Wednesday, 1 August 2012

प्रेम का अवसाद

प्रेम के अवसाद का कुहासा जब घना होता है
मेरी आंखों में डरी हुई बिल्ली का स्वरूप उतर आता है
देखता हूं कटीली झाड़ियों के बीच फंसी

हिरन की असहाय-भयाक्रांत आंखों में भय ठहर जाता है
भागता है घने जंगल के आरपार
मस्तिष्क घायल हारिल पाखी की तरह
 खोजता आश्रय किसी घने वृक्ष की डालियों में
तब अस्तित्व संवाद जड़ता और सन्नाटे की कथा सुनाता है
असमय प्रदीप की लौ तेज हवा में कांपता है
दुर्निग्य अंधकार भरे आंगन में
स्मृतियां उन्मुक्त नाचती है
पीड़ा की कसक मेरा हाथ पकड़ करती है
समय किसी का नहीं होता
और तब अजाने स्नेह-मोह का यूथभ्रष्ट बादल
मस्तिष्क के आकाश में उमड़ता घुमड़ता
अपनी जलवृष्टि से आंखें भिंगोता है
तब प्रेम के अवसाद का कुहासा
और भी घना, अरुप, अपारदर्शी हो जाता है।
                                     कोलकाता
                                     05.05.12




प्रेम के कितने रूप
प्रेम के कितने रूप देख लिया
अंधेरे और उजाले में तिल तिल कर जिया
कर्म और आस्था की थाती थामे
प्रवंचना की कंटीली राहों को पार किया
प्रेम के विविध चित्र देख लिया....

सोच की नदी जीवन पर्यंत प्रवाहित होती
अनन्त से मिलकर अपना अस्तित्व खोती
जब तक वह बहती, लहरों के उद्वेलन सहती
विषम स्थितियों के कटाव, छटाव झेलती
अपनी गति की तईं संदेश देती, कहती-
दुःख की सर्दीली-पीड़ा को असमय की आग में सेको
जीवन के उच्छिष्ट को निस्पृह भाव से फेंको
सुरक्षित रखो उन स्मृतियों को जिन्हें समय ने दिया
प्रेम के अनेक रूप देख लिया....

अचानक ही विसर्जित होते रहे
आनन्दोल्लास के क्षण
प्रेम नहीं मानता आधा, संकुचित आत्म समर्पण
आत्मीय-अनात्मीय संबंधों को
अपना सर्वस्व किया अर्पण
विश्वास की मुट्ठी भर धूप
दुर्दिन के झरोखे से छनकर आती रही
और यह अहसास कराती रही -
जैसा किया, वैसा ही तो जिया
प्रेम के अनगिन रूप देखा लिया....

                           कोलकाता
                           07.05.12



कविगुरु रवीन्द्रनाथ की 15वीं जयंती पर हार्दिक अभिनन्दन
हे  कवि! तुम्हारी तरह मैं जीवन पर्यंत शब्द फरोश बना
किए बहुत सारे काव्य-छन्द-व्यूह की रचना
कभी शरद का मेघ बना, कभी पपीहे की प्यास
कभी तपती दोहरिया का श्वेद-विन्दु बना झुलसाती धूप
कभी मेघ मल्लिका और विद्युक का रौद्र-रूप
वन-उपवन जब पहली वर्षा की बूंदे पाकर
आत्मविह्वल होते हैं जन-जन में उमड़ता आनन्दअनूप
धरती होती आह्लादित देखकर सघन-घन-घटा
कण-कण में उमंग-नव वितान तमकी छठ
कितने सारे विगलित संबंधों को तोड़ा
नए नए भाव शब्द छन्द से नाता जोड़ा
कभी हंसी फूट पड़ी दुग्ध के निल झरनों जैसी
कभी साधा निर्मौन, आत्म-दाही दुःख की कसौटी
मुट्ठी में भर लिया अतीत की रेत
और अन्ततः वही बनी घनीभूत पीड़ा आत्म हितैषी
इतना दूर तक चल लिया, आगे भीच लूंगा खाली मुट्टी
कितने सारे भेष बनाए, रचे नए-नए खेल
जिए अर्थहीन संबंधों के प्रतिक्षण मेल-उमेल
कभी बना गुरु दक्षिणा की प्रवंचना एक लव्य का अंगूठा रक्तसना कटा
कभी बना कौरवी-दुर्दिन, कभी पांडवों का राज-वर्जन
पांडवों की तरह गिरि वन-जंगल-पर्वत-गह्वर में छिपने के क्षण
कभी बना थकी हारी भूखी प्यासी कुन्ती, द्रौपदी,
और पांडु-पुत्रों की असहाय-पागल यंत्रणा
कभी बना इतिहास की आहत-कथा-सूत्र की शब्द छन्दहीन कल्पना
स्मृतियों को सीने में दबाए झेला संत्रास पाषाण-निश्वास
ऐसे में कितने सारे शब्द, छन्द, गीत जना
हे कवि! तुम्हारी तरह मैं भला कहां शब्द फरोश बना।

                                                  कोलकाता
                                                  08.05.2012


एक बूंद की व्यथा-कथा
एक बूंद टपकी
किन्तु वह स्वाती की बूंद नहीं थी
प्राण व्याकुल  प्यासे पपीहे के लिए नहीं थी
वह बूंद भूखी बूढ़ी ग्राम्या की थी
जो बासी कड़ी रोटी पर गिरी
और उसने उस एक बूंद को
मक्शन की तरह चुपड़ ली
और खांसने लगी जब रोटी गले में अटकी
फिर वह बूंद नहीं टपकी
क्योंकि उसे लग गई थी अंतिम झपकी


                                                    कोलकाता
                                                  09.05.2012


भयाक्रांत पीड़ा-स्वर

क्यों इतनी हत्याएं हो रही हैं इस धरती पर
हिंसा-प्रति हिंसा की ज्वाला जल रही धू-धूकर
आदमी के भीतर बाहर आदमी नहीं रहा
पैशाचिक हवा बह रही, स्वर हो रहे बस्वर
इस नराधम खेल में निरीहों का कितना रक्त बहा
किसानों के पौरूष और धैर्य ने कितना कुछ सहा
रोटी के लिए चाहिए अनाज
अनाज के लिए उर्वर भूमि, खाद, पानी, मौसम,
हवा की समरसता, किसान की मेहनत
किन्तु आज हमें अपने किसानों पर कितना रहा नाज
सब कुछ, सारा संबंध धरती की
शस्य-श्यामला से टूट रहा विश्वास
सन्ता की कुर्सी पर बैठा आदमखोट का भाग्य लूट रहा
संगीनों के आतंक के बीच आन्द भेरी नहीं बजती
नाही होता है कोई उन्नयन, विकास
पहले हम ठहरें, सोचें तब आगे बढ़े
अहिंसा, शांति, प्रेम, समरसता की सीढियां चढ़ें
करना है हमें नए सिरे से आत्मशोध
तभी ले सकते हैं निरंकुष स्वेच्छाचारी सत्ता से प्रतिशोध
अन्यथा सब कुछ चलता रहेगा- हत्या आत्महत्या, लोभग,
आतंक, भ्रष्टाचार, बलात्कार इस धरती पर
और मैं संवेदना के सितार पर उकेरता रहूंगा भयाक्रांत पीड़ा स्वर।

                                                    कोलकाता
                                                    10.05.2012