Friday, 9 March 2012

कविगुरु रवीन्द्रनाथ और बांग्ला साहित्य

बंग्ला साहित्य, लोक संस्कृति और बंगाली स्वाभिमान के केन्द्र विन्दु गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर हैं। एक संवेदनशील कवि हृदय, ठाकुर परिवार के राजकीय ठाठ बाट, ऐश्वर्य में पले, संभ्रांत मानसिकता से संपृक्त नहीं हो सका। कैशोर्य काल में उनके भीतर आत्म-सौंदर्य की विविध रूप छठा नव अभिव्यक्ति, नये-नये परिवेश में उत्सृज होने लगी। उनका मन चंचल पंछी की तरह कभी कलकत्ता में चितपुर स्थित भव्य प्रासाद के विशाल  प्रांगण में विचरता, कभी छत पर उमड़ते-घुमड़ते बादलों को देखकर अति प्रसन्न हो उठता। कालीदास के मेघ उनकी आत्मा को रस-अनुरक्त करते रहे।
गोरा साहबों की ऐय्याशी भरी रंगरेलियां, गरीब असहाय भारतीय मध्यवित्त परिवार की ललनाओं के रूप लावण्य का शोषण, दासता का तांडव तथा तथाकथित भद्र बंगाली महाशयों का अंग्रेजों के साथ मिलकर बंग बालाओं के चारित्रिक रूपकथा का दुखान्त पटाक्षेप, इन सभी घटनाओं का असर रवीन्द्रनाथ की किशोर चेतना को दुखी और अकेला छोड़ दिया। राज परिवार का कोई सुख उन्हें रास नहीं आता था। वे एक तरह से मन से दरिद्र राजवंशी थे। स्वतंत्र पंछी की तरह उन्मुक्त विशाल आकाश में उड़ना चाहते थे और यही सोच उन्हें शांतिनिकेतन के निर्जन आम्र, पलाश, नारियल के पेड़ों के बीच खींच ले गई जहां वे खूब लिख रहे थे, कविताएं, नाटक, कहानियां, उपन्यास, रम्य-रचनाएं आदि। रंग मंच भी स्थापित किया। 1901 में शांतिनिकेतन की स्थापना की। पौष मास की पूर्णिमा को स्कूल आरंभ किया। नाम रखा विश्व भारती। श्री निकेतन में हस्तशिल्प-स्कूल आरंभ किया। इसके लिए उन्होंने अर्थ जुटाने के प्रयास में पत्नी श्रीमती मृणालिनी देवी के गहने तक बेचे।
जब गांधी जी शांतिनिकेतन में कवि के आमंत्रण पर विशेष अतिथि के रूप में आए थे। गांधी जी को कवि ने कहा, हे महात्मा, आप धन्य हैं। आजादी की लड़ाई में मैं भी आपके साथ काम करना चाहता हूं। गांधी जी ने मुस्कराते हुए कहा- कवि गुरु आजादी की लड़ाई में आपका स्वागत है। उसी दिन से गांधी जी महात्मा कहलाए और कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, कवि गुरु के नाम से प्रसिद्ध हुए।
कवि गुरु प्रतिदिन नियम पूर्वक चार बजे उठते थे। नित्य कर्म से निवृत्त होकर शांतिनिकेतन के भीतर-बाहर टहलते थे। फिर किसी वृक्ष की जड़ों पर बैठकर पंछियों का कलरव सुनते, कविताएं लिखते। कविगुरु की 1919 से 1939 तक की जितनी कविताएं हैं, उनमें किसी न किसी पंछी स्वर की अनुगूंज प्रच्छन्न रूप में सुनाई देती है। इस बात को रवीन्द्र संगीत की श्रेष्ठ गायिका सुचित्रा मित्रा ने एक बार बातों बातों में कह दिया। उनके गीत स्वरों में कोकिल, हारिल, मैना तथा अन्य पंछियों के बोल का माधुर्य मिश्रित है।
रवीन्द्रनाथ सिर्फ एक कवि, साहित्यकार की नहीं थे एक किसान के रूप में 1890 से 1941 तक शांतिनिकेतन के भीतर बाहर, पाठशालाओं, चिकित्सालयों, सड़कों, तालाबों, सहकारी बैंकों के गठन आदि का कार्य किया तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित करने के लिए हर साध्य प्रयास किया जिससे किसानों की गरीबी से भ्रष्ट साहूकार, सूदखोर मनमाने ढंग से फायदा न उठा सकें। लोभी वकीलों के चंगुल से बचाकर मुकदमें बाजी के झंझटों से छुटकारा पा सकें। वे शांतिनिकेतन के गावों में स्वशासन प्रणाली विकसित करना चाहते थे और इसके लिए कारगर यत्न किए। वर्ष 1913 में उन्हें नोबुल पुरस्कार मिला।
उन्होंने उसमें से पचास प्रतिशत के लभभग कृषि सहकारी बैंक में निवेश किया जिसका गठन उन्होंने खानदानी जागीर वाले गांव पातिसर में किया था। इससे किसानों को कम ब्याज दर पर ऋण की सुविधा मिली और शांतिनिकेतन विद्यालय को निवेश की गई राशि के ब्याज से एक निर्धारित वार्षिक आय प्राप्त होती रही। रवीन्द्रनाथ के मन में जनजीवन के प्रति अद्भुत लगाव का भाव था। वे आम लोगों के जीवनस्तर को उठाने, उनके हर्ष और दुख-सुख, उनके प्यार और प्रतिकार, उनके बहादुरी के कारनामों, अन्याय और अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष से जुड़े रहे, एक खास किस्म का आत्मीय संबंध बनाए रखा। शांतिनिकेतन ग्रामीण, बनांचल में उन्होंने विकास की एक प्रक्रिया को जन्म दिया। उन्होंने सर्वधर्म समभाव समर्थन दिया। हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, आर्य, बौद्ध आदि की धार्मिक प्रवृत्तियों के प्रति तटस्थ रहे और शांतिनिकेतन ब्रह्म समाज मन्दिर की स्थापना कराई। उन्होंने किसी विशेष विचार धारा का अनुसरण नहीं किया। हमेशा जीवन पर्यंत अपनी आत्म-संवेदना को आरोपित होने नहीं दिया। उनके काव्य-जीवन के प्रथम और द्वितीय भाग में बंगला साहित्यकारों, विशेषकर आलोचकों ने उनकी कविताओं, नाटकों, कहानियों पर कटु मनोवृत्ति अपनाई। उन्हें नकारा। उन्हें राजकवि, गवैया, नचनियों आदि संबोधनों से दर किनार किया,  परन्तु 1913 में जब उन्हें नोबुल पुरस्कार मिला। वही विरोधी साहित्यकार महानगर कलकत्ता से झुंड बनाकर उनसे मिलने शांतिनिकेतन पहुंचने लगे। गुरुदेव ने ऐसे विकृत मानसिकता वाले साहित्यकारों से मिलना तक उचित नहीं समझा। वे खिसियाए, खाली हाथ मलते वापस चले गए। उनके जोड़ासांकों राजबाड़ी में भी कई उत्सव आयोजित किए गए; उसमें भी अहंवादी छुटभइए साहित्यकार आमंत्रित नहीं थे। फिर ऐसे साहित्यकारों ने अपनी हार मानी  और कवि के साहित्य पर सकारात्मक रुख अपनाया। उनके साहित्य को आलोचित विश्लेषित किया जाने लगा और रवीन्द्रनाथ को लेखन में अपना गुरु माना।
रवीन्द्रनाथ ने बेहद भावुक, कल्पनाशील, प्रकृति प्रेमी, सौंदर्य रस से परिपूर्ण, अद्वितीय विचार मग्न कोमल कविताएं लिखी। उन्होंने अतीत की स्मृतियों, वर्तमान के संघर्ष और भविष्य के अनदेखे सत्य से अपने को जोड़ा। जैसा कि स्वभावतः किसी भी कवि के हृदय को पहले प्यार की यादें सताती हैं। गुरुदेव भी इस मामले में अछूते नहीं रहे बल्कि दस कदम आगे बढ़कर प्रेमाभिव्यक्ति के गहरे में डूबकर अत्यंत कोमल कविताओं की रचना की। प्यार की यादें जब सताती हैं तो मनुष्य नितान्त अकेला होता है। मौन का कुहासा उसके चारों ओर घिर जाता है।
कवि कहते हैं - 
मैंने कहा था - मैं नहीं भूलूंगा
जब तुमसे आंसुओं से धूमिल आंखों से मेरी ओर देखा था
क्षमा करना, अगर मैं भूल गया
एक अरसा हुआ उस बात को
मेरी आत्मा पर छाप है तुम्हारी काली आंखों की
प्रेम का पहला काव्य पत्र, शर्मीला और सहज
उनके ऊपर तुम्हारे हृदय का हस्ताक्षर
समय ने फेरा था अपनी कूची का आघात प्रकाश
और छाया पथ पर
अगर आज का वसन्त होता है निस्तब्ध
पूर्व वसन्त का संगीत
अगर मेरी पीड़ा के प्रदीप की लौ
चुपचाप विदा हो गई
तो क्षमा करो
मैं इतना ही जानता हूं कि तुम मेरे जीवन में आई
और मेरा जीवन भर गया गीतों की ऐसी फसल से
कि जिसकी विपुलता का कोई अन्त नहीं।

कवि गुरु का अन्तर्मन हमेशा उद्गिन रहता था। इसीलिए वे भारत तथा विदेशों में अधिक यात्राएं करने के लिए कार्यक्रम बना लेते थे। 1912 में ग्यारह देशों की यात्राएं की। इन यात्राओं में कई सुप्रसिद्ध लेखकों के साथ परिचय हुआ। ईट्स, विलियम रोथेस्टाइन उनके अच्छे प्रशंसक बने। उन्हीं की सहायता से कवि ने अपने गीतों के संकलन गीतांजलि का अंग्रेजी अनुवाद तैयार किया जिस पर उन्हें नोबुल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। पुरस्कार से प्राप्त एक लाख बीस हजार रुपए शांतिनिकेतन को दे दिया। यायावरी प्रवृत्ति बड़े कवि का स्वभाव बन जाती है। कवि ने कई जगह अपने प्रवास के लिए घर बनवाए अथवा बना बनाया घर खऱीदा-दार्जिलिंग, कर्सियांग, रांची, कटक, पुरी आदि जगहों में कवि गुरु प्रायः जाकर रहते थे। प्रकृति के साथ उनका सम्मोहनक संबंध उनकी कविताओं को ऊर्जा प्रदान करता था। कवि के लिए प्रकृति-प्रेमी होना, स्वच्छन्द विचरण करना रचना प्रक्रिया के लिए जरूरी होता है। विविध संदर्भों  से जुड़ना, अपने को भीतर से खोलना कवि का स्वभाव होना चाहिए। समष्टि के प्रति प्रेम भावना की अभिव्यक्ति कविता का महान बनाती है। कवि गुरु अपने लेखन में बेहद व्यस्त रहते थे। बहुमत कम लोगों से मिलते थे और जब किसी से मिलते थे तो अपनी कविताओं पर चर्चा करने से बचते रहते थे। बस कुछ व्यक्तिगत बातें कर लेते और उठकर भीतर चले जाते। रवीन्द्रनाथ का अपना स्वभाव था, अपना मूड था, उसमें कोई दखलंदाजी नहीं। कोई व्यवधान नहीं। वे स्वतंत्र मनश्चेता के स्वच्छन्द कवि थे।
कवि गुरु ने बड़े आर्थिक संघर्ष से विश्वभारती का विस्तार किया, हिन्दी भवन की स्थापना की। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे विद्वान को हिन्दी भवन का प्राचार्य बनाया। उनमें हिन्दी, हिन्दुस्तान हिन्दू के प्रति असीम आदर भाव था, लेकिन वे ब्रह्म समाज का मंदिर भी शांतिनिकेतन में बनवाया। वे बंगला और हिन्दी को सहोदराएं कहते थे। बंगाल से बाहर जहां भी जाते बातचीत में हिन्दी का प्रयोग करते थे। उन्होंने गांधीजी के अनुरोध पर वर्ष 1920 में गुजरात विद्यापीठ के दीक्षान्त समारोह में हिन्दी में भाषण दिया और भी कई अवसर पर हिन्दी में बोले। कवि की वाणी में वाग्देवी विराजती थीं इसलिए भाषा का प्रवाह रुकता नहीं था। काव्य लेखन में वे महान थे। गुरुदेव ने बंगला कविता को नई भाव भूमि, नव संप्रेषण, छान्देयता और प्रकृति-छठा के विविध आयामों से समृद्ध किया। बलाका संकलन की चंचला कविता में कवि लिखते हैं -

रे कवि आज तुझको चपल चंचल बना डाला
नवल झंकार-मुखड़ा भुवन की इस मेखला ने
अलिखित पद संचरण की अहैतुक-निर्वाध गति
नाड़ियों में सुन रहा हूं कोई चंचल आवेग की पग-ध्वनि
वक्ष में रण रंजित दुःस्वप्न
कोई जानता नहीं
नाचती हैं रक्त में उदधि की लोल लहरें
कांपती हैं। व्याकुलता वनों की
याद दिलाती वह पुरानी बात-
युग-युग से चला हूं
स्खलित हो होकर
सदा चुपचाप रूप से रूप में ढलता हुआ
प्राण से प्राण में 
प्रात या निशीथ
जब जो कुछ मिला है हाथ में
देता गया हूं
दान से नवदान को
इस गान से उस गान को...
यह कविगुरु की मरने से लगभग वर्ष भर पहले की कविता है जिसमें जीवन का मूलमंत्र है। जब की माला अत्यंत प्राण अस्तित्व धर्मी है।
.... आने जाने वाली राह के किनारे नितांत अकेला बैठा हूं
गीतों की नाव को जो सबेरे प्राणों के घाट पर
धूप छांह के नित्य रंग मंच पर ले आए थे
सांझ की छाया में धीरे-धीरे खो गई।

आज वे सब मेरे स्वप्न लोक के द्वार पर आ जुटे हैं
जिनका सुर खो गया, वे व्यथाएं अपना इकतारा खोज रही हैं
एक-एक कर प्रहर जो बीतते हैं, बैठा-बैठा गिनता हूं
अंधकार की शिरा-शिरा में जप की नीरव भाषा ध्वनित हो रही है।

किसी भी कला के लिए लोक संस्कृति के साथ बंधना जरूरी होता है। यदि उसे नया स्वरूप देना है तो उस नव-स्वरूप के साथ एक रूप होना तथा उस संस्कृति बोध को अपनाना प्रत्येक जागरुक साहित्यकार के लिए आवश्यक होता है। इस अर्थ में कवि गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शांतिनिकेतन के आसपास रहने वाले गरीब, अपढ़, वनवासियों के साथ नृत्य, गान करते, अक्सर कोई न कोई पर्व पर उत्सव मनाते, खान पान होता, नृत्य संगीत का रात भर समा बंधता, कवि उस लोक नृत्य गान के रस में डूब जाते थे। पौष मेला, बड़े दिन के अवसर पर  20 दिसम्बर से प्रारंभ होकर महीनों चलता है। जिसे बंगाल का संस्कृति मेला भी कह सकते हैं। कवि गुरु ने हमेशा लोक जीवन के संस्कारों को प्रोत्साहित किया, नई राह दी, उससे गहरे से जुड़े और भारतीय बंग-लोक संस्कृति को नया आयाम एवं नई ऊंचाई प्रदान की।

गुरुदेव जीवन पर्यन्त कर्मशील रहे। वे आम साहित्यकारों की तरह आलसी, कामचोर, नखरेबाज, दलबंद, आत्म-प्रगल्भी, लोभी कभी नहीं रहे। राज परिवार से उनका मोह बचपन में ही टूट गया था। वे अकेलापन अनुभव करते थे, परन्तु कर्म ने उन्हें उस टूटन, बिखराव, मोह और घुटन से ऊपर उठाया। वे साहित्य कर्मयोगी थे और साहित्य कर्म से मरने के दिन तक जुड़े रहे। उन्होंने मृत्यु का आभास पाकर लिखा था -
सामने शांति-पारावार
खोलदो नाव हे कर्णधार...

गुगुदेव चाहते थे कि मृत्यु के समय यही गीत गाया जाए। परन्तु गीत-स्वर भी तो समय अपने प्रवाह में बहाकर ले जाता है। कवि ने 7 अगस्त, 1941 को राखी पूर्णिमा के दिन अपनी आंखें सदा के लिए मूंद लीं। रह गए उनके गीत जो आज बंगाल के जन जीवन में व्याप्त हैं। बंग-संस्कृति और काव्य का अर्थ ही है गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर। परन्तु गुरुदेव के बाद की बांग्ला-पीढ़ी उनके हिमालय जैसे ऊंचे व्यक्तित्व के सामने साहित्यिक दैन्यता से ग्रस्त है। यह बांग्ला साहित्य की राह में बाधा की सृष्टि उपस्थित कर रहा है। नया रचनाकार इस बात से खिन्न है और हीन भावना से ग्रसित है।
                      - स्वदेश भारती


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