Tuesday, 1 January 2013

प्रतिज्ञाएं

जो प्रतिज्ञाएं की थी
पिछले वर्ष
वे सब पूरी नहीं हुई
जीवन को घेरे रहा आत्म-विमर्ष
अब आएगा नववर्ष
कितना दे पाएगा हर्ष और उत्कर्ष

                                            28 दिसम्बर, 2012




शब्दों की नाव

शब्दों की नाव बनाई
और छोड़ दिया उसे चेतना-प्रवाह में
समय-सागर की तूफानी उताल लहरों के बीच
संघर्षों से भरा रहा वर्ष
आए अनेकों अवरोध कंटकाकीरअम राह में
कितने सारे अवरोध-विरोध आए
पग-पग पर आहत हुआ उत्कर्ष।

                                                       29 दिसम्बर, 2012








सपनों का संसार

सपने तो सभी गढ़ते हैं
उसी तरह मेरे भीतर भी सपने पलते रहे
उन्हें पाने के लिए
राह में पग-श्लथ संघर्षशील चलते रहे
सपने मांगते हैं निष्ठा और कर्म का कवच
जिससे अपने का सुरक्षित रखते हुए
असमय-युद्ध में लड़ते हुए
मंजिल की ओर बढ़ते रहें
सपनों को साकार करते रहे
नये नये भाव चित्र गढ़ते रहे।

                                                   30  दिसम्बर, 2012








सुनहरी किरण

ओ सुनहरी किरण
तुमने जिस तरह दिन प्रतिदिन
रात का अंधकार दूर किया
नई आकांक्षाओं, प्रतिक्षाओं और
कर्म के विविध आयामों को सर्जित किया
उनके आलोक में ही तो मैं
युद्ध-रत पथ-श्लथ अब तक जिया
जैसा नियति ने हलाहल दिया
उसे ही अमृत मानकर पिया

ओ सुनहरी शब्द-किरण
तुम जिस तरह प्रभात वेला में
आत्मसंवेदना के सप्तरंगी-खेला में
प्राण-आकाश पथ पर आती हो
चेतना को जागृत करती हो
एक नव्य-प्रभा भर जाती हो
और नित्य प्रति संवेदित कर जाती हो
एकाकी हिया।

  31  दिसम्बर, 2012




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