Sunday, 16 February 2014

राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता की परिभाषा

किसी भी स्वाधीन, सार्वभौम राष्ट्र के चार मूलभूत आधार होते हैं।
1.       संविधान के प्रति पूर्ण निष्ठा
2.       राष्ट्रगान के प्रति आस्था
3.       राष्ट्रध्वज के प्रति समर्पण

4.       राष्ट्रभाषा के प्रति प्रतिबद्धता
इन चारों मूलभूत राष्ट्रीय सिद्धांतों से ईमानदारी, आस्था, निष्ठा और पूर्ण समर्पण के साथ जो देश का नागरिक अपने को जोड़ता है वही राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद से जुड़ता है।
भारत की सभी राजनैतिक पार्टियों, दलों, मंचों से जुड़े नेताओं तथा आम आदमी को इन चारों आधारभूत सिद्धांतों से जुड़ना जरूरी है। धर्म, भाषा, प्रांतीयता, क्षेत्रीयता, वर्ण, जाति इत्यादि की संकीर्ण मनोवृत्ति से ऊपर उठकर राष्ट्रीय अस्मिता, स्वाधीनता, राष्ट्र गौरव, एकता और अखंडता के लिए राष्ट्रीय धारा से जुड़ने की आवश्यकता है जो आज के समय की मांग है। आजादी के 65 वर्षों बाद भी देश को चौथा मूलभूत आधार यानी राष्ट्रभाषा हिन्दी नहीं मिली। हमारी राष्ट्रभाषा अंग्रेजी नहीं हो सकती जो संविधान के आठवें अनुच्छेद में शामिल राष्ट्रीय भाषा नहीं है। कोई अन्य भारतीय भाषा भी यह स्थान लेने में सक्षम नहीं है। हिन्दी देश के 80 करोड़ लोगों की भाषा है। और वहीं राष्ट्रीय एकता की कड़ी है। वही स्वधीनता की भाषा रही है। राष्ट्रसंघ की भाषा हिन्दी ही बनने के योग्य है। हिन्दी लगभग 194 देशों में पढ़ाई जाती है। 128 विश्व विद्यालयों में हिन्दी का अध्ययन-अध्यापन होता है। कई देशों में उनकी भाषा के साथ हिन्दी भी उस देश की राष्ट्रभाषा घोषित है।
राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने के लिए लगभग 150 करोड़ रुपए की राशि राष्ट्रसंघ (यूएनओ) को देना जरूरी है।

सत्ता की कुर्सी पर बैठे हुए तथा राजनैतिक दंगल के सर्जक, दर्शक राजनेतागण राष्ट्रभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए अपने चुनाव घोषणा पत्रों में यथोचित प्रावधान रखें तथा हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देने तथा राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने के लिए कारगर कार्रवाई करें। इसके लिए जो पार्टी या दल सबसे आगे आए उसे ही भारतीय लोकतंत्र की राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता प्रदान की जाए तथा उसे ही देश की बागडोर थामने के लिए जनता अपना समर्थन दें। ऐसी ही पार्टी भ्रष्टाचार से लड़ने, राष्ट्र के सर्वांगीण विकास तथा भाषा, संस्कृति को आगे बढ़ाने में सक्षम होगी।

-        - स्वदेश भारती
साहित्यकार एवं अध्यक्ष
राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी
सम्पादक - रूपाम्बरा 


Sunday, 2 February 2014

दो चेहरे

मेरे जुड़वां प्राण
उन्हें कैसे पालूं!
एक है भीतर जैसा
बाहर नहीं दिखता वैसा
दूसरा है बाहर जैसा
भीतर नहीं वैसा
विचित्र है उनकी समरसता
ऐसे में उन्हें कैसे संभालूं
मेरे जुड़वां प्राण
उन्हें कैसे पालूं।

पहले को चाहिए सुनहरी मंजिलें
और दूसरे को चाहिए अस्तित्व समुद्र-अन्तर्मन
जिसके किनारे बैठे
देखा करें उद्वेलित लहरों का विसर्जन!

पहले को चाहिए प्रेम का संवरण
और दूसरे को प्रेम की परिभाषा
नीली घाटियां, रजत रश्मियों वाले पर्वत
बसन्त में खिले फूलों की हंसी
आदिम आकांक्षाएं-
कि कितना आकाश
बांहों में भर लूं
मेरे जुड़वां प्राण
उन्हें कैसे पालूं।

पहला अपनी बात नहीं कहता
सोचता अंदर-ही-अंदर
बनाता बहुत सारे मनसूबों के रेत -घर।
और दूसरा सोचता फिर उसी
सोच के अर्थ को नकारता
पहला असहाय हो जाने पर आंहें नहीं भरता, न ही कराहता
एक सपने से टूटकर दूसरे से जुड़ने का क्रम संजोता
पर दूसरा बिलखकर अपनी ही बांहों में
माथा छुपा लेता
एक भयानक मौन-चीख के बीच
नई आशाएं सर्जित करता कि प्राणों के कैन्वस पर
कितने रंग सजा लूं
मेरे जुड़वां प्राण
उन्हें कैसे पालूं।

- स्वदेश भारती 
(भारतीय कविताएं 1987-88 (ज्ञानुपीठ प्रकाशन) से साभार, उद्धृत)