Thursday, 10 April 2014

मतदान-प्रतिश्रुति का पंचनामा

1. मतदान वादों की प्रतिश्रुति है। आस्था है। प्रजातंत्र के बीज-वृक्ष का अमृत फल है।
मतदान स्वाधीन राष्ट्र का सुनहरा कल है।

2. मतदान के प्रति ईमानदारी राष्ट्रीय-संस्कृति है।

3. वही प्रजातांत्रिक देश विकासशील है, उन्नत और महान बनता है जिसके नागरिक मतदान की महत्ता को पहचानते हैं। अपने विवेक का उचित प्रयोग करते हैं

4. भारतीय लोकतंत्जोर के जागरूक नागरिक विश्रृंखल राजनीति की आंधी में ढहते नहीं बल्कि अपने को राष्ट्रीय अस्मिता का विशाल अक्षयवट की तरह स्थिर हरा भरा रखते हैं। वही देश की प्रगति के संवर्द्धक होते हैं। और राष्ट्र की अस्मिता को विश्वजयी बनाते हैं।

5. मतदान राष्ट्र और व्यक्ति विशेष के प्रति विश्वास की कसौटी है। उस कसौटी पर खरा उतरना प्रत्येक भारतीय का पुनीत कर्तव्य है।

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