Monday, 30 December 2013

आदमी-औरत

आदमी ने कहा - आओ चलें आगे और आगे
औरत ने कहा- हां चलो पर थोड़ा सुस्ता लें
नदी किनारे, पर्वत की छांव में
सागर-तट पर, वसन्त-कानन में।

आदमी ने कहा - आओ चलें आगे और आगे
औरत ने कहा - पहले जीवन के उन मधुर क्षणों को,
अपनी आकांक्षाओं को मन से बांध लें
और यह देख लें कि कलियां भी
फूलती हैं किसी न किसी प्राप्य की इच्छा लिए
जो ऐसा नहीं करतीं, वही असमय कुम्हला कर
वृन्त-विहीन हो जाती हैं
जो समय की ताल पर
नाचती हैं
यही समझ लो कि उनके भी
अभिराम स्वप्न जागते हैं
आदमी ने कहा- आओ चलें आगे और आगे
औरत ने कहा- आह मर्द क्यों नहीं समझ पाते औरत के
अन्तस में धधकते अंगारे, अन्तर-निहित रहस्य, कामनाएं
और उनके दायरे।

कलकत्ता,
8 अप्रैल, 1992






Man and Woman (A Dialogue)

Man- Let's go on and on
Woman-Yes, but let it be so after resting
by the river side for a while
in the shadow of the mountain, on the sea-beach,
In this forest during the Spring
Man-come on let's go on and on
Woman-First, let us recollect life's sweet moments
And our cherished desires floating in the mind
And realize that blossom turn into flowers and fruits
with some purposes and times
which fail in this process
fade, wither, shriven or lose their luster
Before the time of existence
Those which dance on the tune of rhythmic tune
They weave their dreams
Man-come let's go on and on
Woman-oh! men don't understand the burning
mystic desire's tussles in
The various inner beings of women,
their mysteries and their spheres of influence.

Calcutta
8th April, 1982




समय-संदर्भ

चुपचाप बीत जाती रात
और उजाले से स्नान किया हुआ प्रभात
अपनी शुभ्र कांति-देह पर
भीड़ भरी दिन-चर्चाओं का आवरण ओढ़े
चलता है
जीवन-प्रक्रिया भीड़ के साथ
चुपचाप चुपचाप बीत जाती रात
और इसी तरह हमारे सपने भी
अपनी गठरी से स्मृतियों के एक-एक चीथड़े निकालते हैं
भीड़ भरी आशाओं के फुटपाथ पर
दुकान सजाते हैं
और अपने मोल-भाव की कुशलता से
कुछ न कुछ लाभ उठाते हैं
घाटा सहते हैं
अंधकार घिरने के साथ-साथ
मालपत्र सहेज कर
इच्छाओं की सन्दूक में रखते हैं
सहते हल्ला-गाड़ी-समय का घात-प्रतिघात
चुपचाप चुपचाप बीत जाती रात
उफनता रहता समुद्र
लहरों की हथेलियों पर लिखता जाता
अनगिन शब्द-गीत छन्द
मौसम बदलते तेजी के साथ अपने रास्ते
नदियां बदलती प्रवाह
और बर्फाच्छादित पर्वत पर
अचानक ही लग जाती आग
अभिलाषा के अलिंगन हो जाते
कमल कोरकों में बन्द
और ऐसे ही बीत जाती मनुष्य की
संघर्षरत अंधेरी रात
चुपचाप चुपचाप

कलकत्ता,
22 मई,1992






In the Context of Time...

The night passes quietly, silently
And the dawn washed in the sunlight
Covered with crowded news moves on with
it's brilliant figure within
The crowded process of existence forward...
The night passes silently.
Likewise, our dreams bring out the truth
rags of reminiscences one by one
lay out their makeshift shops on
crowded foot-paths
and despite with their lust of regaining
make some profit, losses, more or less
and as darkness sets in they endure
the police action to clear foot-path
Before the goods are boxed
in desire's go downs
the night passes quietly
The sea surges & swells on writing
count, lyrics verses-stanzas on
The palms of waves;
The seasons change
imperceptible, swiftly on their own
even the rivers change their courses.
the snow-clad mountains are fired suddenly
And the black bees are confined in lotus buds
likewise, dark nights of struggling humans
passes on quietly....

Calcutta
22nd May, 1992.

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