Tuesday, 17 December 2013

12 दिसम्बर 2013 को मेरे 74वें जन्म दिन के उपलक्ष्य में

मित्रों! प्रशंसकों, साहित्य प्रेमियों, आत्मीय अभिभावकों, संस्थाओं आदि को मेरे जन्म दिवस-बधाई के लिए आभार एवं संप्रीति सहित सौहाद्रर्पूर्ण धन्यवाद!

मैं आपके साथ दिनांक 12 से 17 तक यानी 5 दिनों की प्रतिदिन लिखी कविताओं के साथ अपनी अंतर भावना जनित-चिन्तन को बांटना चाहता हूं और आप के मन्तव्य के लिए निवेदन करना चाहता हूं। आप सभी प्रसन्न रहें, सुखी रहें, स्वस्थ एवं सुरक्षित रहें।
                                                                                                   - स्वदेश भारती



किसिम किसिम के खेल
खतरनाक ढंग से लोग खेल रहे खेल
समय सागर-तीरे सत्ता-रेत में
कोई कोई ताबड़तोड़ कोई धीरे-धीरे
राजनेता, जननेता, धर्माचारी
मिथ्या आडम्बरी, बलशाली, लोभी, दुराचारी
किसिम किसिम की
किसिम किसिम से
खेल रहे सत्ता लोभ -खेल
कर रहे रोटी के वादे
किन्तु नेक नहीं हैं उनके इरादे
मुंशी, बाबू, धोबी, नाई, कर्मकार
खेतिहर, मजदूर, किस्मत के मारे
अराजकता के जंगल में सभी हैं मजबूर
बाढ़, सूखा, विपदा से विपन्न सूने खेत में
जब फसल बेकार होती
किसान, मजदूर की हिम्मत खोती
खोते आशा दिगन्त अधीरे
फुटपाथ, पल्लिपथ से उठता शोर
राजपथ पर चलती अस्मिता खंडित
क्षत-विक्षत, लहू लुहान
पश्चिम से उभरती व्यंग आवाज
वाह रे प्यारा हिन्दुस्तान
सबसे अच्छा हिन्दुस्तान।

                                     - कलकत्ता, 12 दिसम्बर


प्रभात-गीत
सबेरा ठंड से सिकुड़ गया है
पेड़ के पत्तों में बैठी उकड़ूं सघन हरियाली
तनों की गर्मी से सेक रही है ठिठुरन
पंछियों का झुंड क्षितिज में ओझल हो गया है
आकाश बादलों और धुन्ध से ढक गया है
हवा थम गई है
प्रातः कालीन अजान हो चुका है
मन्दिर में घंटियां, शंख बजकर
शान्त हो गए हैं।
चारों ओर शीतस्वनी खामोशी है
फुटपाथ पर अंगीठी में
चाय उबल रही है। सड़कों पर
रद्दी कागज चुनने वाला छोकड़ा
फटी कमीज पैंट में ठंड से सिहर रहा है
अट्टालिकाओं में सर्दी सेंध लगाकर
अनाहूत घुस आई है। आमिजात्य नर्म कम्बल और
रजाइयों में ढकें आंखें मीचे
फुटपाथ पर नाचता नगे बदन पागल
आबुल-ताबुल बड़बड़ाकर
क्रोध और आवेश में। ऊंचे फ्लैट से
सिनेमाई गीत के आने वाले स्वर
होठों पर सस्वर, थिरक रहा है। पत्थर फेंक रहा है।
अखबारी लड़के साइकिलों पर
दुनिया भर की खबरें बांटते हुए
तेज गति इस गली, गली भाग रहे हैं
कल जो कुछ घटनाएं घटी
उससे सुभिज्ञ होने के लिए
नागरिक उत्सुक, घरों में
चाय की चुस्कियों  ले रहे हैं
सूर्य की लालिमा यह रहस्य खोल रही है
कि प्रभात हो चुका है।

                        - कलकत्ता, 13 दिसम्बर (74वां जन्मदिन)



मित्रों के लिए
ब्लॉग, फेसबुक, ट्यूटर पर
मित्र बनने वाले
मेरे लेखन पर टिप्पणी, मन्तव्य, सुझाव
अभिमत देने वालों को धन्यवाद देता हूं
किन्तु मन में अहसास होता है
कि ब्लॉग, फेसबुक, ट्यूटर पर
अपने अनुभव, विचार लिखना
जैसे दो बासों से बंधी रस्सी पर
सम्हल कर चलना है
लोग मुझे या मेरी दशा
अथवा मनीषा के विविध आयामों की कशिश
जीवन के ताने-बाने को नहीं देख पाते
बस जो लिख दिया
उसी पर अपने विचार प्रकट करते जाते
ऐसे में धन्यवाद के शब्द से
व्यवहार-कुशलता की रेखाएं खींचता हूं
मन में यह आश्वस्ति पाता हूं
कि चलो विश्व-जनसंवाद से जुड़ा
एकन्तिक पथ से
आत्मीयता के सहअस्तित्व की ओर मुड़ा
भावना सर्जित चिन्तन को
ब्लॉग पर, अनन्त आकाश में निर्मुक्त
अस्तित्व के डैने खोले उड़ा

                                                              - कलकत्ता, 14 दिसम्बर




 आत्मगत-मौन

आत्मगत मौन का अवसाद बेहद गहरा होता है
और जीवन के एकाकी क्षणों में
जब भी अवसाद की गहराई नापने का यत्न किया
अतीत का विष ही पिया
मुझे लगती है अन्तर-कुठार के प्रति
समय असंबंधित मूक और बहरा होता है

प्रकृति के मौसम-परिवर्तन के बीच
समय को तीव्र गति से भागते हुए देखा है
ऐश्वर्य-शाला में मदमस्त नाचते देखा है
निर्धन, अभावग्रस्त, विषाद-दुःख से जर्जर
मनुष्य की तकदीर लिखते देखा है
किन्तु बदलाव की आंधी जब भी आई
आम-जन को उड़ाकर निर्मूल कर गई
अस्तित्व की सर्जित अथवा
विसर्जित रेखा से दूर
समय-सागर को उद्वेलित-आन्दोलित
अट्ठहास करते किंकर्तव्यविमूढ़ देखा है

सघन कुहासा जब भी मेरे मौन के आरपार छाया
न जाने कितने संदर्भों में
कितनी बार, क्षितिजों के आर पार
समय-पाखी को दिशाएं बदलते देखा है
अनहद-नाद के बीच
आत्म-व्यथा से सजल आंखें भींच....

                                                                - कलकत्ता, 15 दिसम्बर




अनहद नाद

प्रथम शब्दनाद रुदन से प्रारम्भ होकर
अपने रुपाकार को बढ़ाता
जोड़ता नये-नये रिश्ते नाते
अहनद-नाद से अस्तित्व जोड़ता

आदि से अन्त तक
अनन्त संदर्भों में
अपनी ईकाई घटाता-बढ़ाता
ढाई आखर को नव शब्द- स्वर देता
अथवा पद दल्लित करता
आत्म-अनात्म-बोध के गलियारों में
नए-नए आकर्षण-आशा-जाल में बंधा
अतीत की स्मृतियों के
निर्जन, उदास, एकाकी
रंगलीला की व्यथा-कथा को उजागर करता
वर्तमान के व्यामोह को तोड़ता

प्रथम-शब्द-नाद गर्भ धारिणी मां को
जहां नैसर्गिक सुख-आनन्द देता
जीवन के अवसान पर
वही शब्दनाद रुलाता, व्याकुल व्यथित करता
अनहद-नाद से जोड़ता
हमारे आत्म-पथ को
अजानी दिशा की ओर मोड़ता

                                                     - कलकत्ता, 16 दिसम्बर

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