Monday, 5 December 2011

मथुरा-वृन्दावन की कविताएं

हरे कृष्ण महा मंत्र का स्वर,
मृदंग तथा वाद्य यंत्रों के साज पर
इस्कान मंदिर में गूंज रहा
भक्त आत्मविभोर नाच रहे
चारों ओर आनन्दप्रभा से
लोगों के चेहरे खिले हैं
किन्तु, भीतर राग-विराग के अनगिन पैबन्द लगे
मोह, लोभ, स्वार्थ के तरह-तरह के टुकड़ों से सिले हैं।
ऐसे भक्तों की आंखें कहीं हैं
मन कहीं है
फिर भी हरे कृष्ण के स्वर से स्वर मिलाकर
वे नाच रहे, थिरक रहे
जय हरी बोल की कीर्तन में मग्न
जैसे पुण्य कमा कर बैतरणी पार करने का
सरजाम जुटा रहे
इस भव्य मंदिर के प्राचीर में
प्रसाद द्रव्य के भाव पर बिकता है
जीवन तो मुट्ठी भर सिक्ता है।

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