Saturday, 12 April 2014

आत्म छलना - 1

हम जीवन पर्यंत छलते हैं अपने को
अपने आसपास के संदर्भों को, संबंधों को
लोभ आत्म प्रवाह से
तोड़ते हैं सत्तता के अनुबन्धों को
किताबें, धर्मग्रन्थ, श्रुतियां कुछ भी कहें
हम स्वार्थजनित पूजते रहे कबन्धों को।

हमने बनाए कितने सारे विधान-वितान
ग्रहण किए, बांटे विविध ज्ञान-विज्ञान
किन्तु सतात्मग्रही नहीं हो सके
बार बार दोहराते रहे इतिहास के छन्दों को।

यूं तो हम सभी जानते हैं
सच क्या है, झूठ का अर्थ क्या है
किन्तु मनसा, वाचा, कर्मणा छलते रहे
आत्म-अनात्म के अंधेरे में अपने वन्दों को।

                              - स्वदेश भारती
                                          कोलकाता 2 अप्रैल, 2014


आत्म छलना - 2

सम्बन्धों का छलना मनुष्य को
जीवन में अराजक बना देती है
वह नहीं कर पाता
भले और बुरे का निर्णय
न्याय का अधिकार
मस्तिष्क की प्रवंचना के अंधेरे तल घर में
दुबक कर बैठ जाता है
अन्याय के घटाटोप अंधकार से अच्छादित करता है
ऐसे में व्यक्ति सिर्फ बोलता है
अकमर्णता के कगार से फिसलकर
गहरी खाई में गिरता है
सच्चाई के रंग में विष घोलता है
फिर भी अपने हृदय  में
वादा फरोशी के कई रंग मिलाता है
तब उसकी नियति खोट बन जाती है
मनुष्य कर्म और अकर्म का पैमाना है
व्यक्ति का समष्टि के प्रति सेवाभाव
बस एक बहाना है
वह अपनी अनीति धर्मा नीयत का आजन्म
विखराव सहता है
उसके लिए मानव धर्म
सिर्फ मानसिक ताना बाना है।


आत्म छलना - 3

आत्म छलना से लेकर
जन-मत गणना तक
एक अप्रीतिकर आवाज गूंजती है
दिशांत के आर पार सिवान से शहर
झोपड़ी से अट्ठालिका
पल्लि पथ से फुटपाथ,
सड़क से राज पथ तक
संसद, विधान सभा का बुर्ज का पता है
आजादी की बुढ़िया पथ-श्लथ ऊंघती है
बार-बार कई कई तरह से
आवाजें बदलती है
जनमत को आकर्षण-जाल में बांधने
साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति
लोभ और स्वार्थ के दायरे में
चक्कर लगाती है
देश की सीमा के आर पार
जनमानस के ऊपर
छा जाता तमो गुणी अंधकार
सत्ताधारी अपनी लोलुप महत्वाकांक्षा
का कुटिल खडयंत्र रचता है
खंड-खंड हुए जनमत के सहारे
अराजकता की खाई में
गिरने से बचता है।


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