Friday, 15 July 2011

संबंध

पल छिन का पल छिन से
दिन का दिन से
मास प्रति-मास का, वर्ष प्रति-वर्ष से
ऋतुओं का ऋतु-परिवर्तन से
वत्सर का नव-संवत्सर से
शताब्दी का शताब्दियों से
युग का युगों से
धरती का सूर्य से
चन्द्रमा का धरती से
ग्रहों, नक्षत्रों का ब्रह्माण्ड-अन्तरिक्ष से
कितना अटूट नाता है
और शायद इसीलिए
अकल्पित आकांक्षाओं, दुःखों और संत्रास के बीच
हमारा दिन क्षण-क्षण बीत जाता है
कण प्रति कण का नाता है स्थावर जंगम से
और मनुष्य का मनुष्य से संबंध-
समुद्र की लहरों जैसा बनता टूटता है
हृदय का जिया हुआ अवशेष-
अस्तित्व-तट पर विखरता है
नित नूतन परिवेश सर्जित करता है
हृदय -सिक्त-कणों को
नव-लहरों के नित नवीन आलोड़न से
आप्लावित कर खालीपन भरता है
और इसीलिए
हमारी आंखों में, हृदय में
चतुर प्रेम, चित्रकार की तरह
वसन्त के विविध फूलों के रंगों से
नव संबंधों के नए-नए चित्र सर्जित करता है।

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