Monday, 7 April 2014

मतदान- राष्ट्रीय अस्मिता के लिए

सभी राजनीतिक पार्टियों के नेताओं देश के बुद्धिजीवियों से निवेदन

आपको इतना तो अवगत होगा कि किसी भी स्वाधीन, सार्वभौम, प्रजातांत्रिक राष्ट्र के चार प्रमुख संवैधानिक आधार होते हैं-

                           1. संविधान
                           2. राष्ट्रगान
                           3. राष्ट्रध्वज
                           4. राष्ट्रभाषा

65 वर्षों की आजादी के बाद भी देश को अभी तक चौथा आधार नहीं मिला जिसके कारण देश की एकता, अखंडता और गौरवशाली सांस्कृतिक परम्परा को नया आयाम नहीं प्राप्त हो सका।

अभी तक हमारी राष्ट्रभाषा जो राजभाषा हिन्दी है, वही विश्वभाषा है जिसे राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त नहीं हो सकी। यह हमारी  राष्ट्रीय प्रतिबद्धता के बिल्कुल विपरीत है। आज जब हम नई 12वीं संसद गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया में व्यस्त हैं, सभी नेता अपने लिए जनता से वोट मांगने सड़क पर निकले हैं। तरह-तरह की मांगों, वादों, प्रतिश्रुतियों, विचारों से, बड़े-बड़े घोषणापत्रों से जनता को आकर्षित किया जा रहा है, वहीं राष्ट्रभाषा की अस्मिता और विश्व भाषा की गरिमा के बारे में सारी पार्टियां मौन है अथवा वे देश की सांविधिक जरूरतों और सार्वभौम, स्वतंत्र राष्ट्र के प्रमुख चार आधार को भूल चुके हैं।

जनता उन्हें ही वोट देगी जो राष्ट्र की प्रभुसत्ता और गौरवशाली परम्पराओं में विश्वास रखकर राष्ट्रभाषा को विश्वभाषा, राष्ट्रसंघ की भाषा के रूप में संसद गठन के बाद 2014 के अंत तक स्वीकृत कराने में सफलता प्राप्त करेंगे। राष्ट्रभाषा हिन्दी को राष्ट्रसंघ की विश्वभाषा बनाने हेतु लगभग 200 करोड़ रुपये का विशेष आवंटन करायेगे तथा लगभग 100 राष्ट्रों की अनुमति प्राप्त करेंगे।

राष्ट्रीय हिन्दी अकादमी 26 वर्षों से इस दिशा में कारगर कार्य करने के लिए कई अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलनों, अंतरराष्ट्रीय भाषा साहित्य सम्मेलनों तथा अन्य मंचों पर विविध प्रस्तावों द्वारा अपनी मांग भारत सरकार के पास भेजती रही हैं, परन्तु अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई।

हमारा प्रस्ताव है कि राष्ट्र के प्रति सच्चे प्रेमी और वफादार नेता तथा बुद्धिजीवी इस विषय में गम्भीर चिन्ता करें और भारत की जनता राष्ट्र की आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने के लिए आगे आएं।

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (08-04-2014) को "सबसे है ज्‍यादा मोहब्‍बत" (चर्चा मंच-1576) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    श्रीराम नवमी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. मंचों की साज-सज्जा, सम्मेलनों के भोग-भोजों को धन की आवश्यकता होती है, एक भाषा को अपने प्रस्तरण हेतु धन की कोई आवश्यकता नहीं होती.....

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