Wednesday, 7 December 2011

वंशी का मोहक जदुअई स्वर

बंशी वंशी चली नाव
धीरे-धीरे यमुना के बीच
कान्हा ने बांधा पाल
रेशम की डोरी खींच
राधा खिलखिलाकर हंस पड़ीं
मध्य रात्रि में चन्द्रिमा कार्तिकपूनम की
एकटक देख रही अद्भूत जल बिहार
स्थिर, मनमुग्ध, आकाश में जड़ी,
राधा माधव जा रहे यमुना घाट से नंद गांव

राधा ने झुक कर चुल्लू भर
कालिन्दी का जल
छिड़क दिया कान्हा की देह पर
जादुई चातुरी से नट नागर ने भिंगोया
राधा का तनमन संप्रीति के जल से
राधा ने धीरे से कहा
चलो बांधो न नाव
नन्द गांव-तट के पीपल की छांव
बात बात में
कट गई रात
वंशी बजी चलती रही नाव

राधामय वृन्दाधाम
स्मृतियां अब भी हरी भरी हैं
निधिवन में
रासलीला के अभिनव भावनर्तन में
विह्वल करने वाले आत्म मन में
स्मृतियां अब भी जीवित हैं
सेवा-कुंज के आर पार
राधारमण के आत्म-मिलन क्षण में
कालिन्दी के कछारों में
स्मृतियां सदा, बनी रहेंगी अजर अमर,
राधा गोपीनाथ की अमर-लीला में
बांके बिहारी के आनन्द-नन्दन-कानन में
वृन्दावन की पावन मिट्टी के रजकण में
आज भी बरसाने में राधा राज राजेश्वरी हैं।

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