Monday, 31 December 2012

हृदय के सितार पर

रात का दूसरा पहर, अंधकार भरे सन्नाटे के बीच
अभिशप्त नारी क्रंदन
मनको बोझिल बना देता है
कोई कैसे दूर करे चारो ओर छाया यह कहर

रात का दूसरा पहर
सपनों के पर्वत से कूदकर
नदी की धारा में बहता हुआ
समुद्र के बीच पहुंच जाता हूं
मुंह से निकल जाता है - हे ईश्वर
कैसी कैसी दुर्घटनाएं घटती हैं
मनुष्य नहीं जी पाता निडर
विखर जाते आस्था के स्वर हृदर के सितार पर
                                   
                                                 24 दिसम्बर, 2012





जीवन का संकट

आकाश में घनघोर घटा छा गई है
उसके विद्युत माला से ज्योतित हो रहा अंतरिक्ष
भयंकर तूफान और भैरवनाथ के बीच जैसे शिव का डमरू बज रहा है
तांडव नृत्य पर डमरू का शाश्वत स्वर
ब्रह्मांड में झंकृत हो रहा है
मनुष्य का विनाश का संकट आ रहा है
सागर में सूनामी लहरों का कहर उभर रहा आत्मघाती
जनरल स्वर आने वाला है
महाजल्पलावन का समय सन्निकट
ऐसे में सुनाई दे रहा
पागल अट्ठास इस विनाश संकट में
मनुष्य भर रहा अपनी लोभ लाभी झोली
ये जीवन का महासंकट है
जिसे हमें पहचानना है।


                                                25 दिसम्बर, 2012






सीता की प्रसर पीड़ा

हे मेरे प्रभु! त्रैलोक्य स्वामी, अयोध्यापति
मैं अकेली इस वियावान संघन वन में
असाध्य प्रसव-पीड़ा से व्याकुल
सहायता के लिए
केवल तुम्हें पुकार रही हूं
किन्तु मेरी आवाज इस सघन जंगल में
प्रतिध्वनित होकर गहरे अंधेरे में
डूब जाती है
इस प्राण लेवा पीड़ा को सहन नहीं कर पा रही
काश कि हो जाता इसी क्षण
मेरे उपेक्षित जीवन का विराम
मेरी करुण पीड़ा-स्वर सुनो हे राम
नारी प्रसव पीड़ा क्या होती है
उसे तुम नहीं जानते
हे लीलानाथ
मैंने धरती की कोख से जन्म लिया
तुम्हारी प्राण प्रिया सुकुमारी हूं
तुम्हारे राम राज्य की प्ररित्यगता असहाय नारी हूं
असह्न्य युग वेदना की मारी हूं
मैं अयोध्यापति की भार्या जनक सुकुमारी राजदुलारी हूं
क्या यह राम राज्य का विधान है
अथवा घोर नारी अपमान है
आज मैं भयंकर घोर प्रसव पीड़ा से
कष्ट झेलती इस जंगल में अकेली असहाय पड़ी हूं
झेल रही हूं तुम्हारे न्याय का असम्मान...।



                                                             26 दिसम्बर, 2012






जीवन की रंगत

सुबर शाम दिन रात
परिवर्तन होती है
मौसम की तस्वीर
बदलती रहती क्षण प्रतिक्षण
प्रकृति की रूप कथा
चलते रहते अनन्त पथ पर
लतपथ संघर्षरत
 दुख और पीड़ा
जब भी स्मृतियों की आंधी आती है
अंतस-आकाश में
बदली छा जाती है
अपने अपनत्व और सम्प्रीत के पैमाने में
मंजिल तक पहुंचने के क्रम में
दुख और सुख में नहीं हो पाती संगत
बस एक खालीपन
मन को सालता है
बैठा नहीं पाते
दुख और सुख में
अपने थके हुए जीवन की संगत





 27 दिसम्बर, 2012



                                     

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