Tuesday, 19 December 2017

आत्ममनोŠवाच

(78वें जन्मदिन पर)


क्या करोगे
रिक्त होगा जब तुम्हारा मन
विदा के क्षण...

एक दिन जब
नियति का प्रारब्ध लेकर
चेतना का भार लादे
लक्ष्य साधे
भंवर का संत्रास सहती
समय-सागर में मचलती
गति बदलती, डोलती तिरती
अकेली आत्मवाही तरी मनहर
आस्था की डोर से बंधकर
बढ़ रही गन्तव्य-पथ पर
मीन-वेधी प्रणति लेकर
आत्मबल से भरी उन्मन
विदा के क्षण...

एक दिन जब विखर जाएगा
सुनहरे प्रीति का संसार
फैलेगा निराशा दुःख का अंधियार
होंगे बन्द सारे हृदय-मन के द्वार
होगा वेदना के गीत का वन्दन
विदा के क्षण...

एक दिन जब घिरेगी अस्तित्त्व की तटिनी
सुनामी-समय के मझधार में
दुःस्वप्न-पारावार में
तब भला वह कौन याराना बनेगा
कौन देगा साथ
उस समय बस आत्मवाही-तरी होगी
राह भी होगी अपरिचित
बचेगा बस एक ही पथ -
ईश का स्मरण
विदा के क्षण...

              -स्वदेश भारती

बैंगलोर
12 दिसंबर, 2017


अनन्ततः

यही अन्त नहीं है
अन्त कहीं नहीं है
जो अन्त है
वही प्रारम्भ भी है

                  -स्वदेश भारती

18/2, कैम्पवेल रोड
बैंगलूर-48
28 नवम्बर, 2017


ईश्वर ने यह कैसा मन बना दिया
उसमें चिड़िया का पंख लगा दिया
और बांध दिया
प्रेम का सुनहरा धागा
जो जीवन पर्यन्त टूटता जुड़ता ही रहता है
न घिसता है, न रिसता है
न बदरंग होता है
भले ही पंख हताहत हो जाए प्रेम-सर से
भले ही रक्तरंजित हो
प्राण वेदना के असर से
मन-पाखी की आकांक्षा कभी पूरी नहीं होती
ना ही प्रेम-पिपासा तृप्त होती
युग पर युग बीत गए
कितने राजा रानी आए गए
प्रेम के तरह-तरह से
मन मस्तिष्क में दुर्ग बनाए
नए से नए
उम्र दर उम्र प्रेम
अपना रंग रूप बदलता रहा
ईश्वर ने छोटे से धड़कते हुए दिल को
एक उपहार देकर उपक्रृत किया
सुन्दर आशावरी रक्तपुष्पी फूल खिला दिया।
                                  - स्वदेश भारती

18/2, कैम्पवेल रोड
बैंगलूर-48
28 नवम्बर, 2017

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