Wednesday, 12 December 2012

सुख से विनती

रहो रहो सुख
कुछ और दिन रहो मेरे साथ
कुछ दिन और साथ रहने का दे दो सौगात
फिर तो झेलना है दुख
जीवन के पचम से
यह जो भ्रांति, अकर्म, अविश्वास, अशांति और
निजता की गांठ बंधी
हमारी आंखों में मछली की आंखों में
तीर साधने की मनसा सधी
उसने बदल दिया मेरी यात्रा का रुख

रहो रहो सुख, मेरे साथ रहो कुछ दिन और
अभी जाओ मत
मुझे नितांत अकेला, निरुपाय छोड़कर
मुझसे सारे नाते रिश्ते तोड़ कर
कहने के लिए तो बहुत सारे बने संबंध, फिर टूटे
किन्तु मोह, माया, स्वार्थ, अहंकार के बंधन में बंधे
वे सभी रिश्ते अपने स्वार्थ से सधे
मेरी धमनियों के प्रवाहित रक्त में
जिनका अंशदान रहा
वे भी रुठ गए ठीक मेरे सम्मुख अहम में सने
इसलिए इस उदासी भरे अंधकार में भी
मेरे साथ रहो सुख... रहो, रहो, रहो।

                                                        3 अगस्त, 2012




समय खोलना जीवन कर्म का पृष्ठ

दिन प्रतिदिन नव आकांक्षाओं का तन जाता वितान
सुनहरी धूप सजाती
पूर्व क्षितिज में अरुणाभ प्रकाशमय प्रामावान
संयोजित करती नव यात्रा-अभियान, चलती जाती
गत-विगत-श्लथ पथ पर
सजाती संवारती खंड-खंड हुए सपने, स्मृतियां मूल्यवान
दे जाती नव ज्ञान-ज्योति-प्रआमवान
भय विहीन जीवन-कर्म ही खोलता
नव-अस्तित्व का नयापृष्ठ, लिखता, देता
नव जीवन ज्ञान
दंशित, खंडित हुए सपने, आशाएं विश्वास प्रियमास

                                                                        4 अगस्त, 2012



प्राण के सितार पर

प्राण के सितार पर असंख्य गीत उभरे
पुराने से पुराने
और नए से नए
झंकृत होकर मुखरित हुए अविराम
जीवन के नए-नए आयाम
रोमांचित करते रहे
नयेपन का बोध
सार्थक हो उठा जीवन-संग्राम
काल के तीव्र प्रवाह में
बहता जाता कलुष-असमय
सिर्फ बच जाता कर्म और
कृतित्व अभिराम।



                                 6 अगस्त, 2012


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