Sunday, 26 June 2011

समय अस्तित्व

कुम्हलाए हुए चेहरों में दिखाई देता है
हताश-अतीत
पतझर की बाहें थामें हवा
और उसके कांपते पांवों की आहट
वसन्त-आगमन का मौन संकेत देती
नीम और अमलताश की टहनियां
अमराई से उठती
बोर-गंधी-मादल हवा
कोयल की तान
मेरी धमनियों में बहते रक्त को
तेजी से संचारित कर जाती
हृदय में उठती
वसन्त-आनन्द की लहरियां
परन्तु दूसरे ही क्षण
कुम्हलाए चेहरों को देख
मैं भूल जाता अपना स्वकल्पित सुख-सत्य
और सोचने लगता कि
समय-गति के साथ
जो चल नहीं पाते
वही तो मुंह की खाते

No comments:

Post a Comment