Monday, 5 December 2011

बजी वंशी चली नाव

बजी बंशी चली नाव
धीरे-धीरे यमुना के बीच
कान्हा ने बांधा लाल-हरे पाल
रेशम की डोरी खींच
राधा खिलखिला कर हंस पड़ीं
मध्य रात्रि में कार्तिक पूनम की चन्द्रिमा
एकटक देख रही अद्भुत जल बिहार
स्थिर, मनमुग्ध, आकाश में जड़ी
राधा माधव जा रहे यमुना घाट से नंदगांव

राधा ने झुक कर चुल्लू भर
कालिन्दी का जल
छिड़क दिया कान्हा की देह पर
जादुई चातुरी से नटनागर में भिंगोया
राधा का तनमन संप्रीति के जल से
राधा ने धीरे से कहा
चलो बांधो न नांव
नन्द गांव-तट के पीपल की छांव
बात बात में
कट गई रात
बंशी बजी चलती रही नाव।

No comments:

Post a Comment