Tuesday, 18 December 2012

मृत्यु-चक्र



 प्रत्येक मनुष्य मृत्यु से भयभीत हो जाता है
वह यह जानता है कि उसने कुछ किया, जिया
जितना कुछ कमाया, पाया
किन्तु कुछ भी साथ नहीं जाएगा
सब कुछ यहीं धरा का धरा रह जाएगा
पृथ्वी जो भी देती है, वह सब ले लेती है
फिर भी मनुष्य लोभ का तिनका पकड़े
समय-जीवन-महासागर में
असमय की रौद्र-लहरों के बीच बचता, बचाता
अन्ततः अस्तित्व खोता है

मृत्यु चाहे जितनी असह्य, भयानक और त्रासद हो 
हमें कर्म-अकर्म के अन्तराल में डुबोती है
फिर भी हम मृत्यु से कहां डरते हैं
जो चाहते वहीं करते हैं

हमें मृत्यु वरण करना ही होता
कभी भी, किसी भी क्षण
प्रकृति की विभीषिका हो या
सहज-असहज प्राणघातक घटना-दुर्घटना
प्रत्येक समय हमें सचेत करती
कुशल तैराक की तरह
काटना है हिल्लोलित लहरों का उद्वेलन

समय-चक्र पूरे शौर्य के साथ सहना है
क्षण-प्रतिक्षण चैतन्य रहना है
जब तक जान है, जहान है
आंख मुंद जाने पर तन, मन, धन, जीवन निष्प्राणवान है

                                                            18 अगस्त, 2012






मेघावरी

यादों के बादल कारे कजरारे
उमड़ते, घुमड़ते, घिरते वरसते
और पल भर में यूथ भ्रष्ट छिटक जाते और दोबारा
हवा के हाथ में हाथ डाले गरजते लरजते लौट आते
मन-वृक्ष को सरस करते, हर्षातिरेक में
बरसते और क्षण भर में नदारत हो जाते
भाद्र मास के बादल
शरत् के पदचाप से परिचय कराते
नवरात्रि, देवी पूजन, दीपावली का आमंत्रण दे जाते
घर बाहर आनन्दोत्सव सजते
अचानक ही भादौं के सघन कजरारे बादल
अतीत के भंडार-ग्रह से लाते स्मृतियां
कुछ लाल-पीले गुलाल लिए आते
कुछ सुधियों की पंखुड़ियां
मन की थाल में डाल कर
क्षितिज की ओर चले जाते
भाद्र की वर्षा फुहार सुधियां लाती जलभरी
और आने वाले समय से परिचय कराती मेघावरी

                                                                           19 अगस्त, 2012








हवा की गति

देख रहा, सुनहरा हवा का रुख
कभी आहिस्ता, कभी तेज
विनाशक प्रचंड तूफान को जन्म देती
सर्जित करती काली सफेद वर्दी में सजे
बादलों की फौज
जो आक्रमक बनकर घिरते, घेरते
डूबा जाते, बरसते, सरसते, जलमग्न करते
रास्ते गांव, घर, खेत, खलिहान
नगर की सड़कों को करते बेहाल

चलती है पागल हवा आक्रामक 100 की रफ्तार में
भूपातित करती वृक्ष, लताएं, फूल
घर, अहालिकाएं
सागर-लहरों की बांह पकड़
ऊंची उड़ान उड़ती हवा
हमारे अस्तित्व को मिटाती
नाचती है जैसे बेताल...

हवा हमारी एक जरूरत है
वहीं तो मौसम सर्जित करती
वर्षा, शीत, ताप, मौसम परिवर्तन देती
हवा के बिना जीवन नहीं
अस्तित्व के सर्जन और विसर्जन वही देती
हरीतिमा-सुख नवोन्तान आनंद-मन-मराल

                                                                              21 अगस्त, 2012

No comments:

Post a Comment