Monday, 5 March 2012

कभी-कभी

कभी-कभी
मैं अपने मन की गहराइयों में डूब जाता हूं
वहां होता है नितांत मौन का सन्नाटा
वहां लहरों का उद्वेलित आत्म-क्रन्दन नहीं होता
और मैं अपने में ही सीमित रह जाता हूं।

कभी कभी
मैं प्रकृति के हास-विलास भारत सौन्दर्य को
हृदय में साधे
उसके नाट्य छन्दों की मधुर झंकार-रस में डूबा
पृथ्वी के सुन्दर उपहारों-वनश्री, झरनों, पर्वतों,
नदियों को, मानव जीवन के सुख दुख का नायक
सागर के आनन्दविह्वल आलोड़न,
पंछियों के सुमधुर गायन से आत्मविभोर
अपने लघुतम जीवन की अर्थवत्ता को संजोता हूं

कभी कभी
संघर्षरत मनुष्य की वेदना से अपने को जोड़ता हूं
उनके साथ पूरी तरह जुड़कर
लोभ, प्रपंच, छल की जंजीरों को तोड़ता हूं
मानव-आत्म-सत्ता को नई राहों की खोज करता
नई दिशाओं में यात्रा को मोड़ता हूं।

                                         28.02.12

भीतर का रीतापन

दिन प्रतिदिन सोच की खूंटी पर
अपना फटा सपना उतारकर टांगता हूं
ऊब और घुटन से भरी दिनचर्या के
विविध रंगों से समय के खंडित कन्वश पर स्मृतियों के आत्मबोध चित्र आंकता हूं
सबेरे की प्रतीक्षा में
अंधकार की सीढ़ियों परबैठा अतीत गुनता हूं
कई तरह से
किसिम किसिम के ताने बाने संयोजित कर
कई कई सपने बुनता हूं
जो दूसोरं से बेहतर हो
सुन्दर हो, विश्वजयी हो, गौरवपूर्ण हो
इसी तरह कल्पना-लोक में आधे में आधा जीता हूं।
ऊपर से भरा भरा
किन्तु भीतर से रीता हूं।

                                      29.2.12


होने, न होने का दर्द
हम इसी तरह चलते रहेंगे समय की पगडंडी पर
युग बदलेंगे
नये लोग जाएंगे, नए जज्बात,
नई संस्कृतियां जन्म लेंगी
हमारे सपने नए-नए रूपों में अपनी मंजिलें खोजेंगे
कभी साकार, कभी निराकार और इसी तरह
समय का पहिया चलता रहेगा...

हम अपने साथ रुदन लेकर धरती पर आए थे
और मौन लेकर चले जाएंगे
जिन्हें आंसू बहाना है, बहाएंगे
शोक मनाना है, वे मनाएंगे
समय हर घाव को भर देता हू
कहता है- चलो, आगे बढ़ो भले ही हो पग श्लना,
कर्म पथ-रक्त लथपथ....

जीवन-प्रवाह के साथ बहता रहेगा
उच्छिष्ठ, अचेतन, विवेकहीन, पथभ्रष्ट
लोभलाभी समष्टि का घिनौना आतंक-पालक
सत्ता-अभिभावनक के पागल अट्ठास में
जन गण मन का विद्रोह कुचलता रहेगा
नए सपने जड़ विच्छिन्न होंगे
गूंजती रहेगी मौन-प्रतिध्वनि
अंतर्निहित इतिहास के किसी कोने में
क्या होगा हमारे होने या न होने में....

1 मार्च, 2012

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