Wednesday, 29 June 2011

हिसाब मिलता नहीं

हिसाब मिलता नहीं
जितना ही जोड़ता हूं अतीत के सुख दुःख
अलग-अलग समय में
और उसमें शामिल करता हूं
जोड़, घटाव, गुणा, भाग
मान अपमान
लाभ हानि
प्रेम, प्रवंचना
अपनत्व, दूरत्व
अंधकार, उजियारापन, घात प्रतिघात
और फिर उसमें से निकालता हूं
प्राण-संवेदना का अनुपात
हिसाब मिलता नहीं

प्राप्य और अप्राप्य
दोनों का तुलन-पत्र
समतुल्य होना ही समायोजन है
परन्तु जितना ही बीते हुए
क्षणों का जिया गया सत्य-असत्य
और वर्तमान का सहज-असहज आत्म-बोध
मिलाकर हिसाब करता हूं
हिसाब मिलता नहीं

कैसे किस-किस प्रक्रिया से हिसाब मिलाऊं
कितना कुछ जीवन के अनर्गल जिए निष्फलों को
कैसे और कितना
समय की मार से सहेजे गए पलों को
सुख प्राप्ति-फलन से घटाऊं
और असंभावित भविष्य
उसमें जोड़ दूं
ऐसा करते हुए यही निष्कर्ष निकलता है
कि अंधेरे में कोई भी फूल खिलता नहीं
उसके लिए तारों की रोशनी चाहिए
अथवा चन्द्रिमा की रजत-मुस्कान
या सूर्य की प्रातः-स्वर्णिम किरणें
मैं भला कहां से लाऊं
जगत नियंता का कलकुलेटर
जिस पर ठीक-ठीक जिए जीवन का हिसाब
जोडूं-घटाऊं
भोगी हुई जिजीविषा
और आत्मयंत्रणा के रंगों से
कैसे जीवन के सत्य और
असत्य की तूलिका से रंगू
जिए, अनजिए यथार्थ को
समेकित करूं, सारे गुणनफल के साथ
मिलाऊं हिसाब
जो कभी मिलता नहीं।

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