Monday, 30 November 2015

Report 2015, Raipur (Chhatisgarh)

रिपोर्ट

28वां अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन एवं अंतर्राष्ट्रीय भाषा-साहित्य संगोष्ठी, राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान तथा अंतर्राष्ट्रीय अकादमी राजभाषा
शील्ड सम्मान-समारोह, रायपुर,  दिनांक–2 से 4 अक्टूबर 2015


राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 145वीं जयंती के उपलक्ष्य में राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी रूपाम्बरा का स्वर्ण जयंती समारोह एवं 28वां अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन, अंतर्राष्ट्रीय भाषा-साहित्य संगोष्ठी, राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान तथा अंतर्राष्ट्रीय अकादमी राजभाषा शील्ड स्मान का आयोजन होटल शारदा इन रायपुर तथा रुंगटा इंजीनियरिंग महाविद्यालय, भिलाई में दिनांक 2 से 4 अक्टूबर 2015 को सफलता पूर्वक आयोजित किया गया। उद्घाटन समारोह के मुख्य अतिथि महामहिन राज्यपाल, छत्तीसगढ़ श्री बलरामजी दास टंडन थे। अध्यक्षता श्री गौरी शंकर अग्रवाल, अध्यक्ष, छत्तीसगढ़ विधानसभा, विशिष्ट अतिथि माननीय श्री प्रमोद दुबे, महापौर, रायपुर, माननीय प्रो. केशरी लाल वर्मा, निदेशक, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, नई दिल्ली थे। राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी रूपाम्बरा के राष्ट्रीय अध्यक्ष कविवर स्वदेश भारती, सम्मेलन के संयोजक कवि सुरेंद्र दुबे सचिव छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, निदेशक प्रो. सुधीर शर्मा ने विशिष्ट अतिथियों एवं सहभागियों का स्वागत किया। सम्मेलन में लगभग 160 सहभागियों ने भाग लिया जो सरकारी मंत्रालयों, विभागों, उपक्रमों लोकसभा, शिक्षण संस्थानों तथा विदेश से पधारे थे।
उद्घाटन समारोह का उद्घाटन महामहिम राज्यपाल, श्री बलरामजी दास टंडन ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर एवं प्रदीप जलाकर किया। महामहिम ने अपने उद्घाटन उद्बोधन में कहा कि हिन्दी का भविष्य तभी उज्जवल होगा जब हम ईमानदारी से इसे बढ़ाने का प्रयास करेंगे। साथ ही इसे राजनीति प्रशासन, न्यायालय, शिक्षा और रोजगार से जोड़ने की जरूरत है। जब तक हिन्दी को प्रांतीय भाषाओं के साथ योग्य स्थान नहीं देंगे तब तक स्वराज की बात निरर्थक है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे छत्तीसगढ़ विधान सभा के अध्यक्ष श्री गौरी शंकर अग्रवाल ने कहा कि इस हिन्दी के महाकुंभ में छत्तीसगढ़ी को संविधान की। 8वीं अनुसूची में शामिल करने का जो प्रयास किया जा रहा है वह अद्वितीय है। छत्तीसगड़ सरकार इस प्रयास को हर संभव सहयोग प्रदान करेगी। इस अवसर पर आईएएस अधिकारी श्री गणेश शंकर मिश्र, श्री संतोष रुंगटा, महापौर, रायपुर श्री प्रमोद दुबे, श्री तिलोकचन्द बरुड़िया, डॉ. विद्याकेशव चिटको को विशिष्ट हिन्दी सेवा सम्मान प्रदान किया गया। तकनीकी शिक्षक प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान, भोपाल, मध्य प्रदेश पंचायत राज की पत्रिका- संचायिका, मध्य प्रदेश माध्यम, भोपाल इंडियन आयल कार्पोरेशन, फरीदाबाद, कार्पोरेट कार्यमंत्रालय (पश्चिम बंगाल) भारत सरकार, कोलकात्ता, लोकसभा सचिवालय, भारतीय संसद, नई दिल्ली, इंडियन आयल कार्पोरेशन, गुवाहाटी रिफाइनरी, भारतीय साधारण बीमा निगम, मुम्बई को अंतर्राष्ट्रीय अकादमी राजभाषा शील्ड एवं राजभाषा पत्रिका शील्ड सम्मान से सम्मानित किया गया।
महामहिम एवं विशिष्ट अतिथियों द्वारा सम्मेलन स्मारिका- रूपाम्बरा का भाषा साहित्य विशेषांक डॉ. विद्याकेशव चिटको द्वारा संकलित, संपादित बराक ओबामा पुस्तक, श्रीमती शिल्पा शर्मा की पुस्तक- सफलता के लिए विज्ञान तथा प्रदेश के साहित्यकारों की एक दर्जन से अधिक पुस्तकों प्रतिकाओं का विमोचन किया गया।
राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष कविवर स्वदेश भारती ने अतिविशिष्ट अतिथियों, देश, विदेश से पधारे सम्मेलन के सहभागियों को संबोधित करते हुए अपने स्वागत भाषण में कहा कि इस सम्मेलन में अकादमी के मानद अध्यक्ष डॉ. रत्नाकर पांडेय, पूर्व सांसद अस्वस्था के कारण नहीं आ सके उनके शीघ्र स्वास्थ्य होने के लिए ईश्वर से प्रार्थना है। उनका मार्गदर्शन 28 वर्षों से मिलता रहा है और मिलता रहेगा। इस सम्मेलन का केंद्र विन्दु है- छत्तीसगढ़ी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना और अकादमी का सघन प्रयास होगा कि एक वर्ष के  भीतर इस भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कर लिया जाए। श्री भारती ने कहा अकादमी 50 वर्षों से हिन्दी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए संकल्पबद्ध होकर कार्य करती आ रही है। अकादमी द्वारा राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती के उपलक्ष्य में अब तक 28 अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन देश के विभिन्न प्रांतों में तथा विदेश में आयोजित किए गए जिसमें भारत सरकार के मंत्रालयों, विभागों, उपक्रमों, निगमों, राज्य सरकारों विदेशों से नामित लगभग तीन हजार से अधिक वरिष्ठ अधिकारी, हिन्दी प्रभारी, साहित्यकार, विद्वान, भाषाविद् हिन्दी सेवियों ने भाग लिया।
हमारा उद्देश्य है हिन्दी को राष्ट्रभाषा, विश्वभाषा का दर्जा दिलाना और राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में स्वीकृति प्राप्त करना। देश की अस्मिता को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर सम्मान देना, भारत तथा विदेशों में रह रहे भारतवंसियों की दीर्घकालीन आकांक्षाओं का सम्मान करना।
सम्मेलन के संयोजक तथा छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सचिव कवि सुरेंद्र दुबे ने कहा कि अकादमी का छत्तीसगढ़ी भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल कराने का प्रयास स्तुत्य है। इससे एक भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक आधार मिलेगा और छ्त्तीसगढ जनता की दीर्घकालीन आकांक्षाओं की पूर्ति होगी, छत्तीसगढ़ी भाषा और भी समृद्ध होगी। अमरीकी से आई साहित्यकार, अकादमी प्रवर समिति की अध्यक्षा डॉ. श्रीमती विद्याकेशव चिटको ने अमरीका में हिन्दी के प्रचार प्रसार, विकास और विश्वविद्यालयों में हिन्दी विभागों में हो रहे कार्यकलापों की चर्चा की। उन्होंने कहा कि विश्व मंच पर हिन्दी को उत्तरोत्तर मान्यता मिल रही है। अब हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि हिन्दी को राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में मान्यता दिलाई जाए और उसके लिए सरकार की ओर से सघन प्रयास हों। प्रो. केशरी लाल वर्मा, निदेशक, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय भारत सरकार ने हिन्दी के विकास पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि हिन्दी के विकास में जन साधारण का बहुत बड़ा योगदान है।
उद्घाटन समारोह का सफलता पूर्वक संचालन साहित्यकार निदेशक राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी प्रो. सुधीर शर्मा ने किया।
दिनांक 3.10.2015 को प्रातः 10.00 बजे दूसरा सत्र प्रारम्भ हुआ। छत्तीसगढ़ी का विकास एवं उन्नयन विषय पर चर्चा आरम्भ हुई। अध्यक्षता डॉ. विद्याकेशव चिटको ने की। संगोष्ठी का शुभारंभ करते हुए कविवर स्वदेश भारती ने कहा कि भारत की सभी समृद्ध भाषाओं को राष्ट्रीय पहचान मिलनी चाहिए इससे जन-आकांक्षाओं को भाषाई संस्कार मिलेगा। भारत की सभी भाषाएं संस्कृत और हिन्दी की सहोदराएं हैं। सभी का सम्मान किया जाना देश की अखंडता के लिए जरूरी है। श्री भारती ने कहा कि कोई भी भाषा सर्जनात्मक साहित्य के बिना कहीं भी सर्वमान्य नहीं होती। छत्तीसगढ़ी के साहित्यपक्ष का विकास एवं संवर्धन होना जरूरी है। माननीय मुख्यमंत्री जी तथा छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग इस बारे में सार्थक कदम उठाए और सर्जनात्मक साहित्य पर कम से कम 10-12 पुस्तकें शीघ्र तैयार करें। 3 संकलन श्रेष्ठ कविताओं, 3 चुनी हुई कहानियों तथा 3 उत्कृष्ठ उपन्यासों तथा 3 निबंध, आलोचना तथा हास्य-व्यंग के प्रकाशित करें। इसके अतिरिक्त छत्तीसगढ़ी-अंग्रेजी, अंग्रेजी-छत्तीसगढ़ी पर वृहत् भाषाकोश का भी प्रकाशन हो। माननीय मुख्य मंत्री जी छत्तीसगढ़ के सभी प्रशासनिक कार्यालयों को परिपत्र जारी करें कि वे फाइलों पर आदेश, टिप्पणियां, छत्तीसगढ़ी में लिखी जाएं, सभी तरह के फार्म, निविदा, सूचना, परिपत्र, विज्ञापन आदि तथा प्रौद्योगिकी कार्यों में राष्ट्रभाषा का प्रयोग हो। स्कूलों, कॉलेजों में पढ़ाई जाने वाली क्षेत्रीय भाषा में पाठ्यपुस्तकों का प्रकाशन हो तथा त्रिभाषा फारमूले का कड़ाई के साथ अनुपालन किया जाए जिसमें छत्तीसगढ़ी, हिन्दी तथा अंग्रेजी खास विषय हो। ऐसे बहुत सारे सुझाव है जिन पर छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग द्वारा अमल और पहल करना जरूरी है। कवि सुरेंद्र दुबे, सचिव राजभाषा आयोग ने कहा कि कविवर भारती जी के सुझावों पर आयोग काम करेगा। उन्होंने राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी के प्रति आभार प्रकट करते हुए यह भी कहा कि अकादमी ने छत्तीसगढ़ी को 8वीं अनुसूची में शामिल करने का जो भी प्रयास करेगी उसमें छ्त्तीसगढ़ शासन पूरा सहयोग देगा।
इस सत्र में डॉ. जे. के. डागर, क्षेत्रीय निदेशक कर्मचारी राज्य बीमा निगम, रायपुर, डॉ. मंजुला श्रीवास्तव, केंद्रीय विद्यालय रायपुर, डॉ. जे. आर सोनी, श्रीमती सीमा चन्द्रापुर, सहायक प्राध्यापक, गुरुकुल महिला विद्यालय रायपुर, श्री कौशल किशोर तिवारी, पत्रकार-प्रेस क्लब, श्री तुलसी वशिष्ठ, कवि, रायपुर तथा अन्य विद्वानों ने चर्चा में भाग लिया। सभी ने एकमत से छत्तीसगढ़ी को 8वीं अनुसूची में शामिल करने के पक्ष में अपना विचार प्रस्तुत किए। संगोष्ठी की अध्यक्ष डॉ. श्रीमती विद्याकेशव चिटको ने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि छत्तीसगढ़ के बहुत सारे लोग अमरीका में रहते हैं और वे आपस में छत्तीसगढ़ी में बातें करते हैं। भारत वंशी जहां भी गए अपनी भाषा, संस्कृति को लेते गए। उनका भारत के प्रति अटूट प्रेम विशेष गौरव दर्शाता है। अकादमी के इस 28वें सम्मेलन में छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में सम्मिलित करने के लिए अकादमी जो कदम उठाएगी उसे सरकार का सहयोग एवं समर्थन मिलना चाहिए। इस बारे में एक व्यापक कार्यक्रम बनाकर कार्य करना श्रेयस्कर होगा। इस सत्र के वक्ताओं के प्रति डॉ. सुधीर शर्मा निदेशक एवं सत्र-संचालक ने आभार प्रकट करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। दोपहर भोजन के बाद तीसरा सत्र प्रारम्भ हुआ। विषय था- भाषा के उन्नयन, विकास एवं प्रचार-प्रसार में संचार भूमिका। इस सत्र की अध्यक्षता कविवर स्वदेश भारती ने की। संचालन डॉ. जे. आर. सोनी ने किया। सत्र का प्रारम्भ करते हुए डा. जे. के. डागर ने कहा कि भाषा के प्रचार-प्रसार में संचार माध्यमों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। किसी भी भाषा की लोकप्रियता संचार माध्यमों पर निर्भर करती है। संचार माध्यम नए शब्दों के गठन में बेहतर योगदान देते हैं और भाषा को संमृद्ध करते हैं, परन्तु आज तो समाचार पत्रों में राजनीति हावी है और साहित्य संस्कृति, सामाजिक सरोकार गौण हो गए हैं। श्रीमती पीजी मनीषा, अधिकारी भारतीय साधारण बीमा निगम, मुम्बई ने कहा कि सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का सही स्वरूप होना चाहिए। श्री कमलेश गुप्त, अधिकारी इंडियन आयल कार्पो. फरीदाबाद (हरियाणा) ने कहा कि गूगल में हिन्दी के प्रयोजनीय शब्द प्रयोग होने चाहिए। इस कमी को पूरा करने के लिए सरकार को कदम उठाना चाहिए। संचार माध्यम जब भी नए शब्दों का निर्माण करते हैं वे सटीक और अर्थपूरक नहीं होते। श्री अम्बर शुक्ला, साहित्यकार ने कहा कि संचार माध्यमों का योगदान भाषा के प्रचार-प्रसार में अति आवश्यक है। भाषा एक सेतु है जिस पर चल कर संचार माध्यम अपना दिन-प्रतिदिन काम करते हैं। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि सरकारी कार्यालयों, उपक्रमों, निगमों में परिपत्र पहले हिन्दी में जारी हों। जरूरत हो तभी अंग्रेजी का प्रयोग किया जाए। श्री तुलसी वशिष्ट कवि रायपुर, जानकी त्रिपाठी, कोलकाता, श्रीमती सीमा चन्द्रापुर, रायपुर, सुश्री युक्ता राजश्री रायपुर, राजेश जन राही, मोहन श्रीवास्तव, कवि, रायपुर, श्रीमती शिल्पा शर्मा, श्री एनपी विश्वकर्मा, रायपुर ने विचार सत्र में भाग लिया और अपने विचारों को रखा।
अध्यक्षीय वक्तव्य में कविवर स्वदेश भारती ने कहा कि संचार माध्यमों के प्रयासों से भाषा को जनप्रिय बनाया जाता है। बंगला दैनिक समाचार पत्र आनन्द बाजार पत्रिका ने बंगला साहित्य, संस्कृति को गांव-गांव में पहुंचाया। ख्यातिनामा लेखकों को संपादकीय विभाग में रखा मलयालम का दैनिक पत्र मलयाली मनोरमा ने केरल के कोने-कोने में अपनी पैठ जमाकर मलयाली साहित्य संस्कृति को व्यापक रूप से पचारित-प्रसारित किया। नए लेखकों को प्रश्रय दिया। हिन्दी के समाचार पत्र, मीडिया व्यापार को प्रधान मानकर अपना धंधा चलाते हैं। भाषा, संस्कृति से कोसों दूर रहते हैं।
चतुर्थ सत्र का विषय था हिन्दी का वैश्विक स्वरूप, विश्वभाषा तथा राष्ट्रसंघ की भाषा बनने में कठिनाइयां व निदान।
इस सत्र की अध्यक्षता डॉ. श्रीमती विद्याकेशव चिटको ने की। विषय की प्रस्तावना करते हुए कविवर स्वदेश भारती ने कहा कि भारत को स्वतंत्र हुए 68 वर्ष हो गए, हमें संविधान, राष्ट्रध्वज, राष्ट्रगान मिला, परन्तु राष्ट्रभाषा अभी तक नहीं मिली, इसीलिए हमारी स्वतंत्रता अभी अधूरी है। छोटे-छोटे देशों की भाषाएं राष्ट्रसंघ में मान्यता प्राप्त कर लीं, परन्तु हिन्दी को लेकर सरकार गंभीर नहीं है। इसलिए हिन्दी को विश्वभाषा बनने और राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में प्रयुक्त होने में इतना विलम्ब हो रहा है। राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी 50 वर्षों से हिन्दी को राष्ट्रीय एवं वैश्विक स्तर पर प्रचारित-प्रसारित करने के लिए सतत प्रयत्नशील है, परन्तु सरकार की ओर से सार्थक सहयोग न मिल पाने के कारण हमारे प्रयासों को पूरी तरह सफलता नहीं मिल पा रही है। अतः अकादमी को ही अब आगे आना होगा और जन-सहयोग द्वारा राष्ट्रसंघ को दी जाने वाली फीस जो लगभग दो सौ करोड़ रुपए है तथा लगभग 170 देशों की आवश्यक स्वीकृतियां जुटानी पड़ेंगी। यह काम हमारे लिए कठिन है क्योंकि अकादमी के 50 वर्षों के कार्यकाल में हमने सरकारी या वैयक्तिक अनुदान नहीं लिया और सीमित साधनों द्वारा अपने बल बूते पर हिन्दी का प्रचार-प्रसार करते रहे। यह संस्था उन अनुदान प्राप्त संस्थाओं से आगे बढ़कर ढेर सारे कार्य किए जिन्हें लाखों, करोड़ों रुपए का सरकारी अनुदान मिलता है वे नहीं कर पाईं। फिर भी हमारे पास एक सम्बल है, विश्वास है, आस्था है कि एक न एक दिन हिन्दी विश्वभाषा, राष्ट्रसंघ की भाषा बनकर रहेगी। श्री मनोज कुमार सिंह, संपादक लोकसभा ने कहा कि अब समय आ गया है जबकि सरकार को हिन्दी के बारे में गंभीरतापूर्वक सुनिश्चित कदम उठाना है और राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में हिन्दी को गौरवान्वित करना है।  श्रीमती विनीता ब्रह्म, राजभाषा प्रभारी, इंडियन आयल कार्पोरेशन, गुवाहाटी रिफाइनरी, असम ने कहा कि हिन्दी के प्रति आस्था रख कर हम काम करेंगे तो हिन्दी निश्चय ही विश्वभाषा बन कर रहेगी। श्रीमती शिल्पा शर्मा ने कहा कि हिन्दी राष्ट्रीय अस्मिता की संवाहक है और एक सहज, सरल वैज्ञानिक भाषा है। उसे राष्ट्र संघ में मान्यता मिलनी चाहिए। भारत में विज्ञान, तकनीकी, प्रौद्योगिकी की भाषा हिन्दी होनी चाहिए।
श्रीमती डॉ. विद्याकेशव चिटकों ने अपने अध्यक्षीय समापन भाषण में कहा कि विदेशों में हिन्दी की जिस प्रकार मान्यता है, अपने घर भारत में नहीं है। यदि यही देश प्रेम है और हम अपनी भाषा, संस्कृति से गहरे से जुड़ नहीं पाते तो हमारी आजादी कैसे सुरक्षित रह सकती है। महात्मा गांधी का कथन था कि किसी भी देश की आजादी तभी सुरक्षित होती है जब लोग आजादी का मतलब समझें। अपनी भाषा, संस्कृति, वर्ताव, व्यवहार, बोल चाल, रहन-सहन में अपनी भाषा, संस्कृति राष्ट्रीयता को उजागर करें तथा उदाहरण कायम करें। जिस हिन्दी भाषा में हमें आजादी मिली, गांधीजी ने हिन्दी में ही अपने सभी भाषण देश भर में दिए और लोगों को एकजुट किया, आजादी के आंदोलन को शक्तिशाली बनाया जाए। आज उसी भाषा की मान्यता में सवाल उठ रहे हैं।
डॉ. के सुधा, अध्यक्ष हिन्दी विभाग, विशाखा सरकारी महिला महाविद्यालय, विशाखापटनम्  ने विषयान्तर्गत अपना आलेख- वैश्विकता के परिवेश में परिवर्तित हिन्दी का वाचन किया। उन्होंने प्रकाश डाला कि संस्कृत की बेटी हिन्दी का संबंध यूरोपीय तथा भारतीय भाषाओं के ऐतिहासिक एवं भौगोलिक दृष्टि हजारों वर्ष पुराना है। भाषा एवं साहित्य वैश्विक संस्कृति की एकता की स्थापना की संवाहिकाएं हैं। वैश्विक एकता में संचारक्रांति का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिन्दी अपनी सीमा को विस्तृत करती जा रही है। Yahoo, Google, flicker आदि सर्च इंजिन में हिन्दी का प्रयोग विस्तृत रूप से किया जा रहा है। वैश्वीकरण के लक्ष्य में हिन्दी सेतु का काम कर रही है।
इसी संगोष्ठी के साथ पांचवां सत्र शामिल कर लिया गया जिसका विषय था- कार्यालयों में हिन्दी कार्यान्वयन में कार्यपालक की भूमिका एवं विदेशी दातावासों, विश्वविद्यालयों तथा राष्ट्रसंघ में हिन्दी की वर्तमान स्थिति। अध्यक्षता कविवर सुरेंद्र दुबे ने की, विषय प्रवर्तन डॉ. श्रीमती विद्याकेशव चिटको ने किया। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा कि हिन्दी का कार्यान्वयन राष्ट्रीयता से जुड़ा है। सरकारी मंत्रालयों, विभागों, उपक्रमों आदि में अब हिन्दी कार्यान्वयन का नाटक नहीं होना चाहिए। हिन्दी दिवस, हिन्दी सप्ताह, माह मनाकर अपनी ड्यूटी पूरी नहीं समझना चाहिए। स्पष्टतः हिन्दी से अपने को जोड़ना जरूरी है। हिन्दी किसी की मुहताज नहीं है। उसे सारा विश्व स्वीकार रहा है। भारत के बाहर लगभग 160 विश्व विद्यालयों में हिन्दी का पठन-पाठन चल रहा है। राष्ट्रसंघ स्वयं हिन्दी को विश्वभाषा के रूप में स्वीकार करने के लिए उत्सुक है। यह बात राष्ट्रसंघ के महासचिव डॉ. वान मून ने न्यूयार्क में 2007 में आयोजित 8वें विश्व हिन्दी सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर विशेष अतिथि के रूप में स्वीकार किया था। चर्चा में श्री कमलेश गुप्ता, अनुसंधान अधिकारी, इंडियन ऑयल कार्पो. लि. अनुसंधान एवं विकास केंद्र, फरीदाबाद (हरियाणा)। श्री शिव नरेश, अनालिस्ट, इंडियन आयल कार्पोरेशन, श्री नन्दलाल सिंह, कार्पोरेट कार्यमंत्रालय, भारत सरकार, कोलकाता, श्रीमती जयश्री डहाले, सहायक प्रबंधक (राजभाषा), भारतीय साधारण बीमा निगम, मुम्बई, श्रीमती पीजी मनीषा, सहायक महाप्रबंधक, भारतीय साधारण बीमा निगम, मुम्बई, श्री आत्माराम शर्मा, संपादक, मध्य प्रदेश माध्यम, भोपाल, श्री आर.एस. मीना, मध्य प्रदेश माध्यम, श्रीमती विनीता ब्रह्म, राजभाषा प्रभारी, गुवाहाटी रिफाइनरी असम तथा अन्य सहभागियों ने भाग लिया एवम् अपने विचार प्रस्तुत किए। कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे। जिसमें प्रमुख थे-
1         सरकार को हिन्दी को विश्वभाषा राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने के सभी उपाय करने चाहिए जिससे भारतीय जनमानस की अपेक्षाओं के अनुरूप राष्ट्रभाषा हिन्दी विश्वमंच पर गौरवान्वित हो सके।
2         हिन्दी पत्राचार को , क्षेत्रों में समान रूप से 100 प्रतिशत कर दिया जाए।
3         केंद्र के मंत्रालयों, विभागों, उपक्रमों, निगमों तथा अन्य संस्थानों में कार्यालयीन परिपत्रों को केवल हिन्दी में जारी किया जाए।
4         प्रत्येक संस्थान में उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाए जो प्रशासनिक कार्यालयों में हिन्दी कार्यान्वयन की प्रगति का आकलन करें और संस्थान प्रमुख को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
दोनों सत्रों का समापन करते हुए अध्यक्ष कविवर श्री भारती ने कहा कि हमने अट्ठाइस सम्मेलनों में पांच सौ प्रस्ताव से अधिक हिन्दी कार्यान्वयन की प्रगति को प्रयोजनीय और तीव्र गति देने के लिए भारत सरकार के पास समुचित कार्रवाई हेतु प्रस्तुत किए, परन्तु उनमें से 20 प्रतिशत पर ही काम हुआ फिर भी हमें विश्वास है कि सरकार हिन्दी तथा भारतीय भाषाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार के राष्ट्रीय उद्देश्यों तथा राष्ट्रीय एकता, अखंडता के लिए गम्भीर गंभीर और सघन प्रयास करेगी तथा भारतीय भाषा, साहित्य, संस्कृति के उत्थान के लिए कारगर कदम उठाएगी।
सम्मेलन का छठा सत्र स्वमूल्यांकन था जिसमें सरकारी कार्यालयों से पधारे सहयोगियों ने रुचिपूर्वक भाग लिया और प्रश्न पत्रों का उत्तर गम्भीरता से दिया। दिनांक 4.10.15 को प्रातःकाल 7.30 बजे से 12 बजे तक शैक्षणिक पर्यटन आयोजित किया गया, जिसमें लगभग 100 प्रतिनिधियों ने भाग लिया और रायपुर से लगभग 50 मील दूर केवल्य धाम में जैन मंदिरों का परिदर्शन किया। इस खुले सत्र में प्रतिनिधियों ने प्रकृति तथा प्राचीन सांस्कृतिक जैन वास्तु, स्थापत्य कला को सराहा। अगले सम्मेलन के लिए रमेश्वरम (तामिलनाडू) या तिरुवन्तपुरम् (केरल), अथवा अबूदावी का प्रस्ताव दिया गया।
सम्मेलन का 7वां सत्र समापन-समारोह रुंगटा इंजीनियरिंग महाविद्यालय, कुरुद, कोहका, भिलाई में आयोजित किया गया था। सम्मेलन के मुख्य अतिथि राजनांद गांव के युवा सांसद (लोकसभा) श्री अभिषेक सिंह थे, अध्यक्षता कविवर स्वदेश भारती, राष्ट्रीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी ने की। विशिष्ट अतिथि थे श्री संतोष रुंगटा, चेयरमैन रुंगटा, ग्रूप ऑफ इंजीनियरिंग इंस्टीट्यूशन, श्री सुशील त्रिवेदी, पूर्व आई.ए.एस. श्रीमती डॉ. विद्याकेशव चिटको, अध्यक्षा-अकादमी-प्रवर समिति। उपस्थित सहभागियों, अतिथियों को संबोधित करते हुए कवि श्री सुरेंद्र दुबे संयोजक- सम्मेलन ने कहा कि जिस मंच पर सुशील, स्वदेश, अभिषेक, विद्या की उपस्थिति हो वह कितना भाग्यशाली समारोह होगा। राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी का समापन समारोह कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। पहला यह कि श्री अभिषेक सिंह जैसे एक होनहार युवा संसद सदस्य इस समारोह के मुख्य अतिथि हैं और सम्मेलन का यह अंतिम सत्र युवा छात्र, छात्राओं के बीच हो रहा है। तीसरा कि 28वां अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन की थीम है- छत्तीसगढ़ी को भारत के संविधान की 8वीं अनुसूची में स्वीकृत कराना। इसलिए यह सत्र ऐतिहासिक है। कविवर स्वदेश भारती ने अपने उद्बोधन में कहा कि भाषा का तकनीकी विकास भारत की औद्योगिक एवं आर्थिक प्रगति की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण केंद्र बिन्दु है और छत्तीसगढ़ अत्यधिक भाग्यवान है जहां उद्योगपति श्री संतोष रुंगटा जैसे समाज, भाषा के हितैषी जिन्होंने बहुत सारे इंजीनियरिंग महाविद्यालयों, संस्थानों की स्थापना की है और उनकी देखरेख अत्यधिक कुशलता से कर रहे हैं। अकादमी उन्हें हार्दिक शुभकामनाएं देती है कि राष्ट्र के लिए विशेष रूप से छत्तीसगढ़ के लिए उनका प्रयास और भी सार्थक हो, सफल हो। श्री भारती ने कहा कि अभिषेक सिंह जैसे युवक नेता छत्तीसगढ़ में सर्वांगीण विकास की प्रक्रिया को उच्चतम शिखर तक ले जाएंगे, ऐसी आशा है। उनके जीवन के उच्चतम उत्थान के लिए हार्दिक शुभकामनाएं। श्री भारती ने कहा कि राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी के प्रयासों से वर्ष 1992 में नेपाली कोंकणी, मणिपुरी भाषाओं को एक साथ संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया गया है। इसके लिए सिक्किम हाउस नई दिल्ली में सिक्किम के तत्कालीन माननीय मुख्यमंत्री श्री नरबहादुर भंडारी, राज्यसभा की संसद सदस्या श्रीमती दिल कुमारी भंडारी, बालीवुड के तेज तर्रार ऐक्टर डैनी डेनजोग्पा तथा बहुत सारे सम्मानित कलाकार, साहित्यकार, पत्रकार आठ दिनों तक दिल्ली में कैम्प कर संसद के दोनों सदनों के संसद सदस्यों की स्वीकृतियां प्राप्त करने का प्रयास किया था। हमारा ध्येय साफ और स्पष्ट था, राष्ट्र की जनभावनाओं के वर्चस्व को कायम करने के लिए था। भाषा की महत्ता को स्वीकार कर देश की एकता, अखंडता तथा भाषाई सौहार्द्र के लिए था। छत्तीसगढ़ी को भी आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए इस बारे में राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी सघन प्रयास करेगी। हमारी अपील है कि छत्तीसगढ़ शासन हमें हर प्रकार का सहयोग दे। श्री भारती ने रुंगटा ग्रुप आफ इंस्टीट्यूशन के सभी छात्रों, छात्राओं, शोधार्थियों को शुभकामनाएं देते हुए उनके सुन्दर भविष्य की कामना की। राजनांद गांव के नवनिर्वाचित युवा सांसद श्री अभिषेक सिंह ने श्री भारती का अभिनन्दन करते हुए कहा कि रायपुर छत्तीसगढ़ में 28वां अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन, अंतर्राष्ट्रीय भाषा साहित्य संगोष्ठी का आयोजन एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है। छत्तीसगढ़ी भाषा सम्मेलन की थीम बनी और उसे संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए अकादमी ने संकल्प लिया। इन प्रयासों के प्रति इस प्रदेश की जनता सदा कृतज्ञ रहेगी। श्री सिंह ने अकादमी को अपनी ओर से हर संभव सहयोग देने की प्रतिश्रुति दी।
डॉ. श्रीमती विद्याकेशव चिटको ने कहा कि कोई भी महत्वपूर्ण कार्य सतत् अध्यवसाय, आस्था, विश्वास और कर्मठता से किया जाए तभी सफल होता है। राष्ट्रपति बराक ओबामा बहुत गरीब परिवार से निकल कर कठिन परिश्रम लगन और निष्ठा से अमरीका के राष्ट्रपति बनें। आज की भारतीय युवा पीढ़ी को उनका अनुसरण करना चाहिए। विज्ञान प्रौद्योगिकी आईटी के क्षेत्र में भारत के लाखों युवक अमरीका की बड़ी-बड़ी कम्पनियों अमरीकी प्रशासन, ह्वाइट हाउस, नासा, गूगल, माइक्रोसाफ्ट आदि में उच्च पदों पर कार्यरत हैं। कठिन परिश्रम और आत्म विश्वास हमें अभीष्ट मंजिल तक ले जाता है। श्री सुशील त्रिवेदी ने कहा कि भारत में प्रादेशिक भाषाओं को बढ़ावा मिलना चाहिए। जन आकांक्षाओं को नजर अंदाज नहीं करना है। उससे विरोध का जन्म होता है। हमें पूरा विश्वास है कि राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी छत्तीसगढ़ी को 8वीं अनुसूची में शामिल कराने का प्रयास सफल होगा।
श्री संतोष रुंगटा, अध्यक्ष, रुंगटा ग्रूप आफ इंस्टीट्यूशन ने अतिथियों और सम्मेलन के सहभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि हमारे इंजीनियरिंग कालेज का आज का दिन स्वर्ण अक्षरों से लिखा जाएगा जहां राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी अपना अधिवेशन सम्पन्न कर रही है। हिन्दी के ख्याति प्राप्त साहित्यकार और अकादमी के अध्यक्ष डॉ. स्वदेश भारती हमें अपने आशीर्वाद से प्रोत्साहित कर रहे हैं। हमारा संस्थान उनके प्रति, युवा संसद सदस्य श्री अभिषेक सिंह, माननीया डॉ. विद्याकेशव चिटको, कवि सुरेंद्र दुबे, श्री सुशील त्रिवेदी तथा सम्मेलन के सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार प्रकट करता है। अकादमी ने हमें यह सुअवसर प्रदान किया, यह अभूतपूर्व अवसर हमें तथा हमारे विद्यार्थियों को प्रेरणा देगा। समापन सत्र का संचालन अकादमी के निदेशक डॉ. सुधीर शर्मा ने सफलता पूर्वक किया। इस अवसर पर इंजीनियरिंग महाविद्यालय के भव्य प्रांगण में सांसद अभिषेक सिंह, कविवर स्वदेश भारती एवं कवि सुरेंद्र दुबे ने वृक्षारोपण किया। श्री रुंगटा द्वारा दिए गए दोपहर भोज के सुन्दर व्यंजनों का स्वाद लेकर सम्मेलन का समापन सत्र समाप्त हुआ। सम्मेलन को सफल बनाने में छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के सहयोग तीन दिवसीय सम्मेलन, प्रेस कांफ्रेंस का कवरेज प्रिंट एवं इलेक्ट्रानिक मीडिया ने प्रमुखता के साथ किया। पत्रकारो के सहयोग के लिए अकादमी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने हार्दिक धन्यवाद दिया।

प्रस्ताव/प्रतिवेदन

28वां अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन, रायपुर, 2-4 अक्टूबर 2015

राष्ट्रपिता की 145वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी, रूपाम्बरा द्वारा आयोजित स्वर्ण जयंती समारोह, 28वां अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन, अंतर्राष्ट्रीय भाषा साहित्य संगोष्ठी, राष्ट्रीय कवि सम्मेलन, सफलतापूर्वक सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में भारत सरकार के मंत्रालयों, विभागों, निगमों, छत्तीसगढ़ शासन, छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग, स्वैच्छिक संस्थानों, केंद्रीय हिन्दी निदेशालय आदि से लगभग 150 प्रतिनिधियों ने सम्मेलन के सात सत्रों में अपनी सहभागिता तथा गम्भीर विचार विमर्श द्वारा सम्मेलन को सफल बनाया। सम्मेलन में भारत की एकता, अखंडता तथा भाषाई सौहार्द्र, हिन्दी को विश्व भाषा, राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने तथा भारतीय भाषाओं के व्यापक प्रचार-प्रसार हेतु निम्नलिखित प्रस्ताव सर्व सम्मति से स्वीकृत किए गए तथा यह विश्वास प्रकट किया कि इन प्रस्तावों पर भारत सरकार तथा छत्तीसगढ़ शासन यथोचित कार्रवाई करेगें।
1)      हिन्दी को विश्वभाषा, राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में स्वीकृति प्राप्त करने के लिए भारत सरकार आवश्यक धन तथा 170 देशों का समर्थन प्राप्त करे। इसके लिए विदेश मंत्रालय यथोचित कदम उठाए जिससे वर्ष 2015-16 में यह कार्य सम्पन्न हो जाए
2)      छत्तीसगढ़ी को प्रादेशिक भाषा के रूप में भारतीय संविधान की 8वीं अनुसूची में शीघ्र शामिल किया जाए।
3)      सरकार को हिन्दी को विश्वभाषा राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने के लिए वे सभी उपाय करने चाहिए जिससे भारतीय जनमानस तथा राष्ट्रभाषा हिन्दी विश्वमंच पर गौरवान्वित हो सके।
4)      हिन्दी पत्राचार को , क्षेत्रों में समान रूप से 100 प्रतिशत कर दिया जाए।
5)      केंद्र के मंत्रालयों, विभागों, उपक्रमों, निगमों तथा अन्य संस्थानों में कार्यालयीन परिपत्रों को केवल हिन्दी में जारी किया जाए।
6)      प्रत्येक मंत्रालय, विभाग, उपक्रम, निगम, संस्थान में उच्च स्तरीय समिति का गठन किया जाए जो प्रशासनिक कार्यालयों में हिन्दी कार्यान्वयन की प्रगति का आकलन करें और मंत्रालय, विभाग, संस्था के प्रमुख को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
7)      भारत सरकार के आर्थिक सहयोग से राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी द्वारा भारतीय भाषाओं से श्रेष्ठ साहित्य का अनुवाद विश्व की पांच भाषाओं में अनूदित, प्रकाशित किया जाए।
8)      हिन्दी की स्वैच्छिक संस्थाओं की अनुदान-राशि बढ़ाई जाए तथा अनुदान का आकलन संस्था के प्रचार-प्रसार के कार्यों के अनुरूप किया जाए।
9)      स्वच्छैकि संस्थाओं के कार्यकलापों के निरीक्षण, कार्यान्वयन, अनुदान प्रक्रिया के लिए  केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के सभी अंचलों के रिक्त पदों को शीघ्र भरा जाए। जिससे संस्थाओं के कार्यों पर प्रतिकूल असर न पड़े।
10)  हिन्दी के श्रेष्ठ साहित्य को सभी भारतीय भाषाओं और विश्व की सात प्रमुख भाषाओं-अंग्रेजी, फ्रेंच जर्मन रूसी, चीनी, अरबी जापानी में अनुवाद कराकर प्रकाशित किया जाए। चूंकि साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट, प्रादेशिक अकादमियां इस काम को नहीं कर रही हैं। राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी सरकार के आर्थिक सहयोग से यह कार्य शीघ्र सम्पन्न करें।
11)   भारत सरकार, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, गृहमंत्रालय त्रिभाषा फार्मूला को शत प्रतिशत लागू करे तथा इसके लिए पाठ्य पुस्तकों को तैयार कराया जाए।

डॉ. स्वदेश भारती    डॉ. रत्नाकर पांडेय   कवि सुरेंद्र दुबे      डॉ.सुधीर शर्मा
(राष्ट्रीय अध्यक्ष)    (मानद अध्यक्ष)   (सम्मेलन संयोजक)   (निदेशक)

असहिष्णुता

स्वतंत्र अभिव्यक्ति धर्म निरपेक्षता, सामाजिक धार्मिक समरसता, समता, न्याय और विकास हमारे संविधान का मूलमंत्र है। परन्तु देश में जो विद्वेशपूर्ण असहिष्णुता का तनाव व्याप्त है, वह हमारी स्वतंत्रता के लिए खतरा है। स्वस्थ राजनीति लोगों को जोड़ती है, तोड़ती नहीं। जो राजनीति देश को तोड़ती है तनाव का माहौल बनाती है, वह हमारे लिए अत्यंत घातक है।

Thursday, 12 November 2015

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं

प्रिय बंधु,



दीपावली की ज्योति-मल्लिका
भर दे जीवन में
आलोक भरा स्नेह, प्यार की सुनहरी भोर
और हो आकांक्षा का विस्तार
चलते जाए आगे और आगे
विजय-यात्रा-पथ पर मंजिल की ओर...!
                         -  स्वदेश भारती

Saturday, 7 November 2015

प्रिय देशवासियों, समाचार चैनलों के प्रभारी,
यह कितनी अजीब बात है कि राष्ट्रीय समाचार चैनल अब विज्ञापन चैनल बन गए हैं। खबरों से ज्यादा विज्ञापन दर्शकों को परोसे जाते हैं। इससे दर्शक ठगे जा रहे हैं और अब पिछले तीन महीने के आंकड़ों के अनुसार 28 प्रतिशत दर्शक समाचार चैनलों से मुंह मोड़ने लगे हैं। भोंडी राजनीति, हत्या, आत्महत्या, बलात्कार जैसी खबरों से चैनल रात दिन चलते हैं और उससे अधिक विज्ञापनों से व्यापारिक मंशा पूरी करते हैं। चैनलों पर संस्कृति, नैतिकता, भारतीयता, राष्ट्रीयता, एकता, अखंडता, सौहार्द्र से संबंधित खबरों का अभाव क्यों है। लगता है वैचारिक विपन्नता से प्रायः सभी चैनल ग्रसित हैं जो देश के लिए बहुत बड़ा खतरा है। आज हमें बाहर की स्वच्छता से बढ़कर अपने अंदर की स्वच्छता पर ध्यान देना अति आवश्यक है।

                                                     -स्वदेश भारती
                                                     साहित्यकार
                                                     राष्ट्रीय अध्यक्ष

                                                     राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी