Tuesday, 24 October 2017

राजधर्मपरक नीति-1

राजधर्म की कलम और न्याय की स्याही से ही किसी भी देश में राजनीति की तकदीर लिखी जाती है। उसी से जनता खुशहाली के रास्ते पर कदम बढ़ाती सर्वांगीण विकास की ओर चलती है।

राजधर्मपरक नीति-2 

किसी भी देश-काल में जब भी लोभ और स्वार्थपरता से राजधर्म की हत्या हुई है, उस अधर्म से राजा का विनाश तो हुआ ही है, जनता को भी उस अधर्म का सहभागी बनना पड़ा है। भारत में महाभारत काल से लेकर आज तक यही हश्र रहा है।

राजधर्मपरक नीति-3 

सत्तालिप्सा और स्वार्थ का अधर्म-कर्म राजनीति के महावृक्ष को सूखा ठूंठ बना देते हैं
अथवा आक्रोशित जनता ही तूफान बनकर उस महावृक्ष को जड़ विच्छिन्न कर देती है।

                                                                                                -स्वदेश भारती
25 अक्टूबर 2017
उत्तरायण,
331, पशुपति भट्टाचार्य रोड
कोलकाता-700 041

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