Wednesday, 12 December 2012

रात का आगमन

रात अपने समय पर आती है
और सहज-असहज बीत जाती है
बात बीते न बीते, उम्र रीत जाती है
यूं तो बातों का क्या
बातों से ही बनते किस्से, बनते रिश्ते, टूटते रिश्ते
बातों से ही होते विरोध, अवरोध, विभेद
झगड़े, लड़ाईयां, सबंध विच्छेद
बात ही बेबात बनकर
दिलों में आग लगाती है
रात समय पर एक क्षितिज से टूट कर
दूसरे क्षितिज की ओर जाती है
रात ही हमारी चेतना को
प्रकाश मुखी बनाती है
संसृति को अपने आगोश में जकड़कर
मांसल प्रेम के विविध राग-विराग से
परिचय कराती है
रात प्रतिदिन सूर्य के अवसान पर
अपने भीतर आत्म-सुख-रंगत भर
आदमी के हृदय में
कामना की ज्योति जलाती है
जीवन के क्रमिक विकास-पथ पर ले चलती
और क्षण-प्रति-क्षण ह्रास का चरित्र बदलती
रात अपने नियत समय पर आती है
और प्रभात के उजाले से मुंह छिपाकर
पश्चिम क्षितिज पथ पर चली जाती है।

                                                   24 जुलाई, 2012







देश का निर्माण

देश लोगों का समूह होता है
कुछ नियम, कुछ संविधान
लोगों के हित में बनाए जाते हैं
अपनी भौगोलिक रेखाओं से घिरा देश
राष्ट्रीय एकता, अखंडता के सिद्धांतों
और सर्वांगीण विकास के विधि- विधान के ऊपर टिका होता है
अपनी विकास-प्रक्रिया से विश्व में
उच्च स्थान पाता है।

साहित्य, कला, विज्ञान में प्रगति
राष्ट्र को उन्नतशील बनाती है
स्वार्थ, लोभ, निजता, भ्रष्ट मानसिकता,
काले धन का संग्रह देश को कमजोर बनाता है
इसीलिए देश खंडित इतिहास भार ढोता है

देश आदमियों की संख्या पर
मूल्यांकित नहीं होता, महान नहीं बनता
बल्कि आदमियों के कार्य-व्यवहार और कार्य-
संस्कृति के विकास पर
अपनी पहचान बनाता है
इसके बिना अपनी मर्यादा खोता है।

आदि मानव भूखा होने पर छोटे पशु पंछियों
आदमियों पर आक्रमण करता था वीभत्स रूप में
अपनी भूख प्यास, शांत करता था
फिर वह कुनबों में बंटा, उसे संयोजित नियंत्रित कर
बड़ा किया, पत्थर के अस्त्र से दूसरे कुनबो पर आक्रमण कर
अपने को शासकीय प्रथा से जोड़ा
दूसरों की जमीन, जद, जोरू पर अधिकार जमाया
राजा रानी बना, विधान नियम बनाया
सुनबे को शक्तिशाली बनाया। आधुनिक बनकर
आज भी वही आदि मानव भ्रष्टाचार्, चोरी, फरेब
हत्या, आत्महत्या के दौर से गुजर रहा...।

                                                         25 जुलाई, 12






सुरक्षा-असुरक्षा


मैं मनु की संतान हूं
बीते समय का विखरा गान हूं
टूट गए शब्द तार
बार-बार समय के साज पर जुगलबंदी करता
अतीत और वर्तमान के सितार का झंकार हूं
भग्न, टूटे हृदय का तार हूं।............
मैं नए युग में अपने को
नवजीवन के नव स्वरूप नव्यतम-पथ पर मोडने
खंडित युगबोध की विखंडित अस्मिता के तार जोड़ने
नए-नए अंवेषण
युगान्तरकारी परिवर्तन का अवदान हूं

मुझमें सत्य और अहिंसा का जो सत्व शेष था
वह भीड़भरे आश्वासनों के बीच समाप्त हो गया
नव जागृत, नवोदित, वोन्नत दिशाओं में
आत्म लिप्सा और स्वार्थ का अंधकार घिर आया है
आम आदमी की बेवसी का असहाय बोध
असमय की काली रात में सो गया है
मैं समय से पूछता हूं
कौन सी, सुरक्षित जगह है
जहां मनुष्य अपनी अस्मिता को खंडित होने से
बचा सके, सुरक्षा की सांस ले सके
कौन सी जगह बची है
आखिर कौन सी?

                                26 जुलाई, 12





खुल गई नाव


खुल गई भाव-नाव
जो बंधी थी समय-तट पर
बहुत दिनों से स्थिर एक ठांव

देखा है उसने नदी का बांकपन, थपेड़े सहती
बाढ़ का महाजल-प्रवाह, तीव्र आवेग
सूखकर तिल तिल बहती नदी

बहुत दिनों से मन के सूने तट पर बंधी
स्मृतियों के धूल-धाकड़, ढंके गंदगी
देखा है तीव्र गति से बहती छिन्न-भिन्न शताब्दी

खुल गई नाव लिए नए भाव
थाम लिया विचारों की पतवार
पार करने अथाह, अनन्त, दर्गम पारावार

                                                                              27 जुलाई, 12




प्रतीक्षा



प्रतीक्षा करना है और अपनी रक्षा स्वयं करना है
पता नहीं कब, कैसे, कहां से समय-
असमय आए और छिनछिनाए सर्वांग फिर
घसीट कर अपने गतिमय प्रवाह के साथ ले जाए

दुर्दिन रात का अंधकार अपना अस्तित्व खोता है
उसका धीरे-धीरे ओझल हो जाना सुनिश्चित होता है
सबेरे की किरण जिस प्रकाश से छनकर
धरती के कण-कण को नवजीवन देती है
उसकी भी उम्र उसके माथे पर अंकित होती है
जीवन पर्यमत वह प्रकाश देकर अंधेरे में विलुप्त हो जाती है
यूं तो अपनी करनी से भाग्य-घट भरना है
और एक दिन तो समूचे अस्तित्व को विखरना है।

                                                                                           28 जुलाई, 12




पितृ वाक् 



चलते चलो, चलते चलो
पीछे मत देखो
आगे का रास्ता पहचानो
पूर्वजों, ऋषियों, श्रृति कारों का निर्देश भावों
जानो धरती का भूगोल, इतिहास
चलो चलो चलो
अतीत में कुछ खोजो मत
चाहे जितने हो कंकटाकीर्ण दुर्गम पथ,
पग बढ़ाओ पग श्लथ रक्तारक्त
भर लो अपने भीतर आकांक्षा उच्छ्वास
बांध लो ज्ञान संबल से अटूट विश्वास
जीवन की बाग में हरे भरे सघन
वृक्ष की तरह फूलों फलों
चलो चलो चलो
अंधेरे के बीच जलाओ
मन का प्रदीप
श्रेष्ट कर्म से सजाओ
हृदय का अंतरीप

एक भयानक तूफान में
बूढ़ा वृक्ष जिस तरह धाराशायी होता है
मैं भी उसी तरह पांव फिसलने से
पीठ के बल गिरकर
संज्ञा शून्य हो गया
उस समय आंखों के आगे अंधेरा था
मैं अकेला, असमर्थ था
परन्तु धरती माता ने मुझे सहेज लिया
क्षण भर में
जीवन और मृत्यु के अन्तराल को देख लिया।

                                                       29 जुलाई, 12





रोग शैय्या पर



भयानक दर्द,
पीड़ा और संताप नए चिन्तन को जन्म देती है
आत्मघाती आहत स्वर
मन मस्तिष्क को आक्रांत करता है
दर्द ही दुख के अंधकार में
नई राह दिखाता है
दर्द सोच के रास्ते अवरुद्ध करता
दिमाग को अशांत करता
समय खालीपन को भरता है

                                                      31 जुलाई, 12






सूर्य यात्रा



सूर्य हमारे आगे पीछे उगता,
आकाश की सीढ़ियां चढ़ता
क्षितिज के अक्षांस को पार करता
पश्चिम में अस्त हो जाता है
और विश्व भर में लोगों का हुजूम
बार, कहवा घर, नाइट क्लबों की ओर चल पड़ता है
अंधकार में टूट जाती
जो भी जीवन की जड़ता है
जीवन-आनन्द धारा बहती है अनवरुद्ध, तेज
उसका भोग-आश्वाद स्वतः
अग्नि में दी गई आहुति की तरह सुलगता
तब भी निष्काम, अविराम
सूर्य हमारे लिए उजाले का सपना दे जाता
जिसे पूरा करने में
हमारा वक्त हमारे ही हाथों से
फिसलकर बालू की तरह झर झर
गिर जाता
जीवन प्रवाह कहां, कब रुकता।

                                   1 अगस्त, 2012







विश्वास और आस्था की संगत



मैंने देखा कि
कहा हुआ सत्य भुला दिया गया
और असत्य की नाव में बैठकर
सभी भव सागर पार करने का यत्न करने लगे
कितने सारे मोड़ों पर
जीवन के संबंध-असंबंध से जुड़ या अलग थलवा
विविध तरह के यात्रा-पथ-कोणों पर
जीवन को विखंडित होते देखा है

कितना कुछ गुजर जाता है रास्ते में
किन्तु मैंने माना कि
विश्वास और आस्था ही आगे बढ़ने की
पथ प्रदर्शक अटूट रेखा है।

                                                     2 अगस्त, 2012







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