Wednesday, 26 December 2012

स्वार्थ घर

आदमी अपने स्वार्थों में डूबे
बनाते छोटे बड़े मन्सूबे
मुंह में फरेब की भाषा
मथती अन्तस की दुराशा
तरह तरह के आदमी
तरह-तरह के काम अजूबे

गहरे से कहीं से कोई बंधना नहीं चाहता
आत्मस्थ प्रेम-सागर के किनारे बैठ आंसू बहाता
अपनी हार पर, खोए हुए अतीत पर
वर्तमान के उन हिमखंडों को सहेजता
जो सुखान्ति के दिखते किन्तु दुःख का कारण बन जाते
कितने बड़े छोटे मान-अपमान के आइसबर्ग उनके भीतर डूबे

आदमी जन्म से मृत्यु पर्यन्त
छोटा से बड़ा बनने का सपना संजोता है
इसी कामना को साकार बनाने में, अशक्त, अकर्मण्य,
अपना वर्तमान खोता है।
कितने सारे हंसते, मौजमस्ती में डूबे
अनगिनत चेहरे हैं दूसरों का भाग्य छीनकर निजता की
गठरी कंधे पर लादे
लस्त-पस्त चल रहे बनाते नये-नये मन्सूबे
अपने स्वार्थ में डूबे।

                                                                     23 अक्टूबर, 2012





शब्दाचारी

चलो आज मैं शब्द बनूं
और तुम बनो मधुर मंजुल गान
जिसके मधुर स्वर से
भर जाए सुखानन्द, सुरभित,

सौम्य-सुखान्वेषी अंतर का खालीपन
आह्लादित हो संप्रेषित नव-प्राण

दिग-दिगन्त में छा जाए नवविहान
टूट जाएं सभी बन्धन
जड़ता उन्मुक्त हो जीवन की हर तान
दुख, विषाद, अवसाद से हो मुक्त
अभाव-संकट से हो परित्राण
छा जाए जगती में चारों ओर
भव्य आलोप्रभा दिव्य नवप्राण।

                                          24 अक्टूबर, 2012







सन्धि पथ

सन्धिपथ सन्धिपथ सन्धिपथ
आलोकित हो अन्धकार में डूबा पथ
प्राण चेतना  की अग्नि प्रज्वलित हो
नव-आह्लादित, नव-संप्रेषित हो आनन्द गान
धरती से आकाश तक
मनुष्य हो जाए सौहार्द्र में संलिप्त
पराजित हो संकुचित, पराजित, जीवनमान
अपना शक्तियां दें नीरस शुष्क जीवन को
नव ज्योति-प्रभा, नवानन्द, नवयुग-छन्द
हृदय-पुष्प हो पराग भरा मधुमन्त हो मकरन्द
हमारे भीतर जो कर्ता है महान
देखता सब कुछ और वह भी
जो हमें दिखाई नहीं देता दृष्टि पथ
सन्धिपथ,  सन्धिपथ,  सन्धिपथ,
ऐसा हो दाता का प्रसाद जहां गरल भी हो जाए सुधा
सब तरह से मुक्त हो जीवन, मिटे जन-जन की क्षुधा
अग्नि, हवा, महासिन्धु, अन्तरिक्ष, धरा
जीवन को करे सुख-सौंदर्य भरा
कंटकाकीर्ण रक्त-पथ-श्लथ हो प्रशस्त
सन्धिपथ,  सन्धिपथ,  सन्धिपथ।

                                         25 अक्टूबर, 2012







अकेलेपन का पाखी

ओ पाखी, तिनका लिए चोंच में
तु किस क्षितिज में उड़ेगा
किस आम्रकुंज में
किस सघन जंगल में
किस वृक्ष की डाल से जुड़ेगा
ओ पाखी, तू अकेला नीड़ का निर्माण करेगा
अपने लिए अथवा अपनों के लिए
कि नन्हें शावक सुख से जिए
ओ पाखी, तुझे वर्तमान-संकट से बचने की चिन्ता है
अस्तित्व को बचाने की चिन्ता है
किन्तु तुझे क्या उस तूफान के बारे में पता है कि जो
 भग्न संहारक बने घरों, चौपालों
वृक्षों को धराशायी करता
क्रूर सेनानायक की तरह
तीव्रगति से चला जाता है
ऐसे में तुम्हारे नीड़ का निर्माण कैसे बचेगा,

ओ पाखी, यह जीवन तुम जी रहे
तिल-तिल कर नीड़ का निर्माण कर रहे
जिस क्षण बज्रघाती तूफान आएगा
बादल, बिजली के साथ
घनघोर घटाओं से मिलाए हाथ
पता नहीं कब आए
और नीड़ को नष्ट कर जाए
ओ पाखी, अस्तित्व की आपाधापी में
तू जंगल को आत्मकथा का
एक अंश भर रह जाएगा
कौन, कितने दिनों तक याद करेगा
जीवन कर्मवृक्ष की छाया में
लोभ-लाभी क्षणों की भूल भुलैया से
जीवन नये कोणों से जुड़ेगा।


                                                         26 अक्टूबर, 2012








दुर्गा-भसान

माँ दुर्गा का भसान हो गया
किस तरह से रच रच कर चतुर शिल्पियों ने
देवी प्रतिमा का निर्माण किया
उन्हें रंगों, आभूषणों, वस्त्रों से सजाया
सबसे उत्कृष्ट कला कारी का मानदंड स्थापित किया
और वही हुगली के जल प्रवाह में डूबाई जा रही है
भला कौन
उन्हें डूबने से बचाए
पूर्ववत् सौन्दर्य मंडित करे नवनीत सुन्दर अद्वितीय
नए आनन्द-रव से भर दे
दिशाओं में नवगान नव प्राण,
नरनारी फिर से मनाए उल्लास
स्थापित हो कला का उत्कृष्ट प्रतिमान
मां दुर्गा, तुम्हारा इस तरह से तिरस्कार पूर्वक
लोगों का लोक रीति-आचरण
सौन्दर्य-शिल्प के साथ अत्याचार है
युग-नव जागरण के प्रति कुत्सित व्यवहार है
हे मां, आह! तुम्हें जल में निमग्नकर
बांस बल्लियों से ठोकर लगाकर गहरे में
भसान-उत्सव मनाना कितना वीभत्स है
यह जीवन और कला का परिहास है।
भसान एक माया - विश्वास है।

                                                                      27  अक्टूबर, 2012







इतिहास-समय-सत्य

इतिहास हमें नहीं बनाता
हम इतिहास बनाते हैं
इसी तरह जन्मते ही
बनते जाते रिश्ते नाते
ितिहास जीवन का दर्पण होता है
दर्पण के साफ सुथरा होने पर ही
समय का प्रतिविम्ब झलकता है
प्राण-संवेदना चित्र-विचित्र रूपों में चमकता है
समय ही जीवन को इतिहास बनाता हुआ चलता है।

हम कितनी सारी चेष्टाएं करते हैं
कितने सारे विन्दुओं पर जुड़ते विछुड़ते हैं
साध्य को परचम बनाकर
अपना वर्तमान सार्थक, मूल्यवान, अर्थवान बनाता
अथवा समय के गर्त में डूब जाता
वहां भी अकर्ण्यता और व्यक्तिपरक कुचेष्टाएं
जीवन को कर्महीन, कर्तव्यहीन, दीन हीन बनाते
और इतिहास बनाने को दौड़ में पीछे रह जाते
पृथ्वी, आकाश, समुद्र, अग्नि, हवा सभी
समय-गति से कर्तव्यनिष्ठ होकर
अपने को  सृष्टि सम्यक बनाते
किन्तु मनुष्य स्वेच्छाचारी, अहंकारी, बन जीवन भर
तृष्णालु, आकांक्षा और लोभ की झोली लिए
साम, दाम, दंड, भेद से उसे भरने की चेष्टाएं करता
ज्ञान और कर्म का सही सार्थक
और वस्तुनिष्ठ समष्टि सेवा से बंधना
नवयुग के परिवर्तन से जुड़ना ही इतिहास को बनाने का प्रयत्न करता
इतिहास हमें प्रतिपल बनाता है
किन्तु  आदमी इतिहास के सत्य को सदा कलंकित करते।

                                                                                      29  अक्टूबर, 2012








दुष्काल-नर्तन

काल का दुश्चक्र कब, कहां, कैसे
भीषण तम तांडव करेगा
कौन जाने?
देश के राष्ट्रपति से लेकर नौकरशाह तक आश्चर्य और
झुंझलाहट भरी आंखों से देखते हैं
भयानक तूफान का जानलेवा खेल
विज्ञान के आंकड़े भी नहीं समझपाते
नाही खगोल शास्त्री इस विपद्जनक स्थिति से
मुक्ति-मार्ग खोज पाते
अमरीका के भव्य शहरों, न्यूयार्क, न्यूजेर्सी,
बोसटन, कनेक्टी कट में तबाही मचाती हुई शैंडी
पूर्वी तटों को अस्त व्यस्त करती हुई
विध्वंस का जानलेवा खेल खेलती
सागर की ऊंची उठती लहरों पर बैठी
मनुष्य के कमजोर होने और
आश्रय के लिए भागते हुए दृश्य को
देखकर आनंदित होती
महाकाल का यह भयावह खेल
कितना भयावह, कितना विकास रोधक है
कितना कष्टकर है।

                                                                       30  अक्टूबर, 2012






अस्तित्व-अनस्तित्व


मैं अपने को बार-बार दोहराता हूं
शब्दों के घोड़े पर बैठकर
क्षितिजों के चक्कर लगा आता हूं
कितनी तरह से
सोए हुए लोगों को जगाता हूं
और अब विक्षुब्ध, संघर्षरत
सन्नाटा भरे माहौल के बीच
अपने को फिर से दोहराने के लिए
तरह-तरह के यत्न करता हूं
मैं अस्तित्व-अनस्तित्व की आग में जलता हूं
शब्दों के सहारे अभिव्यक्ति की राह पर चलता हूं।

                                                                       31  अक्टूबर, 2012





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