I remember you-
When the bright sun shines over in the mist
The chariot of new time moves on amidst
The green fruitful span of life's existence
And provides us strength on the solitary path of
longing for living during extreme frustration
in darkness agonising any next moment
I remember you.





Thursday, 6 March 2014

यादें

यादें फूल की पंखुड़ियों से भी अधिक कोमल
हृदय में फूलती, सुगंध बिखरेती
और समय के अंधेरे में दम तोड़ देती
बस अवशिष्ट धूल बन रह जाती
जीवन पर्यंत मस्तिष्क के आर पार
चक्कर लगाती
आह! पीड़ा पहुंचातीं




Memories

Memories, far more tender than flower petals
Blossoming in the heart spreading fragrances
And in the dark of time withering away,
Turning into dust
roaming across the mind for the whole life
Oh! what a disgust.

Wednesday, 5 March 2014

Swadesh Bharati: प्रेमाभास

Swadesh Bharati: प्रेमाभास: मेरी उदासी का रहस्य यह नहीं कि बसन्त ने मुझे पतझर के हाथों सौंप दिया मेरी उदासी का रहस्य यह भी नहीं कि प्रेमीले सपनों ने मेरे विश्वासों ...

Tuesday, 4 March 2014

प्रेमाभास

मेरी उदासी का रहस्य यह नहीं
कि बसन्त ने मुझे
पतझर के हाथों सौंप दिया
मेरी उदासी का रहस्य यह भी नहीं कि प्रेमीले सपनों ने मेरे विश्वासों को
खंडित-प्रत्यंचा दी
टूट कर जुड़ने
और जुड़कर टूटने के अनवरत क्रम में
हार गया दांव पर लगाए गए सभी सपने

मेरी उदासी का रहस्य यह भी नहीं
कि हताशा के अंधेरे में चलते हुए
थक गए हैं पांव अथवा छूट गये
वे सभी संदर्भ जो बहुत बहुत अपने थे।

अपनी उदासी के बारे में
जब भी सोचता हूं तो यही पाता हूं
आखिर मेरी उदासी का रहस्य क्या है?

गोपालपुर
24 दिसम्बर, 1971





Love Expectation

My melancholy is not due to the fact
that the spring has
handed me over to the autumn.

Nor it's due to the failure of
my sweet dreams that gave my belief
a broken bow-string
And in the ever-lasting order of
union or divison of all sweet dreams
are staked and lost in the wager

My despondency is not due to
the tired feet treading the dark path of frustration
due to the loss of my own dearest contexts
Once they all belonged very much to me
whenever I muse over the cause of my melancholy
I am always caught up by these reflections
I know not the reasons of my despondency
Wha's the secret of all this after all?

Gopalpur,
24th December, 1971