Friday, 28 December 2012

ईश्वर - अस्तित्व

यदि यह सच है कि ईश्वर ही
सर्वत्र, प्रत्येक स्थिति में,
कर्म में, अकर्म में, महाशक्तिमान बन
आनन्द-सुख, दुःख-व्यवथा, अन्तस्-मर्म में
कण-कण में व्याप्त है
फिर हम जो आस्था से निर्मित
सपने, आकांक्षाएं लिए कठिन से कठिन
कर्ममय जीवन को अर्थवान बनाने की
यथा संभव कोशिश करते हैं
समय की दहलीज पर उम्र का वलिदान करते हैं
हमारे किए का वर्चस्व अदृश्य के हाथों में होता है
हमारा तन-मन जीवन पर्यंत इस बोझ को ढोता है।

                                             16 नवम्बर 2012




अभावग्रस्ततता

कभी भी कुछ भी घटित होता
विश्वकर्मा द्वारा
रचे गए समय के खेल में
अनियंत्रित व्यक्तिपरक
स्वार्थ और लोभ के ठेलम-ठेल में
हम भूल गए हैं कि
संस्कृति भी एक शब्द है
जो जीवन से इस प्रकार जुड़ा है
कि उसे अलग कर देने से
युगान्तरकारी, विनाशक भूकम्प आता है
जिसमें हमारी आस्थाएं
डाल से टूटे पत्ते की तरह उड़ जाती हैं
हमारी जीने की कशिश
कहीं से टूट कर
कहीं जुड़ जाती है
हम देखते रहते असहाय, अपनी बेबसी,
अर्थ की असमर्थता, सत्ता की मनमानी के बीच
संकटग्रस्त अभावग्रस्त जीवन की असमर्थता तथा
नश्वरता के खेल में।

                                                                     17  नवम्बर 2012






नवपथ-गामी


चलो फिर से उन रास्तों पर चलें
भले ही विपरीत स्थितियों में हाथ मलें
प्रेम और आत्मीयता को अक्षुण्य रखना
कष्टप्रद क्रिया है
जीवन की यही तो सार्थक प्रक्रिया है
हमें प्रेमीले रास्ते पर चलना है
अपनी वर्तमान स्थितियों को बदलना है।

                                                 19  नवम्बर 2012






चिन्तन की स्लेज


मैं अपने चिन्तन की स्लेज पर घिसटता हुआ
भावों की बर्फानी डगर पर चल रहा हूं
ठंडी हवा परिवर्तित मौसम की
कंपा रही हड्डियां बाहर भीतर
चल रहा हूं बर्फानी डगर पर
ठंडी हवा के कहर से कांपता सिहरता हुआ
शताब्दी के नए मूल्यों की
ठंडी, उदास, हवाएं नव युग-आगमन का
समाचार देती कि आने वाला समय
इतिहास निरोधक होगा
मानवता-विरुद्ध
हो सकता है बैसाखियों पर चले
विकास-अवरुद्ध अपने में सिमटा हुआ

शब्दों के पतझार में
मैंने नव संवेदना का वसन्त चाहा
बहुरंगी भावों की कलियों को
जीवन पर्यंत देखा और सराहा
वहीं तो मेरा प्रारब्ध रहा
जिसे समय ने मेरी झोली में डाल दिया
बहुत तरह के बहुत सारे संदर्भों के बीच
चलता रहा दुश्कृत्यों से कटता हुआ
असमय की बर्फीली हवाओं के बीच
चिन्तन की स्लेज पर घिसटता हुआ।

                                                      20  नवम्बर 2012








राधा की प्रतीक्षा


महाभारत युद्ध समापन की रात
जब आर्यावत वृंदावन पांडवों की विजय पर झूम रहा था
राधा रानी भूखी प्यासी
चिन्ताग्रस्त जागती रही
कौन जाने कृष्ण गोकुल, बरसाने आएंगे

राधा-रानी जमुना-तट पर
18 दिनों तक बैठी सूर्य देव से
कृष्ण के विजय की प्रार्थना करती रही
कछारों से उड़कर बलाकाओं का झुंड
जब अर्ध गोलाकार जमुना के ऊपर
चक्कर लगाता
तब उनसे भी राधा पूछती-
क्या कृष्ण युद्ध में विजयी होकर
लौटेंगे मथुरा, ब्रज, नन्दगांव
विजय-गर्व से प्रसन्न-चित्त लौटेगे श्याम
रास लीला भूमि ब्रज धाम

हे राधे, इतिहास के सन्नाटे के आर पार
जब समय अपना पंख पसारे उड़ता है
नए युग से जुड़ता है
हे राधे! तब भी गूंजते होंगे तुम्हारी प्रार्थना के स्वर
तभी क्या बैठी रहोगी कालिन्दी तट पर
चम्पा, चमेली, पारिजात के फूलों से अंजुरी भर
कृष्ण के आगमन की राह जोहती रहोगी निःस्वर अविराम।

                                                                          21  नवम्बर 2012








आमजन की यंत्रणा


सत्ता के हाथों में आत्म-लोभ-कलश है
जो खालीपन भरने के लिए
पराए सुख पर करती है अतिक्रमण
देश और आमजन का जय जयकार करती हैं
जिन्होंने तन-मन-धन सर्वस्व अर्पित किया
शहीद हुए देश के लिए
वे किस्से कहानियां बनकर रह गए
समय की चोट सह गए
वे सभी प्रणम्य हैं जिन्होंने आमजन के संकट को जिया
अब तो इस लोभ लाभी जनतंत्री मेले में
नए -नए लोग आए हैं
नई वैश्विकता, नई नई चाहें
लगाती हैं तरह तरह की दांव, कुर्सी के लिए
छल-प्रपंच-सत्ता के जाल में फंसता जाता आमजन
कैसा समय आचा है
कुछ असर नहीं होगा- गूंगा, बहरा है सिंहासन
चाहे जितना करो आन्दोलन, आमरण अनशन
भले ही कर दो बलिदान देश के लिए।

                                                                 22  नवम्बर 2012








जीवन होता बहुरंगी


जीवन होता बहुरंगी
अन्दर, बाहर
जन्म-जन्मान्तर
अनगिन रंगों से सजता
बहुआयामी पंखों से नापता
आकाश की ऊंचाई और
सागर की गहराई
सूर्य-किरण सतरंगी...

जीवन से बंधकर जीव
हो उठता कर्ममय, सजीव
अभीष्ट-पथ पर चलते हुए
इन्द्रियों को बनाना होता पौरुषेय, जंगी...

यूं तो सबेरे से शाम तक
विविध कर्म करते हुए-
आकांक्षा की खाली झोली भरने के लिए,
आत्मीयता के घने छायादार वृक्ष तले
अथवा नदी, सागर तट,
या वर्फाच्छादित पर्वत पर
नए-नए रूप सर्जित करते हुए
समय-प्रवाह में हिचकोले लेती
आत्म-निष्ठा की नाव चलती बांधे पाल रंग-विरंगी

                                                                      23  नवम्बर 2012








आत्मलोभ का रिक्त कलश

उनके हाथों में आत्मलोभ का रिक्त कलश है
वे उसे पराए-सुख से भरते हैं
यही उनका सार्वजनिक गुण है
जिसे भोगता हैं आमजन...

तन, मन, धन से
जो वतन के लिए वलिदान हुए
वे तो अब किस्से कहानियां बन गए
वैश्विक बदलाव में घिरी है जन-संस्कृति
चरागाहों में आ गए हैं बनैले पशु
बेमेल, भुतही आकृति
वे भयहीन, मुक्त भाव से आ गए हैं
लेकर अपने साज-सामान, नववृत्ति
परतंत्रता की हवा चलने लगी है चारों ओर से
ऐसे में आमजन अपने दायरे में असमर्थ और विवश हैं
एक ऐसा युग आ गया है जहां विकास चौबन्द है
अब तो अपयश भी यश है
उनके हाथों में मुक्त बाजार का कलश है।

                                             24  नवम्बर 2012








बीते पलों की खंडित राग गुनता हूं


मैं शब्द-बाग में स्मृतियों के फूल चुनता हूं
अभिव्यक्ति की चादर संवेदन के ताने बाने से बुनता हूं
कुछ तो खो गया अर्थ
विसंगतियों की माटी में
जिसे खोजता रहा समय की थाती में
बीते पलों का खंडित राग गुनता हूं
आनेवाले समय की पगध्वनि सुनता हूं
किश्तों में बटे जीवन को जीता हूं
हर तरह से रीता हूं।

                                            27  नवम्बर 2012







 प्राण संवेदना का द्वार

एक शून्य से निकल कर
भीड़ भरे रास्ते में आ गया हूं
लोग अपने सिर पर
लोभ-लाभ, अहम, अहंकार
और घोर निजता की गठरी लादे चल रहे हैं
उनके लिए मैं शब्द-गीत लाया हूं
चारों ओर घिरी निराशा का अंधकार में
उनके भीतर भी
छोटे, बड़े सपने पल रहे हैं
वे संघर्षरत हैं
चाहें जीत हो या हार....

भीड़ आक्रोश में है
वे बुझे हुए मन से नारे लगा रहे हैं
कई तरह के लोग हैं
कई तरह की आकांक्षाएं हैं
कई तरह के छोटे बड़े दुख हैं
उन सबके लिए मैंने खोल दिया है
प्राण-संवेदना का द्वार

                                     28  नवम्बर 2012







 सृजन मर्म

समय के वियावान में मन
पागल घोड़े की तरह भागता बेतहासा, अनियंत्रित
विभिन्न दिशाओं में चक्कर लगाता
दिमाग के अस्तबल में रख पाना
उस पर निगरानी करना कठिन कर्म है
सृजन का यही मर्म है।

                                      29  नवम्बर 2012







स्वतंत्रता

अभी हम स्वतंत्र नहीं हुए
आमजन के प्रति कर्तव्य-धर्म निभाना नहीं आया
स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छन्दता नहीं
सत्ता की अहंमन्यता नहीं
मनुष्य के प्रति हृदय की समरसता, अपनत्व, प्यार
स्वतंत्रता को स्थायित्व देते हैं
जन-अनात्म-बोध के क्षण
घातक सिद्ध होते हैं
बलिदानियों ने स्वतंत्रा का जो जलाया था मशाल
उसकी रोशनी क्षीण हो रही है
हमें मशाल को बुझने नहीं देना है
जान देकर भी उसे जलाना है
जन-जन में नव निर्माण का मंत्र जगाना है।

                                           30  नवम्बर 2012








तथागत का स्मृति-दंश

श्रावस्ती के जंगलों में
भील कन्याओं का समवेत-गान-स्वर उभर रहा था
वीणा के तार साधा
उन्हें इतना ढीला मत करो
कि बजे नहीं
और इतना कसो मत
कि टूट जाए
सुमधुरगान की स्वरलहरियों से
जंगल का कण-कण सुखानुभूति से भर गया
तथागत की समाधि टूटी
उन्होंने अधोन्मेलित आंखों से
भील कन्याओं को देखा और फिर समाधिस्थ हो गए
उनके अन्तर्मन में
पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल की यादें उभरी,
फिर एकाकी मौन का घटाटोप घिर आया
हौले से बरस गई
यादों की बदरी।


                                            1 दिसम्बर 2012













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