Friday, 28 December 2012

लवकुश का गर्भ-ज्ञान

माता, रोओ मत, इस सुनसान जंगल में
तुम्हारे असहाय-क्रन्दन की आवाज सुनकर
न मेरे पिता राम, नाही चाचा लक्ष्मण आएंगे
देखो माता देखो कैसे बदल गए राजधर्म के अर्थ
कुछ हिरण तुम्हारे आसपास आकर दुःख भरी आंखों से
तुम्हारी ओर ताक रहे हैं
रात का निविड़ अंधकार है
और तुम्हारा करुण विलाप
वन-प्रांतर को दुख से कंपा रहा है
रोओ मत माता
मैं अपने भ्राता के साथ
पृथ्वी पर जन्म लूंगा
राम और लक्ष्मण का सत्ता-गर्व चूर-चूर करुंगा
उनसे मांगूगा नारी-स्वतंत्रता, न्याय-धर्म का
शाश्वत- अर्थ
परम्परा के गौरव की स्थापना
जो किया जा रहा है व्यर्थ...

माता, तुम रोओ मत
यहां सुनसान वन में
तुम्हारा रुदन भला कौन सुनेगा?
तुम्हारी अन्तर व्यथा कौन गुनेगा
अयोध्या का इतिहास ब्रह्माड में सहेगा
समय का विनार्थ...

                            3 दिसम्बर 2012






जीने का अर्थ

जीने का अर्थ मैंने तब जाना
जब अस्तित्व  के यथार्थ को पहचाना
दुखों के करघे पर संजोया
सुख का ताना बाना

                                4 दिसम्बर 2012










स्वगत

दूसरों को कितना कुछ ज्ञान दिया
अपने को दिशाओं में उड़ने के लिए
संवेदना को जिया
शब्दों से क्षितिजों में उड़ना सीखा
जैसा हूं वैसा ही दिखा।


                                     5 दिसम्बर 2012







अन्तर्मन का राग-विराग

जन्म से मृत्यु तक
हम प्यार के भटकाव में जीते हुए
अपने को जोड़ते, तोड़ते हैं
इस प्रक्रिया में
सम्बन्धों की प्रवंचना से
जब भी मुंह मोड़ते हैं
उदासी भरे क्षण
हमारे अन्तर्मन को झंकृत करते
राग-विराग से भरते।

                                    7  दिसम्बर 2012









ऋषि उवाच

ऋषि कहता है
जीवन का अन्त कब, कहां, कैसे होगा
उसे समय ही जानता है
औरसमय ही
जीवन में कर्मों को
भवितव्य तक पहुंचाता है
जीवन और कर्म का गहरा नाता है।

                                     8  दिसम्बर 2012









विखर रहे शब्द-भाव

विखर रहे शब्द, भाव, विभाव
रिक्त होते सर्जना के भंडार
कहां गए घुटनों के बल चल रहे
आंखों में पल रहे प्यार
सौरभी वातास का कमरे के भीतर आना
मौसम के आंगन में
रंग-विरंगी कलियों का खिलना
अपने वृंत पर इतराना
और कुम्हलाकर झड़ जाना

कई दिशाओं में बंट गया है
मनसा-अन्तराल से निकलती नदियों का बहाव
विखर रहे शब्द भाव-विभाव

वह ज्योति भी धूमिल हुई
जो दिखाती थी अंधकार में रास्ता
अब तो विखराव के कगार पर खड़े होकर
देखना है आत्मदर्शी दुष्प्रभाव
और समेटना है शब्द-भाव।

                                          10  दिसम्बर 2012





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