Saturday, 9 July 2011

हिन्दी संस्मरण, हिन्दी साहित्य के वरिष्ठ कवि अज्ञेय के साथ पहली भेंट

मेरे जीवन में अब तक जो कुछ महत्वपूर्ण घटित हुआ है, उसमें अज्ञेय का स्नेहीय तथा योगदान सर्वश्रेष्ठ है। 1974 में अज्ञेय द्वारा सम्मपादित्य नया प्रतीक में मेरी पांच कविताएं प्रकाशित हुई थी। उसी समय पश्यन्ती में छह कविताएं छपी थी। अचानक अज्ञेय का पत्र मिला कि वे मुझे चौथा सप्तक में सम्मिलित करना चाहते हैं। उन्होंने उदारतावश उन कवियों के नाम भी पत्र में लिख दिए थे, जिन्हें वे चौथा सप्तक में शरीक करेंगे। ये 1975 की बात है। रानीगंज में साहित्य संगोष्ठी थी, उसमें उन्हें मुख्य अथिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। वे दिल्ली से कलकत्ता आए श्री विश्वम्भर नाथ सुरेका के घर पर ठहरे। उन्होंने प्रो. कल्याण मल लोढ़ा को जो उस समय कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग अध्यक्ष थे, फोन किया कि स्वदेश भारती से बात करा दें। मुझे लोढ़ा जी का फोन आया तो मैंने अज्ञेय जी को फोन किया उन्होंने बड़े स्नेह से कहा कि फोन पर तो नहीं यदि आप कल सबेरे यहां आ जाएं और मेरे साथ ही नास्ता करें अपनी कुछ कविताएं भी लेते आएं तो आपके साथ चर्चा करना चाहूंगा। मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। नियत समय सबेरे 7 बजे कई रंगों वाला गुलाब का गुछा लेकर मैं उनसे मिला और उन्हें गुलाब भेंट किए तो वे बड़े प्रसन्न हुए। उनके साथ नास्ता लिया और लगभग डेढ़ घंटे तक साहित्य चर्चा की। उसी समय प्रो. विष्णुकांत शास्त्री आ गए। मुझे वहां देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। मैंने अज्ञेय जी को अपनी कविताओं का पैकेट दिया और विदा लेकर लौटा तो मन नई अनुभूति से भर गया था। आनंद तरंग में दिन भर ओलोड़ित होता रहा। जिन अज्ञेय से लोग उनके मौन के कारण मिलने से कतराते हैं और अज्ञेय किसी को घास नहीं डालते कोई कुछ भी वे मौन रहते। वही अज्ञेय मुझे चौथा सप्तक में विशिष्ट 7 कवियों में शरीक कर रहे हैं।  उस पहली मुलाकात में अज्ञेय ने मेरे बारे में काफी कुछ जानने के लिए मेरे परिवार, नौकरी, लखन के बारे में कई प्रश्न पुछे। फिर बोलें नया प्रतीक में आपकी कविताएं छपी हैं। कई पाठक मित्रों ने उनकी प्रशंशा की है। यूं तो मैं आपकी कविता का पाठक रहा हूं।

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