Thursday, 14 July 2011

रात का अंधकार

रात का अंधकार
धरती की हथेली पर लिख जाता
प्रातः की सतरंगी-कथा
स्वप्निल-सुख की रेत
सबेरे की मुट्ठी में भरता हुआ
पूरब से पश्चिम की ओर चला जाता...

उजाले में भी हंसी और उल्लास के बीच
अंधकार अपनी बंद पलकों के आर-पार देखता
बुर्ज पर खड़ी पीली चांदनी का पीला चेहरा
कटते समय-पुलिन-तट-पर
अभिसार-सुख
समय-प्रवाह में
ढहता अस्मिता का रेत-घर
संघर्षरत चाह में
संजो नहीं पाता इतिहास कभी भी
जीत-हार, अभ्युदय, पतन, पतझर और मधुमास की अन्तर्व्यथा
रात का अंधकार दिन प्रति दिन
शाम की हथेली पर लिखता जाता
संसृति की व्यथा-कथा।

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