Wednesday, 23 April 2014

प्रजातंत्र का मजाक

तेरहवीं संसद के चुनाव में विसंगतिपूर्ण नई बातें सामने आ रही हैं। भारतीय जन मानस निम्नलिखित बातों के आइने में सोचें -

1) भारत के संविधान की प्रजातांत्रिक संसदीय प्रमाली की व्यवस्थाओं, नियमों को इतिहास में  पहली बार ताक पर रखकर पहले से प्रधानमंत्री की घोषणा कर जनता से उसके लिए वोट मांगना संघीय ढाचे के विरुद्ध है। यह असंवैधानिक  है।  ऐसा राष्ट्रपति-प्रणाली वाले देशों में होता है।

2) व्यक्तिगत आक्षेप-प्रत्याक्षेप की वाचालता से इस देश की सभ्यता और संस्कृति पर कुठाराघात करना और हमारी नई पीढ़ी के सामने भोंडा और भद्दा आचारण पेश करना भारतीय सभ्यता के विरुद्ध है।

3) भारतीय-जनतांत्रिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध भाषणबाजी करना और वोटखोरी के नीति पर चलना आज के परिप्रेक्ष्य में गलत है।

4) लोकहित, नवनिर्माण, विकास से अलग हटकर वोट की राजनीति करना प्रजातांत्रिक ढांचे को तोड़ना है।

5) हिन्दी को राष्ट्रभाषा, विश्वभाषा के रूप में देश तथा राष्ट्रसंघ में मान्यता देने के बारे में मौन साधना भारतीय संस्कृति के विरुद्ध है।

                                                                                                                          - स्वदेभ भारती,
                                                                                                                                                                     साहित्यकार

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