Thursday, 20 December 2012

राधा की अन्तरपीड़ा

महाभारत के युद्धोपरांत कृष्ण
मथुरा वृन्दावन का रास्ता छोड़कर
द्वारका का लम्बा रास्ता चुना
राधा के वियोग-आंसुओं की याद नहीं आई....

कृष्ण चाहते तो मथुरा-वृंदावन पधारकर
ग्वाल, गोपियों, राधा को स्नेह भरी प्रेमिल
सांत्वना और मिलन-आनन्द का
रास सर्जित कर सकते थे
किन्तु कृष्ण का मन जैसे मथुरा,  गोकुल
नन्दगांव, बरसाने से टूट गया था
वे फिर से प्रेम-व्यामोह में बंधकर
राधा-गोपियों के साथ पुनः रासलीला
नहीं रचाना चाहते थे
किन्तु हस्तिनापुर से विदा होकर
क्षण भर के लिए उनका ध्यान उदास
राधा के मलिन मुख की ओर घूम गया
मन ही मन राधा को स्मरण किया
कृष्ण के मुंह पर चिन्ता की विषाद रेखाएं घिर आईं
आकाश में बजने लगी दुंदंभी, बांसुरी स्वर उभरकर
ब्रह्माण्ड को स्पंदित कर दिया
अनन्त से एक आवाज आई
सबसे ऊंची प्रेम-सगाई।

                     18 सितम्बर, 2012



अंतर्घाती पीड़ा

एक माहौल में
एक ही तरह जीता हुआ
आदमी अपने अस्तित्व के प्रति
चिन्तित और उदास होता है
बेमौसम पावस का प्रच्छन्न घन
उसकी पलकें भिगोता है
अन्तर्घाती पीड़ा ढोता है।

                                19 सितम्बर, 2012




इतिहास हन्ता आवाजें

जागते जागते सो जाता हूं
इतिहास हन्ता आवाजें
शताब्दी के अंधकार में
तेजी के साथ उभरती है
उनके विपत्ति सूचक स्वरों को
भविष्य के काले दिनों की संकटबद्ध स्थियां गुनते हुए
अर्धोन्मीलित पलकों में
अलस-नींद भर सो जाता हूं

एक दर्द उभरता है हृदय के आर-पार
इतिहास की घटनाओं के साथ
महाभारत-युद्ध में तूणीर से छूटते वाणों
को धनुष की टंकार के बीच घायलों, मरने वालों के
हाहाकार के शब्द कानों में गूंजते हैं
गूंजते हैं रावण, मेघनाथ के क्रूर-अट्ठहास
राम, लक्ष्मण के धनुष-वाण की टंकार
इतिहास की घटनाओं में मैं खो जाता हूं।

                                            20  सितम्बर, 2012







अर्थ-अविन्यासी गीत

तुम कुछ बोलो मत
बस सुनो
शताब्दी का छन्दविहीन गीत
इस अविश्वासी, असहिष्णु, आत्मलोभी
रुग्ण मानसी-युग में
मुश्किल है पाना एक सच्चा गीत...

फिर भी कितनी सारी यंत्रणाएं भोगते हैं
कितनी तरह से अपना सुख संयोजते हैं
अनन्त काल से चली आ रही
दुख-सुख को प्रवंचित रीत..

दुख-सुख की आंख मिचौनी खेलता
हमारा समय कभी पास
कभी दूर से स्मृतियों का माया जाल फैलाता है
परोक्ष-अपरोक्ष सपनों को
पूरा करने का राज बताता है
खोलता है राज मौसम के बदलते परिवेश में
मन में छिपी संप्रीत
बोलो मत, सुनो, सुनो, सुनो
समय का अर्थ-विन्यासी गीत

                                      21  सितम्बर, 2012







सर्जन का स्वरूप

वह कौन है जो सृष्टि-जाल में
सर्जन और विनाश की सारी लीला समेट लेता
वह कौन है, जो प्रकृति के विविध रूपों को रचता,
शक्ति-पुंज-प्रकाश अथवा निविड़ अंधकार फैलाता
वह कौन है, जो पृथ्वी तथा समस्त लोकों की
उनके अधिपतियों की रचना कर उनका अधिष्ठाता बन जाता
वह कौन है, जिसकी लीला अतर्क्य, अवणीनीय है
निर्विकार, अदृश्य, हमारे बाहर-भीतर व्याप्त है
वह कौन है, जिसकी इच्छा मात्र से
प्रकृति का सर्जन-विसर्जन होता
वह कौन है, जिसकी शक्तिओं के विरुद्ध
कोई भी, कुछ भी नहीं कर पाता
वह कौन है जो हमारे भीतर बैठा रहता
सर्व ब्राह्माण्ड-व्याप्त है
जीवन में सुख-शांति के लिए उसका स्मरण ही पर्याप्त है।

                                                                                    22  सितम्बर, 2012








प्रेम की नदी

प्रेम की नदी बहती है अबाध गति से
साहसी उसके भीतर आकर तैरते हैं
आनन्द तरंगों में सुखानुभूति से आह्लादित होते हैं
डुबकियां लगाते सांस खींच
तैरते लहरों के बीच
उनके लिए जीवन होता सुन्दर, सुखकर
वेद, उपनिषद, रामायण,
महाभारत, श्रुतियों की कथाओं में यही वर्णित हैं
प्रेम की मर्यादा पुरुषार्थ से बंधी होती
चाह की कसौटी आकांक्षा से सधी होती
आदमी बंधा होता प्रेम रति-गति से

प्रेम की नदी हर युग में बहती द्रुत गति से
कुछ हैं जो दरश-परस से सुख पाते,
कुछ हैं जो तट पर बैठ हृदय-घट भर ले जाते
कुछ हैं जो धारा में अवगाहित होकर
आनन्द-राग से उत्फूल्ल होते
लोभ और अहंकार से सूखती प्रेम- नदी की धारा
संगति और असंगति से।

                                                                  24  सितम्बर, 2012






मैं भूख हूं

मैं भूख हूं
सदियों से सारी दुनियों में परिवर्तन की हवा बनकर
दिशाओं को रौंदती आईं हूं
मिटाती आई हूं सत्ता और सिंहासन की शान
तहस नहस करती आई हूं आदमी का स्वाभिमान
इतिहास गवाह है-
राजमहलों के भग्नावशेष यह कहानी कहते हैं
कैसे भव्य-एकाधिकार को नष्ट किया
कैसे जलाया मनुष्य के भाग्य का दिया
कैसे कैसे दुख के तवे पर
अभाव की रोटियां सेंकती आई
कैसे कैसे स्वयं भूखे रहकर बच्चों को रोटी के टुकड़े खिलाई
प्यार किया और
मृत्यु की नदी में उन्हें फेंकती आई
निरुपाय, अवश, सजल आंखों से उन्हें
पानी में डूबोती आई
उनकी कातर चीत्कार सुनती हुई
युग की सीढ़ियां चढ़ती आईं।


                                  25  सितम्बर, 2012








पांचाली की असमर्थता

महाभाहत युद्ध में
केन्द्र विन्दु में रही पांचाली
जो इतिहास से एक अनुत्तरित प्रश्न पूछती रही
दुःशासन को शीश-महल में गिरते हुए देखकर
मुझे हंसी क्यों आ गई?
उसी क्षण
हस्तिणापुर की माटी में
प्रतिहिंसा का बीज अंकुरित होना शुरू हुआ
जो सघन-वृक्ष बनकर
महाभारत युद्ध का कारण बना
भरी सभा में कौरवों-पांडवों के महाबलशाली योद्धाओं के बीच
दुःशासन के हाथों बलात्कारित होते
उसका वस्त्र उतरते हुए सभी देख रहे थे
महामना भीष्म भी क्यों मौन थे?

मैं युद्ध रोक सकती थी
कुंती युद्ध रोक सकती थी
गान्धारी भी युद्ध रोक सकती थी
किन्तु नारी शक्ति पुरुष-शक्ति के सामने पराजित हुई
नीति और नीयति से
अहंकार-मति से उस समय
हो गई थी पराजित, एकाकी पांचाली
स्त्री-अपमान कोह संहारक, महाविनाशकारी युद्ध में

                                                           26  सितम्बर, 2012







प्रेम, सौन्दर्य का अलाव

प्रेम और सौन्दर्य
मनुष्य को महान बनाते हैं
और उनका अपमान
उसका सर्वस्व ध्वस्त करते जाते हैं
मनुष्य के भीतर
तरह-तरह के आत्म-लोभ के अलाव जलते
जिन पर वे कामना की रोटियां सेकते
नादान वे हैं कापुरुष
जो अपनी हविश और आंसुओं से
अलाव को ही बुझा देते ।



                                                          27  सितम्बर, 2012






संतप्तता

एक शून्य से दूसरे शून्य तक
अकेले चलते जाना है
हमें अपना रास्ता स्वयं बनाना है
यूं तो जीवन में संबंधों का चिर-विचित्र ताना-बाना है
शून्य से चलकर
शून्य में ही समाहित होते जाना है।

पृथ्वी की सुरम्य हरीतिमा
बदलते मौसम
हमारे भीतर सर्जित करते विश्वास, आस्था एवं प्रेम
और यह भी कि कर्म ही धर्म है
जिसे समझ पाने में
जीवन का झेलना होता  दुष्चक्र
बस अपने अभीष्ट के लिए
गन्तव्य-पथ पर चलते जाना है।


                                                    28  सितम्बर, 2012






अंतिम यात्रा का पड़ाव

आ गया हूं सागर-तट पर
जो सागर मेरा आजन्म अंतरंग रहा
वह अपनी उदवेदना के हाहाकार में
आत्मस्थ, आत्म-अनुरक्त, आत्म-पियासाकुल
महाउद्वेलन में लहराता
तट को बार-बार छूने आता है
उसे प्रच्छालित करता,
अपने प्रचंड आक्रोश से
जलमग्न करता
उजाड़ता बेशुमार जन-जीवन, पशु-पक्षी, सघन वन
घर, गांव, शहर
और संसृति का भरा-पुरा जीवन
उसी सागर-तट पर खड़े होकर
उसके विशाल रूप को देख रहा हूं
अपने भीतर उसकी मौन-क्रांति -छन्द को
ग्रहण कर रहा हूं
जो जीवन पर्यंत सुनाता रहा अपना रौद्र स्वर
उसी आकर्षण में बार-बार आ जाता उसके तट पर


                                                                                   29  सितम्बर, 2012











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