Tuesday, 18 December 2012

प्रेमाश्रयी

क्या हो जाता है कभी-कभी
ऊब होने लगतीहै अपनों से
व्यर्थ लगने लगते हैं संबंध सभी
और धीधीरणावती मेधा भी हो जाती व्यर्थ
इस शरीर को लिए खिड़की से पार
विस्तृत आकाश की नीलिमा देखता
एकाकीपन बुनता...

क्या हो जाता है कभी-कभी
विविध रंगों वाले फूलों के बीच गुजरते हुए
जब उनके सौन्दर्य और सुगन्धि से
मन उत्फुल्ल हो जाता
दूर नदी-तट पर कोई बांसुरी बजाता
और उसके स्वरों से नया गीत गुनता...

चित्त शांत करने का यही उपाय है
बन्द घर से बाहर निकलकर
प्रकृति के उपादानों से हाथ मिलाना
अपने भीतर नवोल्लास लाना
शायद इसीलिए मैं नितांत एकाकीपन के बीच
प्रकृति के प्रेमाश्रयी संबंधों को चुनता.. ..

                                      1 सितम्बर 2012





शब्द-चित्र

छोटे-छोटे घटनाक्रम के चारों ओर
घूमता है शब्द-चित्र  का नव प्रारुप
जिसमें वे स्थितियां परोक्ष अथवा अपरोक्ष
झलकती है जिनसे बना है मन का प्रतिरूप

इतिहास हन्ता घटनाएं
मन मस्तिष्क को रौंदती हुई
भागती हैं एक दिशा से दूसरी ओर
चाहे रात का निविड़ अंधकार हो
अथवा सप्तरंगी भोर अनूप

जीवन छोटी-छोटी घटनाओं से निर्मित होता
बड़ी घटनाओं के बीच असंतुलित
अपनी अस्मिता खोता
बना रहता कूप मंडूप...।

                                         3 सितम्बर 2012








अतीत - दंश

मैं अपने अतीत को जितना ही भूलना चाहता हूं
पलकों में खाली आकाश का सूनापन घिर आता है
स्मृतियों की शुभ्र बलाकाएं उड़ती है मस्तिष्क क्षितिज के आरपार
टूटता हुआ संबंध सेतु याद आता है बार-बार
भूलकर भी पुरानी घटनाओं को पहचानता हूं।

प्राण चेतना को स्पंदित करती
गुजरे समय की व्यथा-कथा उभरती है
एक गहरा कुहासा छाया रहता दिमाग पर सर्वदा
प्रतिदिन सबेरे आत्मचिन्तन  से
अतीत का कूड़ा बुहारता हूं....

कुछ ऐसे संदर्भ हैं जिनसे जुड़कर टूटा
फिर टूट कर जुड़ा
यूं तो आया अवसर आत्मीय संधि का एक से एक अनूठा
समय के अस्तबल में
रेस के घोड़े की तरह सेहत सुधारता हूं...


                                             4 सितम्बर 2012








राधा रानी की व्यथा कथा

राधा-रानी भूखी प्यासी चिन्ताग्रस्त जागती रही
कौन जानता है भला कि बरसाने -
जमुना-तट पर सूर्य देव से
अट्ठारह दिनों के महाभारत युद्ध में
कृष्ण की  विजय की प्रार्थना करती रही दिन-रात
प्रिय कान्हा, की कुशलता के लिए यमुना से अनुनय-विनय करती रही
कौन जानता है कि पांडवों और कौरवों के महायुद्ध में
कृष्ण की विजय के लिए ईस्ट देवताओं से करती रही प्रार्थनाएं
और जब कक्षारों में बसे नीड़ों से उड़कर बलाकाएं
यमुना जल में खोजती थी अपना शिकार
तब उनसे भी राधा ने यही कहा था
कृष्ण विजयी हों महाभारत युद्ध में
लौटें  नंदग्राम, रासलीला भूमि की ओर वृजधाम
लौटें विजय गर्व से आह्लादित मनमोहन महालीला नायक
मदन गोपाल श्याम
किन्तु हे राधे आज भी
तुम्हारे प्रार्थना के स्वर गूंजते रहे
सारा विश्व भूवन धाम
भले ही दोनों युद्ध के बाद
नहीं लौटें वृंदावन धाम।
कृष्ण और बलराम।

                                                              5  सितम्बर 2012










शाम का विपर्यय

शाम आती है पश्चिम क्षितिज से
आहिस्ता-आहिस्ता
मेहावरी पांवों को धरती पर रखते ही
घिर आता अंधकार
आंखों की पुतरियों में
स्मृतियों के बादल उमड़ते-घुमड़ते
और अश्रुकणों  की बरसात होती
टूटे हुए संबंध सेतु के बीच खोजता
स्नेह का भग्न धूमिल रिश्ता
काले आकाश में लिप्टा
शाम की मुस्कान से
चमकते हैं अनगिन तारे
जो आकाश में अकेले घूमते बनकर खगोल यात्री
संप्रीति के मारे सर्जित करते
विश्वभूवन में अनास्था
खोज नहीं पाते प्रकाश का रास्ता।


                                                       6  सितम्बर 2012










सुख के आयाम


सुख के अनेकों आयाम
बनते विगड़ते रहते
क्षण-प्रतिक्षण सुबह शाम
यत्न से संजोए गए सपने
जब विखरने लगते हैं
हमारे भीतर और बाहर
प्राणा संवेदना के चित्र सुलगते हैं
अंतराल में समय-प्रवाह के श्रोत बहते

                                                               7  सितम्बर 2012







विविध पंथानुगमन


सुख के रास्ते बहुत सारे हैं
कोई छोटा, बड़ा,
कोई लम्बा चौड़ा
कुछ संघातिक, कुछ न्यारे

कई रास्तों से चलकर
अब मैं आ गया हूं एक ऐसे मोड़ पर
जहां से महाकाल-सिन्धु की ओर चलना है
और यह भी कि
जितने रास्तों पर चला
तेज, डगमग, पथहारा, थका, रक्त लथपथ
वे सब और उनका व्यामोह सिर्फ छलना है।
सुख के दिन प्यारे हैं
और दुख में पग-पग पर अंधियारे हैं...

चलता हूं पग-श्लथ
अपनी अस्मिता और विश्वास के सहारे
ऐसे में सुन्दर शब्द कृतियां सर्जित करता
जिनके सौन्दर्य-भाव-छन्द सबसे न्यारे हैं
जीवन-यात्रा के लिए वही आत्म-बोध प्यारे हैं।

                                                               8  सितम्बर 2012








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