Monday, 27 May 2013

प्रथम वर्षा

भींगते हैं पेड़, पौधे,
सड़क, बस्ती, गगन-चुम्बी अट्टालिकाएं
भीगते हैं दिशासूचक मील के पत्थर
भीगते गन्तव्य के सब रास्ते
भींगती आशा-लता वट-वृक्ष में डाले हरित गलवाहियां
भींगती सोई अकेली झील
भींगता है खेल का मैदान
भींगती है नगर की वीरानियां,
यह सबेरे का पहर
सूरज अभी क्षितिज के सतरंग-विस्तर पर पड़ा
जमुहाईयां लेता, बदलता करवटें
बस अभी जागने वाला है
जरा-सी देर है
फिर दिन आज के इतिहास से जुड़ जाएगा
भले ही सड़कें भींगें
स्वप्न-भींगे आत्म-सत्ता
समय की गति रौंद डालें
भींगते तब भी रहेंगे
प्राण-मन में उगे पौधे
हरे भरे जीवन की व्यथा का अंत होगा
रहेगा निःशेष फिर भी
प्राण-श्रुतियों में बंधा इतिहास
समय-अस्तित्व का विश्वास।

कलकत्ता,
26 जून 1992

Season's First Showers
The Flora
the road, the town, the sky all soak
the milestones and tracks to tread steps
The creepers of hope embracing the bunyan
with its green tender arms are drenched
The lake sleeping alone steeps
The play round is soaked
and the deserted places the city is filled up with railwater
It's morning
The day held to the recent history
The sun even now lying on the myriad-hue bed
tuming sides, morning is about to
wake-up just after some moments,
though the dreams wet but my self-existence
Tramples on the speed of time

Still the grwon up plants
my mind-vital will be soaking and
the agony of fruitfully
green life will end but
the remainder of oral history and
hearsay evidence is to survive
as the confidence of mind's existence

Calcutta
26 June, 1992

Friday, 24 May 2013

नाचता आकाश

नाचता आकाश पंख पसारे
काले, सफेद बादलों का राजकीय पोशाक पहने
डूबते हुए सूर्य का लाल-मुकुट मस्तक पर संवारे
छाया-पथ-यात्री तारों ग्रहों का कुंडल,
नक्षत्र-हार पहने एक से एक न्यारे
नाचता आकाश पंख पसारे।

नाचता है आकाश मदहोश
तारावलियों के साथ
हाथ में हाथ डाले
पग से पग बांधे
एक दूसरे की बाहों के सहारे
नाचता आकाश उन्मुक्त पंख पसारे।

और हम अपनी थकी हुई घुटनभरी संत्रस्त शाम के
अवशिष्ट दुःखों को पीड़ा लपेटे, मस्तिष्क के इर्द-गिर्द
जब घर पहुंचते हैं
तब लगता है
कि कितना कुछ पाए
कितना कुछ गंवाए
और यह मानते रहे
कि सर्जित, विसर्जित होता सुख, असुख
उत्थान, पतन, नियति के सहारे
नाचता है आकाश क्षण-प्रति-क्षण
नया संदेश देता पंख पसारे।

अहमदाबाद,
02, अप्रैल 1999


Dancingh Space
The space dances
with its wings spread wide
Clad in black and white royal robes
the red crown of the setting sun on its head
wearing pendents of stars and planets in the ears
travelling on the mily way
decked with necklaces of heavenly bodies
all unique one than the other
the space dances with its wings spread wide

The space dances drunk among the havenly beings
hands within hands and the feet in rhythm
supporting each other with their arms
the space dances with its wings spread wide.

And we reach home
fatigued and tired in the weary evening
wrapped in the pain and our sorrows
with minds decked with worries
Then we feel whatever we gained and lost
Assuming that whatever sorrows repaired loss
rise and fall of fate we had
the space dances with its help wings spread wide
Every day, every moment-moment after moment
gives new messages renewed and nothing to hide.

Ahmedabad,
2 April, 1999

मेट्रो रेल

रात का निःशब्द अंधकार
चौंक उठता सड़क के नीचे
धरती कटती। धरती के नीचे
रेल-सुरंग बनती। धरती कटती।

मशीनों का प्रचण्ड शोर
रात का अंधकार चौंक उठता
फुटपाथ टूटता, सड़क फैलती
भूगर्भ सुरंग बनती। धरती कटती।

ऊंची अट्टालिका का सहमी खड़ी पीली चांदनी
दिशाओं को कंपाती प्रतिध्वनियां
कर्णभेदी शोर
सोये फुटपाथ पर लेटा
रद्दी कागज बेचने वाला छोकड़ा
आंखें मिचमिचाता जग उठता
यह तो भोर नहीं रात का है तीसरा पहर
सोता शहर। गरजता गजर
शब्द जागते, सोते अर्थ
प्रतिध्वनियां भागती हताशा प्रतिध्वियों  से
आश्रय मांगती महानगर के बीच
मशीनों का प्रचंड शोर गूंज उठता
गजर गरजता। फुटपाथ कटता। सुरंग बनती
उम्र की तरह धरती कटती।

कलकत्ता,
30 नवम्बर, 1983



Metro Railway
The night's silent darkness
I shocked by dented the road
The earth underground is being drilled
The metro-rail is being built
A tunnel for a new rail system under construction is built
beneath is in the womb of earth

Even the night's darkness, shocked
Foot paths are broken. The Earth beneath is cut
under the cover of terrible noise
the road widens the earth is frightened

The yellowish shivering moon stands on
the high-rise structures
The unbearable echoes pierce the ears
The sleeping newspaper-boy hurriedly
awakens with eyes blinking exclaims
Oh! this is not early-morning
It's the hour after midnight only.
the metropolis is embraced by deep slumber
In this city of madding crowd words awake,
meaning sleep
Echoes are running away from, furious sound
The earth cuts like our aging.

Calcutta,
30th Nov. 1883

Thursday, 23 May 2013

प्रतीती

वे आए और बैठ गए बेंच पर
एक दूसरे के करीब
मैंने हरी घास का एक तिनका
होठों के बीच रख लिया।

वे बातों में रम गए
बाहों में बंधे
झुके बरगद के नीचे
और मैंने घुमड़ रहे भावों को नंगा कर
तनाव की झाड़ी में फेंक दिया।

वे बाहों में बंधे बैठे थे
अधलेटे
मौन की झाड़ी कांपी फिर स्थिर हुई
मैंने
सूनी आंखों में भर लिए
सान्ध्याकाश के भटकते मेघ
दूर एक पंछी अकेला
इस छोर से उस छोर तक उड़ता हुआ
चला गया
प्रेम निर्मौन का करता अभिषेक।

कलकत्ता
24 अगस्त, 1973




Experiencing the sensitivity of love
Both came there and sat on the bench
Close to each other, unmindful of others
I plucked a leaf of the green grass
and placed it in between my lips.

They forgot all else, absorbed in their talks
In each other's arms
under the banyan tree
And I stripped my crowded feelings,
threw them in the bush of tension.

They both were sitting arms-in-arms
half lying
The bush of silence trembled
and then stabled itself again
I filled up my eyes with wandering clouds
in the evening sky
In the far of space a solitary bird
flew from this end to that end
the bird lost itself from the path of my gazing,
Perhaps the bird was paying
royal salute to the soundless
Love.

Eden Garden's- Calcuta
24 Aug. 1973

Wednesday, 22 May 2013

Swadesh Bharati: प्यारे देश

Swadesh Bharati: प्यारे देश: ऐ मेरे देश! प्यारे भारत देश! कितने युग, काल से तू देता आया, कुर्बानियां धर्म के लिए, मनुज्त्व के लिए शांति के लिए, स्वतंत्रता के लिए ...

प्यारे देश

ऐ मेरे देश!
प्यारे भारत देश!
कितने युग, काल से
तू देता आया, कुर्बानियां
धर्म के लिए, मनुज्त्व के लिए
शांति के लिए, स्वतंत्रता के लिए
हिंसा के अनियंत्रित उन्मादके विरुद्ध
विश्वमंच पर लगाता रहा आवाजें
तू आदमखोर, संकुचित, अभियंत्रित
स्वार्थी तत्वों के बीच
अपनी अस्मिता की
धवस्त होती नीव को देखता रहा
दुखी आंखों से
अवश, लाचार, निरुपाय
संघर्षरत रक्त-स्नात आवाजों को
सुनता रहा असहाय
तुम्हारे इर्द गिर्द घिर गया है
निर्मौन का कुहासा
अनुत्तर-उत्तर के बीच खामोश
मन्दिर-मस्जिद गिरिजा के प्रश्नों से
धर्मनिर्पेक्षता, धर्मसहिष्णुता के ढहते मूल्यों के बीच
ऐ मेरे देश, तुम इसी तरह क्षत-विक्षत
अस्तित्व की मर्यादा के नए-नए अध्याय रचते रहोगे
अनन्त काल से
अनन्त काल तक।

इलाहाबाद,
10 दिसम्बर, 1992




Dear Country
O' my dear country
dear Bharat Desh
from time immemorial
Yo've been giving sacrifices
at the alter of religion
for humanity and
For freedom, and peace
Against unrestrained mindless
madness of violence and tyranny
you never shirked from raising your voice
at the global platforms
although watching the destruction
of the foundation of your existence and mankind
Amidst predators, blood suckers of humanity
Promoters of their vested interests
You, an apostle of peace and amity
Looked on helplessly being destroyed your identity
with powerless, compelled, helpless look
and listening to voices of struggles soaked in bloodbath
tormented by the cacophony of sounds.
and resoureceless against the noisy mist around
silent amidst the answer and non answers
to the porblems, the mosque, the churches, the temples
values of tolerance of co-existence
being destroyed
O! my dear country, you've created
ever-new chapters for the dignity of
the sore and wounded human existence
've been doing the from the time immemorial
And shall continue doing it till the time infinite

Allahabad (UP)
10th Dec. 1992

Saturday, 18 May 2013

प्यार की स्नेहिल डोरी


सुरेन्द्र तिवारी के आकस्मिक निधन पर आयोजित तेरहवीं के अवसर पर श्रद्धांजलि।

चले गये हे सखा बन्धु
इस तरह अकेला छोड़कर
अपनों से जो बांधी थी
मजबूत प्यार की स्नेहिल डोरी
चले गये तुम अकस्मात उस डोरी को भी तोड़कर
चले गये हे सखा बंधु हम सबको आहत छोड़कर

याद करेंगे तेरी करनी
शब्दों से यारी बहुवर्णी
याद करेंगे तेरी लेखन शक्ति-साधना जीवन भर

छोड़ गए परिवार तड़पता बिना बच्चे घर निःश्वर
ईश्वर से हम करें प्रार्थनारहे लेखकी अजर-अमर
चले गये हे सखा बन्धु इस तरह अकेला छोड़कर
                                                                           -          स्वदेश भारती
बैंगलोर
18.5.2013

मैं तेरहवीं पर आंख के आपरेशन के कारण दिल्ली- घर नहीं आ सका इसका हार्दिक दुःख है। परिवार के सभी सदस्यों को मेरी आंतरिक संवेदना तथा दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना तथा भावभीनी श्रद्धांजलि।
-          स्वदेश भारती

प्यार की स्नेहिल डोरी


सुरेन्द्र तिवारी के आकस्मिक निधन पर आयोजित तेरहवीं के अवसर पर श्रद्धांजलि।

चले गये हे सखा बन्धु
इस तरह अकेला छोड़कर
अपनों से जो बांधी थी
मजबूत प्यार की स्नेहिल डोरी
चले गये तुम अकस्मात उस डोरी को भी तोड़कर
चले गये हे सखा बंधु हम सबको आहत छोड़कर

याद करेंगे तेरी करनी
शब्दों से यारी बहुवर्णी
याद करेंगे तेरी लेखन शक्ति-साधना जीवन भर

छोड़ गए परिवार तड़पता बिना बच्चे घर निःश्वर
ईश्वर से हम करें प्रार्थना, रहे लेखकी अजर-अमर
चले गये हे सखा बन्धु इस तरह अकेला छोड़कर
                                                                           -          स्वदेश भारती
बैंगलोर
18.5.2013

मैं तेरहवीं पर आंख के आपरेशन के कारण दिल्ली- घर नहीं आ सका इसका हार्दिक दुःख है। परिवार के सभी सदस्यों को मेरी आंतरिक संवेदना तथा दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना तथा भावभीनी श्रद्धांजलि।
-          स्वदेश भारती

Wednesday, 8 May 2013

शोक संदेश


सुप्रसिद्ध कहानीकार, आलोचक एवं संपादक श्री सुरेन्द्र तिवारी के आकष्मिक निधन पर राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी एवं रुपाम्बरा के सभी सदस्य हार्दिक संवेदना प्रकट करते हैं।
         इस निधन से अकादमी की जो क्षति हुई है उसे भर पाना बहुत मुश्किल है।
श्री सुरेन्द्र तिवारी रूपाम्बरा के प्रारम्भिक अंकों के सह-संपादक तथा रूपाम्बरा परिवार के 50 वर्षों से सहयोगी रहे। वे राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी के सचिव थे तथा अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलनों के संचालन भी किए। वे अकादमी के एक स्तम्भ थे। उनके चले जाने से अकादमी तथा रूपाम्बरा परिवार अत्यंत दुःखी है। श्री तिवारी की आत्मा की शांति के लिए हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं।

  -          स्वदेश भारती एवं
 अकादमी तथा रूपाम्बरा परिवार

Monday, 6 May 2013

एक विचार


चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री पद के लिए किसी भी पार्टी या दल द्वारा  अपना नेता मनोनीत करना असंवैधानिक

                                                            – स्वदेश भारती, (सुप्रसिद्ध लेखक, कवि)


भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक लोकतांत्रिक प्रजातांत्रिक देश है। संसदीय चुनाव में बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी या दल के संसद सदस्यों द्वारा बहुमत से एक नेता का चुनाव होता है वहीं संसद में उस पार्टी का नेता होता है। यदि पार्टी को संसद में बहुमत प्राप्त है तो चुने गए नेता की प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी घोषणा करती है। राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद ही नेता सरकार बनाता है और कैबिनेट का चुनाव कर  उसकी घोषणा करता है। ऐसे कैविनेट को राष्ट्रपति मान्यता देते हैं और शपथ दिलाते हैं। अमरीका, फ्रांस, जर्मनी तथा अनेकों यूरोपीय एशिया और अफ्रीकी देशों में राष्ट्रपति पद का मनोनय प्रमुख पार्टी करती है। वह चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बनता है और अपनी कैबिनेट बनाता है।
अतः चुनाव से पूर्व किसी पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना भारतीय संविधान की मान्यताओं तथा संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली के विरुद्ध है। यह स्मरणीय होना चाहिए कि हमारे देश में राष्ट्रपति द्वारा शासित लोकतांत्रिक प्रणाली नहीं है। जहां राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार घोषणा की जाती, बल्कि संसदीय है। जहां पहले से प्रधानमंत्री थोपा जाना संविधान तथा जनता की भावनाओं के विपरीत है। सभी पार्टियों और नेताओं को संविधान के अनुरूप ही आचरण करने में लोकतंत्र मजबूत होगा।
-          स्वदेश भारती
उत्तरायण
331,पशुपति भट्टाचार्य रोड,
कोलकाता- 700 041
मोबाइल – 9831155760
ईमेल – editor@rashtrabhasha.com
Blog : bswadeshblogspot.com

Swadesh Bharati: चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री पद के लिए किसी भी पार्...

Swadesh Bharati: चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री पद के लिए किसी भी पार्...: भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक लोकतांत्रिक प्रजातांत्रिक देश है। संसदीय चुनाव में बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी या दल के संसद सदस्यों ...

चुनाव के पूर्व प्रधानमंत्री पद के लिए किसी भी पार्टी या दल द्वारा अपना नेता मनोनीत करना असंवैधानिक

भारतीय संविधान के अनुसार भारत एक लोकतांत्रिक प्रजातांत्रिक देश है। संसदीय चुनाव में बहुमत प्राप्त करने वाली पार्टी या दल के संसद सदस्यों द्वारा बहुमत से एक नेता का चुनाव होता है वहीं संसद में उस पार्टी का नेता होता है। यदि पार्टी को संसद में बहुमत प्राप्त है तो चुने गए नेता की प्रधानमंत्री पद के लिए पार्टी घोषणा करती है। राष्ट्रपति के अनुमोदन के बाद ही नेता सरकार बनाता है और कैबिनेट का चुनाव कर  उसकी घोषणा करता है। ऐसे कैविनेट को राष्ट्रपति मान्यता देते हैं और शपथ दिलाते हैं। अमरीका, फ्रांस, जर्मनी तथा अनेकों यूरोपीय एशिया और अफ्रीकी देशों में राष्ट्रपति पद का मनोनय प्रमुख पार्टी करती है। वह चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बनता है और अपनी कैबिनेट बनाता है।

अतः चुनाव से पूर्व किसी पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करना भारतीय संविधान की मान्यताओं तथा संसदीय लोकतांत्रिक प्रणाली के विरुद्ध है। यह स्मरणीय होना चाहिए कि हमारे देश में राष्ट्रपति द्वारा शासित लोकतांत्रिक प्रणाली नहीं है। जहां राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार घोषणा की जाती, बल्कि संसदीय है। जहां पहले से प्रधानमंत्री थोपा जाना संविधान तथा जनता की भावनाओं के विपरीत है। सभी पार्टियों और नेताओं को संविधान के अनुरूप ही आचरण करने में लोकतंत्र मजबूत होगा।

उत्तरायण
331, पशुपति भट्टाचार्य रोड,
कोलकाता- 700 041
मोबाइल – 9831155760
ईमेल – editor@rashtrabhasha.com
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                                                                                      – स्वदेश भारती
     (सुप्रसिद्ध लेखक, कवि)