Tuesday, 18 December 2012

कटता हुआ वृक्ष


हरे भरे कटते वृक्ष का आहत मौन 
आर्तनाद भीतर तक कर जाता असहाय, व्यथित
उसके फूलों, फलों, हरी पत्तियों, डालों को
कुल्हाड़ी की चोट से अस्तित्वविहीन करता
आदमी का निष्ठुर, ममत्वहीन हाथ
करता हरियाली पर आघात...

जब पेड़ अंकुरित होकर बड़ा हुआ सघन
अपनी छाया से राहत देने लगा
पंछियों के घोंसलों के लिए देने लगा डाल की छाया
फूलों, फलों से हमारी कामना की रिक्त झोली भरता
आज वही हो गया अनाथ...

हाय! हे वृक्ष तुम्हारी बस इतनी कहानी
तुम देते सर्वस्व, यहां तक की अपना जर्राजर्रा
चुपचाप झेलते रहते मनुष्य की नादानी
काटे जाते हुए तुम्हें समझ में आती है अपनी औकात।

                                               17 अगस्त, 2012




मृत्यु-चक्र

प्रत्येक मनुष्य मृत्यु से भयभीत हो जाता है
वह यह जानता है कि उसने कुछ किया, जिया
जितना कुछ कमाया, पाया
किन्तु कुछ भी साथ नहीं जाएगा
सब कुछ यहीं धरा का धरा रह जाएगा
पृथ्वी जो भी देती है, वह सब ले लेती है
फिर भी मनुष्य लोभ का तिनका पकड़े
समय-जीवन-महासागर में
असमय की रौद्र-लहरों के बीच बचता, बचाता
अन्ततः अस्तित्व खोता है

मृत्यु चाहे जितनी असह्य, भयानक और त्रासद हो 
हमें कर्म-अकर्म के अन्तराल में डुबोती है
फिर भी हम मृत्यु से कहां डरते हैं
जो चाहते वहीं करते हैं

हमें मृत्यु वरण करना ही होता
कभी भी, किसी भी क्षण
प्रकृति की विभीषिका हो या
सहज-असहज प्राणघातक घटना-दुर्घटना
प्रत्येक समय हमें सचेत करती
कुशल तैराक की तरह
काटना है हिल्लोलित लहरों का उद्वेलन

समय-चक्र पूरे शौर्य के साथ सहना है
क्षण-प्रतिक्षण चैतन्य रहना है
जब तक जान है, जहान है
आंख मुंद जाने पर तन, मन, धन, जीवन निष्प्राणवान है

                                                            18 अगस्त, 2012






मेघावरी

यादों के बादल कारे कजरारे
उमड़ते, घुमड़ते, घिरते वरसते
और पल भर में यूथ भ्रष्ट छिटक जाते और दोबारा
हवा के हाथ में हाथ डाले गरजते लरजते लौट आते
मन-वृक्ष को सरस करते, हर्षातिरेक में
बरसते और क्षण भर में नदारत हो जाते
भाद्र मास के बादल
शरत् के पदचाप से परिचय कराते
नवरात्रि, देवी पूजन, दीपावली का आमंत्रण दे जाते
घर बाहर आनन्दोत्सव सजते
अचानक ही भादौं के सघन कजरारे बादल
अतीत के भंडार-ग्रह से लाते स्मृतियां
कुछ लाल-पीले गुलाल लिए आते
कुछ सुधियों की पंखुड़ियां
मन की थाल में डाल कर
क्षितिज की ओर चले जाते
भाद्र की वर्षा फुहार सुधियां लाती जलभरी
और आने वाले समय से परिचय कराती मेघावरी

                                                                           19 अगस्त, 2012








हवा की गति

देख रहा, सुनहरा हवा का रुख
कभी आहिस्ता, कभी तेज
विनाशक प्रचंड तूफान को जन्म देती
सर्जित करती काली सफेद वर्दी में सजे
बादलों की फौज
जो आक्रमक बनकर घिरते, घेरते
डूबा जाते, बरसते, सरसते, जलमग्न करते
रास्ते गांव, घर, खेत, खलिहान
नगर की सड़कों को करते बेहाल

चलती है पागल हवा आक्रामक 100 की रफ्तार में
भूपातित करती वृक्ष, लताएं, फूल
घर, अहालिकाएं
सागर-लहरों की बांह पकड़
ऊंची उड़ान उड़ती हवा
हमारे अस्तित्व को मिटाती
नाचती है जैसे बेताल...

हवा हमारी एक जरूरत है
वहीं तो मौसम सर्जित करती
वर्षा, शीत, ताप, मौसम परिवर्तन देती
हवा के बिना जीवन नहीं
अस्तित्व के सर्जन और विसर्जन वही देती
हरीतिमा-सुख नवोन्तान आनंद-मन-मराल

                                                                              21 अगस्त, 2012





अपनत्व- बंधन

मन कभी अपनत्व-बंधन में बंधा
आह्लादित, प्रमुदित, आनंदित मयूर की तरह नाचता..
मन कभी उदास, निराश, एकाकी, विपन्न
संत्रास झेलता फिर भी सपने सजाता...

मन के हजार रूप मैने देखे हैं
कभी वह बांधता हृदय-जाल में आकांक्षा की सोन मछलियां
कभी आगोश में बांधता अनाघ्रात कलियां
वह प्रेम-रोगी जीवन पर्यन्त प्रेम के अध्याय बांचता...

कभी नीरस, दुःखदैन्य के अंधकार में डूब जाता
कभी अकल्पनीय सुख-माया चित्र आंकता...

सौन्दर्य और प्रेम से भरता नहीं उसका मन
जगाता विगलित आश से देता नई आश
जब तक जीवन है छूटता नहीं प्रेम, सौन्दर्य
जब तक दम में दम है सांस में सांस
नहीं छूटता प्रेम का उच्छ्वास।

                                                                  22 अगस्त, 2012





शब्द - खेल

काव्य की ऊंची शिला पर बैठा
मैं शब्दों से खेलता रहा
तरह-तरह के भाव-संकट झेलता रहा...

शब्दानुराग कितना कठिन होता
वही तो दुख-सुख का उत्स होता
मैं प्रेमानुरागी शब्दों का खेल खेलता रहा...

कभी प्रेमार्थ जनित शब्दों को अपनाया
कभी उसके अर्थ को
और उसका विनार्थ झेलता रहा

                                                                  23 अगस्त, 2012






नए-नए अर्थ गढ़ते

चलो शब्द से शब्द बनाएं
फिर उसके अर्थ से और भी नए-नए अर्थ बनाएं
शब्द चाहते हैं बदलाव अर्थ से लगाव
चंचल चतुरचित्त हाव भाव से
अथवा उत्तेजना के प्रभाव से
या युग के बदलाव से
मनुष्यता के सर्जन के समभाव से
गढ़ना है संप्रीति के स्तम्भ-सेतु
जिस पर चल सके ऐसे लोग
जो शब्दों की करते हैं तस्करी
और उसी से करते हैं हर संकट में अपना बचाव..

श्रुतियों, उपनिषदों, धर्मग्रन्थों में
शब्दों से सर्जित हुए महानता के पैमाने
अथवा अधोगति के बदल गए माने
समय के साथ चलते हुए
पल-पल शब्दों के अर्थ बदल जाते
लोग कमर-बद्ध नाचते रहे
जलाकर बुद्धि का अलाव...

                                                                  24 अगस्त, 2012





अशांत चित्त

हे चित्त, अशांत मन में उभरती हैं कितनी सारी भ्रांति
कहां किस जगह ले जाऊं तुम्हें
जहां मिलती हो शांति
तुमने अपने सुख के लिए क्या नहीं किया
लोभ-लाभी-युद्ध में शरीक हुए
कितने सारे मोर्चों पर संघर्ष किया, हारे, जीते
अपने से अधिक दूसरों को जिया
रचते रहे कितनी सारी नव युगान्तर-क्रांति

हे चित्त, तुम अपने आपको बुद्धिमान समझते रहे
विद्या बुद्धि के मिथ्याभिमान में
शास्त्र और महापुरषों के मार्गदर्शन की
अवहेलना करते रहे
विविध भोगों में रम कर
अपने को नष्ट करते रहे
फैलाते रहे जन-जन में अशांति
ऐसे माहौल में अपने को युग के साथ विलय न करना
बुद्धि, बल, कौशल का ह्रास है
यही मनुष्य का सर्वनाश है।

हे चित्त , अपने को दृढ़ निश्चयी करो
अपने लक्ष्य प्राप्ति के लिए करो या मरो
अन्तर-चक्षु से देखो
प्रकृति कितनी सुन्दर है
पंचभूत के कितने सारे नवान्न प्रिय आयाम हैं
जो जन-जन, पशुपक्षी में विद्यमान हैं
ब्रह्मवेत्ताओं में भी इसी से सभी कर्म क्रियावान है
शांति का महामंत्र मन के अन्दर है
तो ईश्वर की सत्ता व्याप्त है हमारे भीतर बाहर
एकाग्रबुद्धि से अनुभव करो महाशांति महाशांति।

                                                            25 अगस्त, 2012







औरत की महिमा

औरत जीवन भर प्रेम का रंगीन चश्मा लगाती
और उसी से दुनिया देखती
अपने भीतर सपनों के अनगिन घर बनाती
कुछ घर तोड़ती जोड़ती
एक सहारा खोजती...

औरत अपनत्व की चाह में भटकती
हृदय में चाहत का प्रदीप जलाए
कई-कई तरह से अपना गन्तव्य मोड़ती

औरत एक फूल की तरह मन की डाल पर फूलती
किन्तु अपनी छठा, पराग-गंध
अधिक अवधि तक नहीं सहेज पाती

औरत एक अजूबा स्वप्नदर्शी लोभ लाभी होती
अपने में ही, अपनों के लिए जीती
अपना जीवन दूसरों के लिए  न्यौछावर कर देती।

                                                                  27 अगस्त, 2012








 शरीर के खुलेंगे ग्यारह द्वार

मेरे शरीर के ग्यारह द्वार खुले थे
अब एक घ्राण-द्वार बन्द हो गया है
इसी तरह सभी द्वार क्रमशः बन्द हो जाएंगे
रह जांगा चारो ओर से बंधा विंधा
उस क्षण कोई भी खोल नहीं सकेगा तन-मन-कपाट
भूल जाऊंगा अतीत, वर्तमान, भविष्य
समय स्थिर दुर्गम होगा जीवन,
जब नाक से प्रवेश करती
हवा भी हो जाएगी गति-शून्य, बंद
बुद्धि जो हजार हजार योजन की यात्रा
क्षण भर में कर लेती थी, हो जाएगी कुन्द
सब कुछ अंधकार में डूब जाएगा
मेरे इर्द-गिर्द का संसार
आंखों से ओझल हो जाएगा सौन्दर्य, प्यार
उड़ जाएगा कोमल, स्निग्ध, कमनीय, सरस मराल
सूखेगा जीवन-पुष्प
खुलेंगे नहीं ग्यारह द्वार।

                                                               28 अगस्त, 2012






आत्म-संधि-पत्र

प्रति दिन संधि-पत्र लिखता हूं आलो छाया के बीच
मस्तिष्क के कागज पर कितने सारे आख्यान
आत्मीय संबंध कथा अथवा टूटने विखरने का आघात प्रतिघात
अपना या औरों का बखान
लिखता अपने सुखों को हृदय से भींच...

संधिपत्र लिखता हूं किसी भी क्षण, कहीं भी, कभी भी
सबेरा हो या शाम की स्वर्णीम-रेखा
जो क्षितिज में नव-रंग-वितान बनाती है
हम उस प्रकृति-चित्र से ग्रहण करते बहुत सारे प्रभाव
भाव-विभाव
और ममत्व की सूखी फसल को अश्रुजल से सींच..
इसी तरह संधि-पत्र लिखता रहूंगा आत्म संघर्षों के बीच


                                                                                            29 अगस्त, 2012









अदृश्य का मनन

मैं आश्रित हूं कहीं न कहीं उस अदृश्य शक्ति पर
जिसके इशारे मात्र से निकलते हैं शब्द-स्वर
और कर्म-अकर्म के होते सारे क्रिया क्लाप
उसी शक्ति से संचालित होता
जीवन का आनन्द-मंगल अथवा प्रतिशोध अभिशाप
जन-जन के सुख-दुख को संचालित करता
वह कौन है सर्वत्र, सब समय रहता
हमारे भीतर विद्यमान
उसी के हाथों बंधा है आदमी का समस्त कर्म
धर्म, आस्था-अनास्था
उसी के संकेत पर जीवन होता सुखी अथवा मृयमान
आओ, हम मिलकर उसी शक्ति का
करें चिन्तन-मनन, करें समर्पित सर्व कर्म-धर्म
आनन्द, व्यथा भर
सुने अनहृद-आनन्द-गान-स्वर


                                                           30 अगस्त, 2012







प्रेम की स्थिति

सुख तोड़ता है
और दुख जोड़ता है
यह मन की अनन्तकथा है 
जीवन के प्रारंभ से अंत तक
अपन्तव के लिए
अपने को कई रास्तों की ओर मोड़ता है।
अप्रेम का सान्निपात ग्रसता है
प्रवंचना से डरता है
हर हाल में प्रेम खालीपन को भरता है।


                                                               31 अगस्त, 2012

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