Thursday, 9 January 2014

मेले में सपने

मैं सपने बेचता हूं
लाभ-लोभार्थियों के मेले में
सपने बेचता हूं।
सपने कई तरह के,
किसिम किसिम के हैं
उन सपनों को मैने आत्म-व्यथा के
विविध रंगों से सजाया है
उन्हें विक्रयार्थ बनाया है
कठिन दिनचर्या के झमेले में
ऊब और संत्रस्त मानसिकता के रेले में
वही सब अतीत की भट्टी में तपाकर
सार्थक रूप में ढालकर विविध रंगी सपने
अपने तई अच्छे से देख भाल कर
लाया हूं अस्मिता के कंधों पर संभालकर
अराजक भीड़ के बीच अस्तित्व - मेले में
कौन खरीद पाएगा भला
मेरे सपने
पाला है जिन्हें अंतस-राग से झंकृत
मनीषा के पालने पर
अनुराग-तान पर प्रतिध्वनित स्वर
आह्लादित मन-प्राण के सितार पर
जीवन रंगभूमि के तबेले में
सपने बेचता हूं
लोभ लाभार्थियों के मेले में

                    कोलकाता
                           4 दिसम्बर, 2013




चेतना का विपर्यय काल
जब जब होंठो पर निश्वास-कंपन अनुभव किया
हृदय का आइसवर्ग पिघलता रहा
शरीर बना रहा बर्फ का समुद्र
और तब तब वाणी हुई अवरूद्ध
अकथ मौन घिर आया
किन्तु उन क्षणों को
बेहतर ढंग से जिया

जब जब नई दिशाओं की ओर उन्मुख हुआ
अदृश्य छायाओं ने अनुसरण किया
जब भी एक दायरे से निकल कर
दूसरे में प्रवेश किया
प्रवंचना का प्राणघातक विष पिया
किन्तु तब भी अपने को जिया

जब जब आशाओं का आकाश खंडित हुआ
गहरे कुहासे के बीच
प्रभात की कालजयी किरण ने
नया रास्ता दिखाया
अस्मिता की कसौटी पर आत्मीयता के
उन क्षणों को जिया
और उस स्थिति में
चेतना का विपर्यय होने नहीं दिया
अपने को भरपूर जिया।

                            कोलकाता
                           5 दिसम्बर, 2013





 जीवन-निसार युद्ध
हम हमेशा ही युद्धरत रहते हैं
सबेरे से शाम तक
और रात के अंधकार के बीच
निश्रृत विनार्थ, ऊब घुटन भरी दिन चर्चा
सम्बन्धों की अराजकता,
उद्दंड माहौल की प्रवंचना
उदास, निरुद्देश्य भटकती अभिव्यंजना
कितने सारे मोर्चे पर
करते रहते अंतर-युद्ध
असमय के विरुद्ध
चिन्तन-अचिन्तन की वेगवती नदी का
प्रवाह बन अजानी दिशाओं में बहते
ऐसे में अस्तित्व के रक्षार्थ युद्ध विध रहते

पल-पल समय अपनी हथेलियों में
कर्म-सिक्ता भरे अनासिक्त
परिवर्ति मौसम के बीच इंगित करता
कि भुट्ठियां किसी क्षण
किसी भी स्थिति में होती हैं रिक्त
हम दूसरों के लिए
युद्ध का मुखौष धारण कर
अपने लिए ही युद्ध करते
भले ही इसके लिए समय की मार सहते
हमेशा ही पल छिन
कभी आत्मभाव से
तो कभी खिन्न मन से
विभिन्न संदर्भों में युद्ध-रत रहते हैं।

                             कोलकाता
                          18 दिसम्बर, 2013





साहित्य-सृजन
अनात्म की प्रतिष्ठा-नहीं करता साहित्य-सृजन
साहित्य नहीं रचता
प्रवंचना और खडयंत्र-सेतु
साहित्य नहीं होता आत्म-प्रभंजन
वह तो सबके हित की बात करता
साहित्य की उत्स धारा में प्रवाहित होते
कटुता, अलगाव, आत्म-विमर्ष, अप्रेम
चिन्तन-कर्म की अंधकारा में
सिर्फ आस्था ही साहित्य को प्रतिष्ठापित करता।

                                                                        कोलकाता
                                                                       19 दिसम्बर, 2013





असहज नहीं होता सत्य
असहज नहीं होता सत्य
ना ही विनष्ट होता
कर्म हीनता के कलुष
अनात्म बोधी-जाल में
इच्छाएं फंसकर
असमर्थता प्रकट करती
अपने विविध चाहत के रूप
अनायास प्रदर्शित करती

अतीत के खंडहरों के बीच
सत्य की कसौटी पर ही
खरा उतरता वर्तमान
क्योंकि प्रत्येक स्थिति में
सत्य सदा ही होता अर्थवान
सत्य की सत्ता समय-सापेक्ष्य होती
जिसके भीतर ही
मनुष्य गढ़ता रहता असत्य
ऐसे में
असहज नहीं होता सत्य.....



                                कोलकाता
                                20 दिसम्बर, 2013







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