Sunday, 29 December 2013

सुख और दुख

क्या सुख मिला- उसने कहा- हां
क्या दुःख मिला- उसने कहा-हां
फिर एक मौन छा गया
न प्रश्न ने उत्तर की अपेक्षा की
न उत्तर ने अगले प्रश्न की
दोनों ने हाथ मिला लिए
फिर उन्हें नागफनी के जंगल से गुजरते समय
एक काला नाग मिला
दोनों ठिठक गए
चिन्तन-मन्थन करते रहे
आगे की यात्रा के नये-नये पथ-विधान गढ़ते रहे
एक ने कहा
सुख में कांटे होते हैं
दूजे ने कहा
दुःख में कांटे ही काटे होते हैं
दोनों ने एक स्वर में कहा
सुख और दुख दोनों में कांटे होते हैं
इसलिए पहले कांटेदार जंगल को पार करना है
फिर नदी के उस पार पहुंचना है
तभी डाल पर बैठी मैना बोली
दुःख और सुख के परे भी
एक ऐसी स्थिति होती है
जहां मन निरानंदित होता है
कभी दुख, सुख को
और कभी सुख, दुख को
अपने कंधे पर ढोता है,

न्यू सिक्किम हाउस, नई दिल्ली
21 मार्च, 1992





Pleasure and Pain

Tranquilly Tranquilly and anxiety
Comforts and misery
Happiness, glory and doubt
Could you get any of these

Both respectively got
their replies in Yes and No
There was silence, thereafter
neither questions were asked
nor answers given
Both shook hands
Both were passing through the jungle
of prickly pears, cactus
There they met a black serpent
Both stopped a short,
were wavering to go forward
Musing and thinking
they planned their ways to continue their
journey ahead
One said-There are thorns in happiness
The other said-
There are only thorns in unhappiness.

Then they both uttered in unison
life is full of Joy and Sorrows
So let us cross first the thorny jungle
then have to reach the other side of the river quietly
mynah sitting on a branch meanwhile exclaimed
There is a state of experience beyond
both Pleasure and Pain-s state of mind
when and where none
of these apposite are felt. The min's
equanimity is never unbalanced and forever
one goes through any of them without a waver.

New Sikkim House, New Delhi
21st March, 1992




एक पत्रांश

......... तुम किसी एक फूल का नाम लो
निचोड़ों उसे अपने खून में मिलाकर
गिराओ कहीं भी
मेरा नाम नजर आएगा।

मैं फलों की बात नहीं करता
क्योंकि सारी जिन्दगी
गंवा दी फूलों की परिभाषा करते
उनकी पहचान से आत्मसात होने का
दम भरते
तुम किसी भी फूल का नाम लो।

वैसे तो फूल बहुत हैं बाग में
मैंने और तुमने महसूस किये हैं
उनके बीच अपने ही रंगों के छन्द
और रूप-रसगन्ध

पर सच तो यह है
न तुम और न ही मैं
ठीकठीक समझ सके
समय और जीवन में परिवर्तन-द्वन्द
तुम किसी एक फूल का नाम लो
मेरे अन्तस् का रंग जरूर नजर आएगा...

कलकत्ता
16 जून 1979



The part of a letter

You name a flower
squeeze its essence in your blood
and drop somewhere
you'll find my name written there

I don't talk about fruits
because the whole of my life
I wasted in defining the kinds of flowers
and be one with them.

Name a flower.... there're so many
in the garden, you and I feel their meters
the themes of your own colors, forms, fragrance, tastes
But the truth is that
neither you nor I understand well about flowers
The changes in the opposites of life and times
you name a flower and see there
only the color of my inner being shall appear.

Calcutta
16th June, 1979

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