Friday, 16 March 2012

छल की थाती

मैं अपनों से ही छला जाता हूं
फिर भी अपने पथ पर चलता चला जाता हूं
चलना और चलते जाना खाली हाथ
बिना साथ
अकेलापन और निस्तब्ध सन्नाटा घेरता है चारों ओर से
देखते देखते उम्र के अलावा में पिघलाकर
कर्म के हथौड़े से नए-नए रूपों में गढ़ा जाता हूं...

चलता है समय कभी हमारे साथ
कभी आगे आगे
और हम भागकर भी उसे पकड़ नहीं पाते
बस अपने अहम् की अन्धकारा में बंद रहते हुए
विघटित आस्था की गठरी लिए
खाली हाथ चलता जाता हूं..

हमारे भीतर राग-विराग, सुख-दुख, हर्ष-विमर्ष,
मान-अपमान, कर्म-अकर्म के दरख्तों को
उजाड़कर अपने साथ उन्हें भी जला जाता हूं
समय से किस तरह छला जाता हूं।

9 मार्च, 2012


जन-संदेश -गान
चुपचाप चुपचाप जीना नहीं
चुपचाप नहीं बहती नदी
चुपचाप नहीं लहराता सागर
चुपचाप नहीं घिरती मेधावली
इन सब में शब्द गान उजागर होता
चुपचाप सहना नहीं जीवन की त्रासदी
चुपचाप प्रेम-विष पीना नहीं...

धरती देती तरह तरह के सुख-आयाम
पर्वत देता शांति का संदेश
देता आकाश अंतहीन ऊंचाई
प्रकृति देती सौन्दर्य वैभव अभिराम
प्रेम व्रेम क्या है? बस दिल का लगाव है
दर्द की फटी चूनर सीना नहीं..

जब सब ओर हो अंधकार
एकाकी रास्ता हो, सुनामित पारावार
मंजिल तक चलना हमारा अधिकार है
आशा, विश्वास से, मनके उजास से
हमारे भीतर ही बसते खुदा, ईश्वर, ईशा, राम, घनश्याम
गुरुनानक, बुद्ध, महावीर, दिव्यज्योति, कृष्ण राम
जन-जन की पीड़ा अपनी है
खुदगर्जी का जीवन जीना नहीं
चुपचाप चुप चाप जीना  नहीं।


खोल दो पंख...
खोल दो अपने पंख
मेरे साथ उड़ना है
मुक्त आकाश में छितिजों के आर पार
नए-नए संदर्भों से मुक्त मन जुड़ना है
दुराशा, क्षोभ, दुःख, प्रवंचना के अंधकार को छोड़
व्यामोह, कलुष जीवन से नाता तोड़
प्राण में आशा और विश्वास का मंत्र लिए
विजय आनन्द गीत गाते, जन-जन में
समवेत स्वरों से यह अहसास जगाते हुए
कि हमें नई ऊंचाइयों से जुड़ना है
खोल दो पंख अपने असीम में
आत्म विश्वास लिए स्वच्छन्द उड़ना है।

12 मार्च, 2012

पत्थर तोड़ती औरत
वह दिन भर पत्थर तोड़ती है
शाम ढलने पर थकी हारी भूखी प्यासी
अपनी जर्जर झोपड़ी में लौटती है
जहां दो अदद आंखें प्रतीक्षा करती हैं
मां आएगी, रोटी बनाएगी, तब खाऊंगी
लेकिन घर पहुंचते ही मां तलाशती है
चावल, आटा, दाल, तेल, नोन
और फिर झोला उठाकर बाजार की ओर भागती है-
बच्ची घुटनों में मुंह डाल कहती है- मां चाकलेट लाना।
मां कुछ बोलती नहीं, आंखें सजल हो जाती हैं।
सोचती है दिन भर कठिन मेहनत करने पर
पचास रुपए मिले हैं, उनसे रोजमर्रा की चीजें
जुटा पाना कठिन होता है। नन्ही, अनजान
बिटिया की मांग को कैसे पूरी करूं।
मां शीघ्रता पूर्वक बाजार से सौदा शुलक लेकर
घर वापस आकर चूल्हा चला देती है
आंटे को गूंथते हुए आंसू चू पड़ते हैं।
लड़की रोती है, उसे चाकलेट नहीं मिले
एकाकी वैधव्य का बोझ लादे अकेली अबला
कैसे जिए, कैसे जिलाए छोटी सी बच्ची,
कैसे उसकी फरमाइसें पूरी करें।
वह अबोल, मौन पत्थर के देवता के सामने
मन्नत मांगती है - हे ईश्वर मेरी बेटी को
खुश रखो, इस अभावग्रस्त जीवन से मुक्त करो
वह बहरे देवता से सजल आंखों हाथ जोड़ती है
दिन भर पत्थर तोड़ती है।

No comments:

Post a Comment