Wednesday, 19 December 2012

राग रोग की तितीक्षा

हे पार्थ,
तुमने गीता के अट्ठारह अध्याय
भगवान कृष्ण के मुंह से सुने
फिर भी तुम्हारे भीतर बनी रही
राग-रोग की तितीक्षा
जब महाभारत का युद्ध समाप्त हुआ
और  कृष्ण तुम्हें अपने साथ लेकर
द्वारका चले गए।
वहां से जब लौटने लगे
 कृष्ण ने तुमाहेर संरक्षण में रहने के लिए
दस हजार गोपियों को भेज दिया।
और जब गोपियां कमल-पोखर में
स्नान कर रही थीं
तुम पेड़ की ओट से उनके नग्न सौन्दर्य को देख रहे थे
एक सखी ने तुम्हारी कामुक भाव-दृष्टि को देखा
सभी गोपियों को बता दिया
और वे उस पोखर में जल समाधि ले ली
उस गोपी तालाब की मिट्टी चन्दन बन गई
किन्तु तुम्हारी कृष्ण को दी गई प्रतिश्रृति
इतिहास की कलंकित-कथा के रूप में चर्चित हुई
हे पार्थ!
यह तुम्हारी सबसे बड़ी हार थी
 कृष्ण के साथ जो तुम्हारा प्रगाढ़ संबंध था
उसके छिन्न-भिन्न होने की यही घटना आधार थी।

                                                                                   10 सितम्बर 2012








राजनीति की अपरम्परा

मंथरा जैसी कूटनी नहीं होती
तो केकैयी अपनी दो वचनों का पाशा
दशरथ द्वारा राम को अयोध्या का राजा बनाने
के ठीक समय पर न फेंकती
दशरथ द्वारा दिए गए दो बचन का परिणाम ही है
राम का 14 वर्ष का वनवास
राम-रावण युद्ध
पुरुषोत्तम राम की ऐतिहासिक विजय
अतः कैकैयी नहीं, मंथरा दासी होते हुए
अपनी कूटनीति में सफल हो गई
सत्ता की नींव हिला दी
14 वर्षों तक अयोध्या को शोक संतप्तता की आग में
जलने के लिए छोड़ दिया
राम जैसे बलशाली का पथ ही मोड़ दिया।
किन्तु पूरे रामायण में तुलसी ने शिष्टाचार से बंधे
मंथरा को दुष्ट ही माना
रामायण के मूलकारणों को पर्दे के पीछा रखा
और समाज में काली-कूटनीति को अपरिहार्य माना।

                                                11 सितम्बर, 2012

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