Saturday, 10 March 2012

स्वदेश भारती का रायपुर, भिलाई में कार्यक्रम

दिनांक 6 मार्च 2012 को सिंघई विला भिलाई (छत्तीसगढ़) में कवि एवं उपन्यासकार स्वदेश भारती के ताजा उपन्यास आरण्यक पर विचार संगोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें कवि एवं आलोचक अशोक सिंघई ने उपन्यास पर आलेख पाठ किया। साहित्यकार रवि श्रीवास्तव, डॉ. जयप्रकाश साव ने उन्यास की सर्जनात्मकता पर अपने विचार रखे और कहा कि आरण्यक को विश्व के महान उपन्यासकारों द्वारा लिखे गए उपन्यासों की श्रेणी में रखा जा सकता है। संगोष्ठी में काफी संख्या में कवि, साहित्यकार, पत्रकार उपस्थित थे, जिसमें मुख्य रूप से श्री शरद कोकास, श्री नासिर अहमद सिकंदर, कवियित्री श्रीमती शकुन्तला शर्मा, प्रो. सरोज प्रकाश, श्री प्रकाश, श्री एन. एन. पांडेय, श्री एस.एस. विन्द्रा, शायर शेख निजामी, डॉ. नौशाद सिद्दीकी, श्री राधेश्याम सिन्दुरिया, श्री रामबरन कोरी कशिश, शायरा प्रीतिलता सरू, श्री शिव मंगल सिंह आदि शामिल थे।

3 मार्च 2012 को नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति की बैठक भिलाई इस्पात संयंत्र के बोर्ड रुम में आयोजित थी,  जिसमें स्वदेश भारती विशिष्ट अतिथि थे। उन्होंने हिन्दी  प्रगति के विविध स्वरूपों पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर उन्हें सम्मानित किया गया।

दिनांक 4 एवं 5 मार्च 2012 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग एवं कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिलाई, दुर्ग के तत्वावधान में छत्तीसगढ़ी और भोजपुरी का भाषाई एवं सांस्कृतिक अंतर्सम्बंध विष्यक राष्ट्रीय शोध संगोष्ठी का उद्घाटन स्वदेश भारती ने किया। विशिष्ट अतिथि केन्द्रीय मंत्री श्री चरणदास महन्त थे। संगोष्ठी में श्री आर.पी. मिश्रा, अध्यक्ष छतीसगढ़ कल्याण समिति,  डॉ. रमाकान्त श्रीवास्तव,  अशोक सिंघई, राधे लाल साहू, श्री प्रकाश उदय, प्रो. तीर्थेश्वर सिंह, प्रो. संगम पांडेय, प्रोफेसर प्रमोद शर्मा, प्रकाश सूरज, प्रो. सुधीर शर्मा आदि ने भाग लिया।

स्वदेश भारती ने अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि कोई भी भाषा बोलियों के अन्तरसंबंधों से पोषित होती है उसमें जनजीवन के भाषाई संस्कार का प्रभाव पड़ता है तथा अनेक शब्द लोक जीवन की बहुत सारी सांस्कृतिक गतिविधियों से जन्म लेते है। इस  प्रकार शब्दों का भंडार बढ़ता जाता है। भाषा का विकास होता है और नई  भाषाई संस्कृति जन्म लेती है।

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