Monday, 11 July 2011

अज्ञेय के साथ काव्य-संवाद

24 दिसम्बर 1982 की बात है। अज्ञेय एक कार्यक्रम में कलकत्ता आए तो फोन किया- सबेरे मिल सकते हैं क्या? मैंने कहा-प्रणाम गुरुवर, जरूर मिलूंगा। कितना बजे ठीक रहेगा? अज्ञेय ने कहा- 8 बजे आ जाएं। मैं नियत समय पर रामकृष्ण मिशन इंटरनेशनल हॉस्टल, गोलपार्क पहुंचा। अज्ञेयजी जिस सूट में ठहरे थे मैने घंटी बजाई, दरवाजा अज्ञेय जी ने खोला। उनके साथ ईला डालमियां भी थीं। शायद उन्हें कुछ अटपटा सा लगा। क्योंकि वे भीतर के कमरे में चली गईं। अज्ञेय को उनके व्यवहार से कुछ अजीब सा लगा होगा। ऐसा मैंने अनुभव किया। अज्ञेय ने कहा कि आपने नास्ता लिया होगा। न लिया हो तो मेरे साथ कर लें। मैने कहा जी मैने नास्ता लिया है। काफी पी लूंगा। नास्ता- काफी के बाद फिर चर्चा चलने लगी। अज्ञेय ने पूछा आपको चौथा सप्तक कैसा लगा? मैने कहा कि काफी अच्छा लगा, परन्तु उसकी उतनी आलोचना नहीं हो सकी, जितना अन्य सप्तकों को हुई है। इस पर उन्होंने कहा- हिन्दी में गुटबाजी के कारण सर्जनात्मक साहित्य उभरकर सामने नहीं आ पा रहा है। और जो अच्छा लिख रहे हैं वे दलबंदी के कारण बेहद आहत और उदासीन हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि आप तीसरा सप्तक पढ़ें और विचार करें कि उसकी तुलना में चौथा सप्तक  किस श्रेणी में आता है। मैंने अज्ञेय जी से पूछा- आपने सप्तकों की योजना जब बनाई होगी, तब आपके दिमाग में यही रहा होगा कि हिन्दी के नए कवियों को प्रकाशित कर उन्हें प्रोत्साहित किया जाए। किन्तु सप्तकों में शामिल कुछ कवियों ने यह भी कह दिया है कि हमने तो अज्ञेय को धन्य किया।  मेरी कविताएं ही इसका प्रमाण हैं। अज्ञेय जी मुस्कराए कुछ बोले नहीं। कुछ देर मौन के बाद उन्होंने कहा कि काव्य लेखन एक साधना है और जब साधना से जुड़ेंगे तभी काव्य से भी जुड़ेंगे।  ईलाजी अंदर से आईं और अज्ञेय जी से कहा- क्या आपको देरी नहीं हो रही है। जाना है, मुझे लगा कि अज्ञेय से विदा लेकर चलना चाहिए। घर आकर मैंने तीसरा सप्तक को पढ़ा जिसमें प्रयाग नारायण त्रिपाठी, कीर्ति चौधरी, मदन वात्सयायन, केदारनाथ सिंह, कुवंर नारायण तथा विजय देव नारायण शाही शामिल किए गए हैं।
अज्ञेय ने तीसरा सप्तक की भूमिका में लिखा है- काव्य के अस्वादन के लिए कवियों की सामाजिक प्रवृति, राजनैतिक सरोकार, भाषा, छन्द के विषय से ऊपर उठकर कवि कर्म के प्रति गम्भीर उत्तरदायित्व बोध अपने उद्देश्यों में निष्टा और उस तक पहुंचने के साधनों के सदुपयोग की लगन होनी चाहिए। यह स्वीकार किया जाए कि नये कवियों में ऐसों की संख्या कम नहीं है। जिन्होंने विषय वस्तु समझने की भूल की है और इस प्रकार स्वयं भी पथभ्रष्ट हुए हैं एवं पाठकों के नई कविता के बारे में अनेक भ्रांतियों के कारण बने हैं। नकलची कवियों से कहीं अधिक संख्या और अनुपात नकली आलोचकों का है - धातु उतनी छोटी नहीं है, जितनी की कसौटियां ही छोटी हैं। नकलची हर प्रवृत्ति के रहें हैं और जिनका भंडाफोड़ अपने समय में नहीं हुआ, उन्हें पहचानने और फिर समय की दूरी अपेक्षित हुई है।

न तो 'द्विवेदी'  युग में नकलचियों की कमी रही, न छायावाद युग में और नहीं (यदि इस संदर्भ में उनका उल्लेख भी उचित हो, जिनकी उपलब्धि प्रयोगवादी संप्रदाय से विशेष अधिक नहीं रही, जान पड़ती है।) प्रगतिवाद ने कम नकलची पैदा नहीं किए।  अज्ञेय का आग्रह था कि हमें किसी भी वर्ग में उनका समर्थन या पक्ष पोषण नहीं करना है, परन्तु यह मांग भी करनी है कि उनके अस्तित्व के कारण मूल्यवान की उपेक्षा न हो, असली को नकली से न मापा जाए।  अज्ञेय का यह भी मानना था कि साधना, अभ्यास और मार्जन का ही दूसरा नाम काव्य है। बड़ा कवि वाक्यसिद्ध होता है और भी बड़ा कवि रस सिद्ध होता है। आज वाक्य शील्पी कहलाना अधिक गौरव की बात समझा जाता है क्योंकि शिल्प आज विवाद का विषय है। यह चर्चा उत्तर छायावाद काल से ही अधिक बढ़ी, जबकि प्रगति की सम्प्रदाय ने शिल्प, रूप, तंत्र आदि को गौण कहकर एक ओर ठेल दिया और शिल्पी एक प्रकार की गाली समझा जाने लगा। इसी वर्ग ने नई काव्य प्रवृत्ति को यह कहकर उड़ा देना चाहा कि वह केवल शिल्प का रूप विधान का रूप विधान का आंदोलन है, मेरा फार्मेलिज्म है। अज्ञेय का यह भी मानना रहा कि प्रयोगवादी और प्रगतिवादी कवियों में परस्पर कशमकस के कारण नई कविता कमजोर हुई है। नई कविता की  प्रयोगशीलता का पहला आयाम भाषा से संबंध रखता है। निःसंदेह जिसे अब नई कविता की संज्ञा दी जाती है, ये भाषा सम्बन्ध प्रयोगशीलता को वाद की सीमा तक नहीं ले गई, बल्कि ऐसा करने को अनुचित भी मांनती रही है। यह मार्ग प्रपद्यवादी ने अपनाया, जिसने घोषणा की कि हर चीज का एक मात्र सही नाम होता है और वो (प्रद्यवादी व्यक्ति) प्रयुक्त प्रत्येक शब्द और छंद का स्वयं निर्माता है। शब्द व्यक्तिगत प्रयोग भी है और प्रेषण का माध्यम भी बना रहता है, दुरुह भी होता है और बोधगम्य भी।

मैंने अज्ञेय जी के तीसरा सप्तक पर उन्हें लम्बी टिप्पणी भेजी थी, जिसके उत्तर में उन्होंने तीन वाक्य लिखें। जिनमें मुख्य था- आपकी सोच सही है। काव्य के बारे में नए सिरे से चिन्तन, लेखन की जरूरत है।

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